भाषा का उद्भव और विकास: मानवीय चेतना की अभिव्यक्ति
आलेख | साहित्यिक आलेख डॉ. सुशील कुमार शर्मा15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
भाषा केवल ध्वनियों का समूह नहीं, अपितु मानवीय संवेदना, संस्कृति और वैचारिक क्रांति की संवाहिता है। किसी भाषा का जन्म आकस्मिक नहीं होता, बल्कि यह युगों की साधना, सामाजिक अंतःक्रिया और भौगोलिक परिस्थितियों का प्रतिफल होती है। भाषा का सृजन शून्य में नहीं, बल्कि ‘आवश्यकता’ की कोख से होता है।
भाषा का जन्म: मानव चेतना की सबसे अद्भुत यात्रा
मानव सभ्यता के विकास का इतिहास यदि ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धियों में भाषा का आविष्कार है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि वह मनुष्य की चेतना, संस्कृति, अनुभव और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है। जब मनुष्य ने पहली बार अपने भीतर उठते विचारों और भावों को ध्वनियों के माध्यम से व्यक्त किया, तभी भाषा के जन्म की प्रक्रिया आरम्भ हुई।
भाषा का जन्म किसी एक दिन या किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं होता। यह धीरे-धीरे मानव समाज के सामूहिक अनुभवों, आवश्यकताओं और परिस्थितियों से विकसित होती है। जैसे नदी का उद्गम किसी एक स्रोत से नहीं बल्कि अनेक छोटी धाराओं से होता है, वैसे ही भाषा का निर्माण भी अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक कारकों से मिलकर होता है।
भाषा के जन्म की परिस्थितियाँ
मानव सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में मनुष्य का जीवन अत्यंत सरल किन्तु संघर्षपूर्ण था। वह जंगलों में रहता था, शिकार करता था, समूहों में रहता था और प्रकृति से निरंतर जूझता था। उस समय उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता थी संवाद की।
भाषा के प्रादुर्भाव के मूल में मनुष्य की सामाजिकता और अपनी अनुभूतियों को साझा करने की तीव्र उत्कंठा रही है। जब आदिम मानव ने समूह में रहना प्रारंभ किया, तब अस्तित्व की रक्षा हेतु संकेतों और अस्पष्ट ध्वनियों की सीमाएँ समाप्त होने लगीं।
प्रकृति की ध्वनियों बादलों का गर्जन, पक्षियों का कलरव या जल का निनाद के अनुकरण से प्रारंभिक शब्दों का जन्म हुआ। जैसे काँव-काँव से कौआ और मर्मर से पत्तों की आवाज़।
प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति जैसे भय, हर्ष, विस्मय और पीड़ा जैसी मौलिक संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए कंठ से निकली विशेष ध्वनियाँ कालांतर में शब्दों का रूप ले बैठीं।
सामूहिक श्रम (जैसे भारी पत्थर उठाना या शिकार करना) के समय ऊर्जस्वित होने के लिए मुख से निकले स्वर ‘हइशा’ या ‘हुंकार’ ने भाषाई लय को जन्म दिया।
भाषा निर्माण के प्रमुख कारक
भाषा का निर्माण कई कारकों से प्रभावित होता है। इनमें प्रमुख हैं सामाजिक जीवन, भौगोलिक परिस्थितियाँ, सांस्कृतिक परम्पराएँ और मानवीय अनुभव।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समूह में रहता है और समूह के साथ संवाद की आवश्यकता ही भाषा के विकास को जन्म देती है। जितना जटिल समाज होता जाता है, उतनी ही भाषा भी समृद्ध होती जाती है।
भाषाओं के स्वर और शब्दावली पर भौगोलिक परिस्थितियों का गहरा प्रभाव होता है। पर्वतीय क्षेत्रों की भाषाएँ अक्सर कठोर ध्वनियों से युक्त होती हैं, जबकि नदी घाटियों की भाषाओं में मधुरता अधिक होती है।
उदाहरण के लिए भारतीय उपमहाद्वीप में उत्तर भारत की भाषाएँ और दक्षिण भारत की भाषाएँ ध्वनि और संरचना में भिन्न हैं।
समाज की संस्कृति भी भाषा को गढ़ती है। जिन समाजों में संगीत और काव्य की परम्परा अधिक होती है वहाँ भाषा अधिक लयात्मक होती है। भारतीय भाषाओं में छंद, अलंकार और ध्वनि सौंदर्य इसी सांस्कृतिक परम्परा के कारण विकसित हुए।
मनुष्य के अनुभव जितने व्यापक होते जाते हैं, भाषा भी उतनी ही विस्तृत होती जाती है। कृषि के विकास के साथ कृषि से जुड़े शब्द बने, व्यापार के साथ व्यापार की शब्दावली विकसित हुई, विज्ञान के साथ वैज्ञानिक शब्द बने।
भाषा से लिपि तक की यात्रा
ध्वनि क्षणभंगुर होती है; वह उच्चारित होते ही आकाश में विलीन हो जाती है। जब मनुष्य को लगा कि उसके अनुभव और ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजना आवश्यक है, तब लिपि का उदय हुआ।
भाषा पहले जन्म लेती है, लिपि बाद में बनती है। हज़ारों वर्षों तक मानव समाज केवल बोली जाने वाली भाषाओं के माध्यम से ही संवाद करता रहा।
जब सभ्यता विकसित हुई, राज्य बने, व्यापार बढ़ा और ज्ञान को सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई, तब लिपि का निर्माण हुआ।
प्रारम्भ में चित्रों के माध्यम से भाव व्यक्त किए जाते थे। मिस्र की चित्रलिपि इसका उदाहरण है। धीरे-धीरे चित्र संकेतों में बदल गए और फिर ध्वनियों के प्रतीकों में परिवर्तित हो गए।
चित्र लिपि: सर्वप्रथम मनुष्य ने गुफाओं की दीवारों पर शिकार और उत्सवों के चित्र उकेरे। ये चित्र ही विचारों के प्रथम संवाहक थे।
भाव लिपि: जब चित्रों के माध्यम से सूक्ष्म भावों (जैसे प्रेम, क्रोध, भूख) को दर्शाना कठिन हुआ, तब विशेष रेखाओं और प्रतीकों का प्रयोग बढ़ा।
ध्वनि लिपि: यह विकास की चरम अवस्था थी, जहाँ प्रत्येक उच्चारित ध्वनि के लिए एक विशिष्ट चिह्न (वर्ण) नियत किया गया। जैसे ‘अ’ ध्वनि के लिए देवनागरी का आकार।
भारत में भी लिपि का विकास इसी प्रकार हुआ। ब्राह्मी लिपि को भारतीय लिपियों की जननी माना जाता है। इसी से आगे चलकर देवनागरी, बँगला, गुजराती, कन्नड़, तेलुगु आदि लिपियों का विकास हुआ।
लिपि भाषा को ‘देह’ प्रदान करती है, जिससे वह कालजयी बन जाती है।
भाषा के फैलाव की प्रक्रिया
किसी भाषा का फैलाव केवल शब्दों के कारण नहीं होता, बल्कि समाज के प्रभाव से होता है।
जब कोई भाषा किसी शक्तिशाली राज्य की भाषा बन जाती है, तब उसका प्रसार तेज़ हो जाता है। व्यापार, शिक्षा, साहित्य और धर्म भी भाषा के फैलाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उदाहरण के लिए संस्कृत प्राचीन भारत की विद्या और धर्म की भाषा थी, इसलिए उसका प्रभाव पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर पड़ा। इसी प्रकार अंग्रेज़ी आज वैश्विक भाषा बन गई है क्योंकि आधुनिक विज्ञान, तकनीक और व्यापार में उसका व्यापक उपयोग होता है।
बोलचाल में प्रसार और जनभाषा का स्वरूप
कोई भी भाषा राजप्रासादों में नहीं, बल्कि गलियों, चौपालों और हाट-बाजारों में फलती-फूलती है। जब कोई विशिष्ट बोली अपने स्थानीय परिवेश से निकलकर व्यापक जनसमूह द्वारा अपनाई जाती है, तो वह जनभाषा बन जाती है।
लोक-संपर्क: व्यापारी, घुमंतू बंजारे और साधु-संत भाषा के प्रसार के सबसे बड़े माध्यम रहे हैं। उदाहरण स्वरूप, कबीर की ‘सधुक्कड़ी’ भाषा ने विभिन्न अंचलों के शब्दों को समेटकर एक जन-संवाद का सेतु बनाया।
स्थानीय पुट: भाषा जब फैलती है, तो वह स्थानीय जलवायु और उच्चारण की आदतों से प्रभावित होती है। जैसे ब्रज की कोमलता, बुंदेलखंडी की ठसक और अवधी की मिठास। पानी कहीं ‘जल’ है, तो कहीं नीर और लोक में कहीं पानी।
सांस्कृतिक विनिमय: जब दो भिन्न संस्कृतियाँ मिलती हैं, तो शब्दों का आदान-प्रदान होता है। हिंदी में अरबी, फ़ारसी और तुर्की शब्दों का समावेश इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
भारत में संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ।
उदाहरण के लिए हिंदी का उद्भव अपभ्रंश की विभिन्न बोलियों से हुआ। धीरे-धीरे खड़ी बोली ने साहित्यिक स्वरूप प्राप्त किया और आधुनिक हिंदी का निर्माण हुआ।
व्याकरण-अनुशासन की मर्यादा
बिना व्याकरण के भाषा उच्छृंखल हो जाती है। व्याकरण वह शास्त्र है जो भाषा के अनगढ़ स्वरूप को तराशकर उसे परिनिष्ठित बनाता है।
नियमन: जब भाषा का विस्तार अधिक हो जाता है, तब अर्थ की स्पष्टता के लिए व्याकरणिक ढाँचा तैयार किया जाता है। लिंग, वचन, कारक और काल के अनुशासन से भाषा में एकरूपता आती है।
मानकीकरण: व्याकरण ही वह तत्त्व है जो बोली को भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करता है। पाणिनी का अष्टाध्यायी इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है, जिसने संस्कृत को एक अभेद्य और वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया।
भाषा का विकास क्रम
भाषा स्थिर नहीं होती, वह निरंतर बदलती रहती है। समय के साथ शब्द बदलते हैं, उच्चारण बदलता है और नए शब्द जुड़ते जाते हैं।
भाषा का विकास चक्र सरलता की ओर होता है। मनुष्य हमेशा कठिन ध्वनियों को सरल बनाने का प्रयास करता है।
उदाहरण के लिए हिंदी में आज अनेक अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग सामान्य हो गया है जैसे ट्रेन, मोबाइल, इंटरनेट।
इसी प्रकार संस्कृत के अनेक शब्द आधुनिक भारतीय भाषाओं में अलग अलग रूपों में जीवित हैं।
संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म इसी सरलीकरण का परिणाम है।
“भाषा बहता नीर है।”
यह रुकती नहीं, सड़ती नहीं। यह निरंतर नए प्रयोगों, नई तकनीकी शब्दावली और युवा पीढ़ी के मुहावरों को आत्मसात करती हुई आगे बढ़ती है। आज की ‘हिंग्लिश’ या इंटरनेट की भाषा भी इसी विकास क्रम का एक पड़ाव मात्र है।
जनभाषा का स्वरूप:
जनभाषा वह होती है जो जनता के जीवन से जुड़ी होती है। उसमें कृत्रिमता नहीं होती, वह सहज और प्रवाहपूर्ण होती है।
जनभाषा में लोकगीत होते हैं, कहावतें होती हैं, मुहावरे होते हैं। यही तत्त्व भाषा को जीवंत बनाते हैं।
भाषा के विकास में साहित्य की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कवि और लेखक भाषा को नया सौंदर्य और नई अभिव्यक्ति देते हैं।
तुलसीदास ने अवधी को अमर बना दिया, सूरदास ने ब्रजभाषा को काव्य की भाषा बना दिया और आधुनिक काल में प्रेमचंद ने हिंदी को जनजीवन की भाषा बना दिया।
जब साहित्यकार जनभाषा को अपनाते हैं तब भाषा में नई शक्ति आती है। यही कारण है कि महान साहित्य अक्सर जनभाषा में ही लिखा गया है।
भाषा का जन्म मानव की आवश्यकता से होता है, उसका विकास समाज के अनुभवों से होता है और उसकी समृद्धि संस्कृति और साहित्य से होती है।
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, वह एक सभ्यता की आत्मा होती है। उसमें इतिहास भी होता है, संस्कृति भी और भविष्य की संभावनाएँ भी।
जब कोई भाषा जीवित रहती है तो उसके साथ एक पूरी संस्कृति जीवित रहती है। इसलिए भाषा का संरक्षण और विकास केवल भाषाविदों का कार्य नहीं बल्कि पूरे समाज की ज़िम्मेदारी है।
भाषा का जन्म मानवीय जिजीविषा और संवाद की अदम्य इच्छा का प्रतिफल है। भौगोलिक सीमाओं को लाँघकर जब शब्द एक हृदय से दूसरे हृदय तक पहुँचते हैं, तभी एक समर्थ सभ्यता का निर्माण होता है। लिपि उसे इतिहास देती है, व्याकरण उसे मर्यादा और जनभाषा उसे प्राणवायु।
मानव की चेतना जब शब्दों में ढलती है तो भाषा जन्म लेती है और जब वही भाषा पीढ़ियों तक अनुभवों को सँजोकर आगे बढ़ाती है तो वह सभ्यता की अमर धरोहर बन जाती है।
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- कुण्डलिया – परशुराम
- कुण्डलिया – संयम
- कुण्डलियाँ स्वतंत्रता दिवस पर
- गणतंत्र दिवस
- दुर्मिल सवैया – डॉ. सुशील कुमार शर्मा – 001
- प्रदूषण और पर्यावरण चेतना
- शिव वंदना
- सायली छंद - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - चाँद
- सोशल मीडिया और युवावर्ग
- होली पर कुण्डलिया
लघुकथा
- अंतर
- अंतिम ऑनलाइन
- अंतिम बीज
- अनैतिक प्रेम
- अपनी जरें
- आँखों का तारा
- आओ तुम्हें चाँद से मिलाएँ
- उजाले की तलाश
- उसका प्यार
- एक बूँद प्यास
- काहे को भेजी परदेश बाबुल
- काग़ज़ का जंगल
- कोई हमारी भी सुनेगा
- गाय की रोटी
- गाय ‘पालन की परिभाषा’!
- जल देवता का क्रोध
- डर और आत्म विश्वास
- तहस-नहस
- तुलना का बोझ
- दूसरी माँ
- नारी ‘तुम मत रुको’!
- पति का बटुआ
- पत्नी
- पाँच लघु कथाएँ
- पौधरोपण
- प्लास्टिक का जंगल
- बेटी की गुल्लक
- मर्यादा का प्रेम
- माँ का ब्लैकबोर्ड
- माँ ‘छाया की तरह’!
- मातृभाषा
- माया
- मुझे छोड़ कर मत जाओ
- मुझे ‘बहने दो’!
- मौन पहाड़ का बदला
- म्यूज़िक कंसर्ट
- रिश्ते (डॉ. सुशील कुमार शर्मा)
- रौब
- वो पाँच मिनट
- शर्बत
- शिक्षक सम्मान
- शिक्षा की पाँच दीपशिखाएँ
- शुद्धि की प्रतीक्षा
- शेष शुभ
- सपनों की उड़ान
- स्मृतियों के अवशेष
- स्वार्थ की लक्ष्मण रेखा
- हर चीज़ फ़्री
- हिंदी–माँ की आवाज़
- हिन्दी इज़ द मोस्ट वैलुएबल लैंग्वेज
- ग़ुलाम
- ज़िन्दगी और बंदगी
- फ़र्ज़
सांस्कृतिक आलेख
- ओशो: रजनीश से बुद्धत्व तक, एक विद्रोही सद्गुरु की शाश्वत प्रासंगिकता
- कृष्ण: अनंत अपरिभाषा
- गणेश चतुर्थी: आस्था, संस्कृति और सामाजिक चेतना का महासंगम
- गीताजयंती कर्म, धर्म और जीवन दर्शन का महामहोत्सव
- चातुर्मास: आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति से सामंजस्य का पर्व
- जगन्नाथ रथयात्रा: जन-जन का पर्व, आस्था और समानता का प्रतीक
- नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान
- प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान
- ब्राह्मण: उत्पत्ति, व्याख्या, गुण, शाखाएँ और समकालीन प्रासंगिकता
- भगवान परशुराम: एक बहुआयामी व्यक्तित्व एवं समकालीन प्रासंगिकता
- मकर संक्रांति: एक विराट सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विमर्श
- मनुस्मृति: आलोचना से समझ तक
- वट सावित्री व्रत: आस्था, आधुनिकता और लैंगिक समानता की कसौटी
- वर्तमान समय में हनुमान जी की प्रासंगिकता
- शिव और शक्ति का महामिलन: महाशिवरात्रि का विराट दर्शन
- हरितालिका तीज: आस्था, शृंगार और भारतीय संस्कृति का पर्व
बाल साहित्य कविता
- अरे गिलहरी
- आओ बच्चों तुम्हें सुनाएँ
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - ठंड
- गर्मी की छुट्टी
- चिड़िया का दुःख
- चिड़िया की हिम्मत
- पतंग
- पानी बचाओ
- बादल भैया
- बाल कविताएँ – 001 : डॉ. सुशील कुमार शर्मा
- बेचारा गोलू
- मुनमुन गिलहरी
- मैं कुछ ख़ास बनूँगा
- मैं ही तो हूँ— तुम्हारे भीतर
- लोरी
- लौकी और कद्दू की लड़ाई
- हम हैं छोटे बच्चे
- होली चलो मनायें
स्मृति लेख
दोहे
- अटल बिहारी पर दोहे
- आदिवासी दिवस पर दोहे
- कबीर पर दोहे
- क्षण भंगुर जीवन
- गणपति
- गणेश उत्सव पर दोहे
- गुरु पर दोहे – 01
- गुरु पर दोहे – 02
- गुरु पर दोहे–03
- गोविन्द गीत— 001 प्रथमो अध्याय
- गोविन्द गीत— 002 द्वितीय अध्याय
- गोविन्द गीत— 003 तृतीय अध्याय
- गोविन्द गीत— 004 चतुर्थ अध्याय
- गोविन्द गीत— 005 पंचम अध्याय
- गोविन्द गीत— 006 षष्टम अध्याय
- गोविन्द गीत— 007 सप्तम अध्याय–भाग 1
- गोविन्द गीत— 007 सप्तम अध्याय–भाग 2
- चंद्रशेखर आज़ाद
- जल है तो कल है
- जीवन
- टेसू
- ठंड पर दोहे
- दीपावली पर दोहे
- नम्रता पर दोहे
- नरसिंह अवतरण दिवस पर दोहे
- नव वर्ष पर दोहे – 2026
- नवदुर्गा पर दोहे
- नववर्ष
- नूतन वर्ष
- प्रभु परशुराम पर दोहे
- प्रेम
- प्रेम पर दोहे
- प्रेमचंद पर दोहे
- फगुनिया दोहे
- बचपन पर दोहे
- बस्ता
- बाबा साहब अम्बेडकर जयंती पर कुछ दोहे
- बाल हनुमान पर दोहे
- बुद्ध
- बेटी पर दोहे
- मकर संक्रांति
- मधुमास वसंत पर दोहे
- मित्रता पर दोहे–01
- मित्रता पर दोहे–02
- मैं और स्व में अंतर
- रक्षाबंधन पर दोहे
- रक्षाबंधन पर दोहे
- राम और रावण
- वट सावित्री व्रत पर दोहे
- वसंत पंचमी पर माँ शारदे की आराधना के दोहे
- विवेक
- विवेकानंद जी पर दोहे
- शिक्षक पर दोहे
- शिक्षक पर दोहे - 2022
- श्रम की रोटी पर दोहे
- श्री राधा पर दोहे
- संग्राम
- सूरज को आना होगा
- स्वतंत्रता दिवस पर दोहे
- हमारे कृष्ण
- हरितालिका व्रत पर दोहे
- हिंदी पर दोहे
- होली
कहानी
- अधूरी देहरी का मौन
- अर्जुन से आर्यन तक: आभासी दुनिया का सच
- अर्द्धांगिनी
- जड़ों से जुड़ना
- जल कुकड़ी
- जाको राखे सांइयाँ
- जीवन संग्राम
- त्रिवेणी संगम
- दरकता मन
- पद्मावती
- पुरानी नींव, नए मकान
- पूर्ण अनुनाद
- प्रेम सम्मान
- बुआ की राखी
- ब्रह्मराक्षस का अभिशाप
- मंदबुद्धि
- मन के एकांत में
- मैडम एम
- मौन की परछाइयाँ
- राखी का फ़र्ज़
- रिश्तों की गर्माहट
- रिश्तों के रेशमी धागे
- रेशमी धागे: सेवा का नया पथ
- हरसिंगार
- ज़िन्दगी सरल है पर आसान नहीं
काम की बात
सामाजिक आलेख
- अध्यात्म और विज्ञान के अंतरंग सम्बन्ध
- अबला निर्मला सबला
- आप अभिमानी हैं या स्वाभिमानी ख़ुद को परखिये
- आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और गूगल के वर्तमान संदर्भ में गुरु की प्रासंगिकता
- करवा चौथ बनाम सुखी गृहस्थी
- करवा चौथ व्रत: श्रद्धा की पराकाष्ठा या बाज़ार का विस्तार?
- कृत्रिम मेधा (AI): वरदान या अभिशाप?
- गाँधी के सपनों से कितना दूर कितना पास भारत
- गाय की दुर्दशा: एक सामूहिक अपराध की चुप्पी
- गौरैया तुम लौट आओ
- जीवन संघर्षों में खिलता अंतर्मन
- नकारात्मक विचारों को अस्वीकृत करें
- नब्बे प्रतिशत बनाम पचास प्रतिशत
- नया वर्ष कैलेंडर का पन्ना नहीं, आत्ममंथन का अवसर
- नव वर्ष की चुनौतियाँ एवम् साहित्य के दायित्व
- पर्यावरणीय चिंतन
- बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर: समता, न्याय और नवजागरण के प्रतीक
- भारतीय जीवन मूल्य
- भारतीय संस्कृति में मूल्यों का ह्रास क्यों
- माँ नर्मदा की करुण पुकार
- मानव मन का सर्वश्रेष्ठ उल्लास है होली
- मानवीय संवेदनाएँ वर्तमान सन्दर्भ में
- वाह रे पर्यावरण दिवस!
- विश्व पर्यावरण दिवस – वर्तमान स्थितियाँ और हम
- वृद्धजन—अतीत के प्रकाश स्तंभ और भविष्य के सेतु
- वेदों में नारी की भूमिका
- वेलेंटाइन-डे और भारतीय संदर्भ
- व्यक्तित्व व आत्मविश्वास
- शिक्षक पेशा नहीं मिशन है
- शिक्षण का वर्तमान परिदृश्य: चुनौतियाँ, अपेक्षाएँ और भावी दिशा
- संकट की घड़ी में हमारे कर्तव्य
- सम्बन्ध और स्वार्थ का द्वंद्व
- सम्बन्धों का क्षरण: एक सामाजिक विमर्श
- स्वतंत्रता दिवस: गौरव, बलिदान, हमारी ज़िम्मेदारी और स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत
- स्वामी विवेकानंद: आधुनिक भारत के आध्यात्मिक महाप्राण
- हिंदी और रोज़गार: भाषा से अवसरों की नई दुनिया
- हैलो मैं कोरोना बोल रहा हूँ
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
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सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- अमृत काल का आम
- एक कप चाय और सौ जज़्बात
- कविता बेचो, कविता सीखो!
- काश मैं नींबू होता
- गुरु दक्षिणा का नया संस्करण—व्हाट्सएप वाला प्रणाम!
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- डॉ. सिंघई का ‘संतुलित’ संसार
- नवदुर्गा महोत्सव और मोबाइल
- न्याय की गली में कुत्तों का दरबार
- प्रोफ़ाइल पिक की देशभक्ति
- मातृ दिवस और पितृ दिवस: कैलेंडर पर टँगे शब्द
- मिठाइयों में बसा मनुष्य का मनोविज्ञान
- वाघा का विघटन–जब शेर भी कन्फ्यूज़ हो गया
- शर्मा जी और सब्ज़ी–एक हरी-भरी कथा
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