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भाषा का उद्भव और विकास: मानवीय चेतना की अभिव्यक्ति

 

​भाषा केवल ध्वनियों का समूह नहीं, अपितु मानवीय संवेदना, संस्कृति और वैचारिक क्रांति की संवाहिता है। किसी भाषा का जन्म आकस्मिक नहीं होता, बल्कि यह युगों की साधना, सामाजिक अंतःक्रिया और भौगोलिक परिस्थितियों का प्रतिफल होती है। भाषा का सृजन शून्य में नहीं, बल्कि ‘आवश्यकता’ की कोख से होता है। 

भाषा का जन्म: मानव चेतना की सबसे अद्भुत यात्रा

मानव सभ्यता के विकास का इतिहास यदि ध्यान से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धियों में भाषा का आविष्कार है। भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि वह मनुष्य की चेतना, संस्कृति, अनुभव और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है। जब मनुष्य ने पहली बार अपने भीतर उठते विचारों और भावों को ध्वनियों के माध्यम से व्यक्त किया, तभी भाषा के जन्म की प्रक्रिया आरम्भ हुई।

भाषा का जन्म किसी एक दिन या किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं होता। यह धीरे-धीरे मानव समाज के सामूहिक अनुभवों, आवश्यकताओं और परिस्थितियों से विकसित होती है। जैसे नदी का उद्गम किसी एक स्रोत से नहीं बल्कि अनेक छोटी धाराओं से होता है, वैसे ही भाषा का निर्माण भी अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक कारकों से मिलकर होता है। 

भाषा के जन्म की परिस्थितियाँ

मानव सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में मनुष्य का जीवन अत्यंत सरल किन्तु संघर्षपूर्ण था। वह जंगलों में रहता था, शिकार करता था, समूहों में रहता था और प्रकृति से निरंतर जूझता था। उस समय उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता थी संवाद की।

भाषा के प्रादुर्भाव के मूल में मनुष्य की सामाजिकता और अपनी अनुभूतियों को साझा करने की तीव्र उत्कंठा रही है। जब आदिम मानव ने समूह में रहना प्रारंभ किया, तब अस्तित्व की रक्षा हेतु संकेतों और अस्पष्ट ध्वनियों की सीमाएँ समाप्त होने लगीं। 

प्रकृति की ध्वनियों बादलों का गर्जन, पक्षियों का कलरव या जल का निनाद के अनुकरण से प्रारंभिक शब्दों का जन्म हुआ। जैसे काँव-काँव से कौआ और मर्मर से पत्तों की आवाज़। 

प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति जैसे भय, हर्ष, विस्मय और पीड़ा जैसी मौलिक संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए कंठ से निकली विशेष ध्वनियाँ कालांतर में शब्दों का रूप ले बैठीं। 

सामूहिक श्रम (जैसे भारी पत्थर उठाना या शिकार करना) के समय ऊर्जस्वित होने के लिए मुख से निकले स्वर ‘हइशा’ या ‘हुंकार’ ने भाषाई लय को जन्म दिया।

भाषा निर्माण के प्रमुख कारक
भाषा का निर्माण कई कारकों से प्रभावित होता है। इनमें प्रमुख हैं सामाजिक जीवन, भौगोलिक परिस्थितियाँ, सांस्कृतिक परम्पराएँ और मानवीय अनुभव। 

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समूह में रहता है और समूह के साथ संवाद की आवश्यकता ही भाषा के विकास को जन्म देती है। जितना जटिल समाज होता जाता है, उतनी ही भाषा भी समृद्ध होती जाती है। 

भाषाओं के स्वर और शब्दावली पर भौगोलिक परिस्थितियों का गहरा प्रभाव होता है। पर्वतीय क्षेत्रों की भाषाएँ अक्सर कठोर ध्वनियों से युक्त होती हैं, जबकि नदी घाटियों की भाषाओं में मधुरता अधिक होती है।

उदाहरण के लिए भारतीय उपमहाद्वीप में उत्तर भारत की भाषाएँ और दक्षिण भारत की भाषाएँ ध्वनि और संरचना में भिन्न हैं। 

समाज की संस्कृति भी भाषा को गढ़ती है। जिन समाजों में संगीत और काव्य की परम्परा अधिक होती है वहाँ भाषा अधिक लयात्मक होती है। भारतीय भाषाओं में छंद, अलंकार और ध्वनि सौंदर्य इसी सांस्कृतिक परम्परा के कारण विकसित हुए। 

मनुष्य के अनुभव जितने व्यापक होते जाते हैं, भाषा भी उतनी ही विस्तृत होती जाती है। कृषि के विकास के साथ कृषि से जुड़े शब्द बने, व्यापार के साथ व्यापार की शब्दावली विकसित हुई, विज्ञान के साथ वैज्ञानिक शब्द बने। 

भाषा से लिपि तक की यात्रा

ध्वनि क्षणभंगुर होती है; वह उच्चारित होते ही आकाश में विलीन हो जाती है। जब मनुष्य को लगा कि उसके अनुभव और ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजना आवश्यक है, तब लिपि का उदय हुआ। 

भाषा पहले जन्म लेती है, लिपि बाद में बनती है। हज़ारों वर्षों तक मानव समाज केवल बोली जाने वाली भाषाओं के माध्यम से ही संवाद करता रहा।

जब सभ्यता विकसित हुई, राज्य बने, व्यापार बढ़ा और ज्ञान को सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई, तब लिपि का निर्माण हुआ।

प्रारम्भ में चित्रों के माध्यम से भाव व्यक्त किए जाते थे। मिस्र की चित्रलिपि इसका उदाहरण है। धीरे-धीरे चित्र संकेतों में बदल गए और फिर ध्वनियों के प्रतीकों में परिवर्तित हो गए।

​चित्र लिपि: सर्वप्रथम मनुष्य ने गुफाओं की दीवारों पर शिकार और उत्सवों के चित्र उकेरे। ये चित्र ही विचारों के प्रथम संवाहक थे।

​भाव लिपि: जब चित्रों के माध्यम से सूक्ष्म भावों (जैसे प्रेम, क्रोध, भूख) को दर्शाना कठिन हुआ, तब विशेष रेखाओं और प्रतीकों का प्रयोग बढ़ा।

ध्वनि लिपि: यह विकास की चरम अवस्था थी, जहाँ प्रत्येक उच्चारित ध्वनि के लिए एक विशिष्ट चिह्न (वर्ण) नियत किया गया। जैसे ‘अ’ ध्वनि के लिए देवनागरी का आकार। 

भारत में भी लिपि का विकास इसी प्रकार हुआ। ब्राह्मी लिपि को भारतीय लिपियों की जननी माना जाता है। इसी से आगे चलकर देवनागरी, बँगला, गुजराती, कन्नड़, तेलुगु आदि लिपियों का विकास हुआ। 

लिपि भाषा को ‘देह’ प्रदान करती है, जिससे वह कालजयी बन जाती है।

भाषा के फैलाव की प्रक्रिया

किसी भाषा का फैलाव केवल शब्दों के कारण नहीं होता, बल्कि समाज के प्रभाव से होता है।

जब कोई भाषा किसी शक्तिशाली राज्य की भाषा बन जाती है, तब उसका प्रसार तेज़ हो जाता है। व्यापार, शिक्षा, साहित्य और धर्म भी भाषा के फैलाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उदाहरण के लिए संस्कृत प्राचीन भारत की विद्या और धर्म की भाषा थी, इसलिए उसका प्रभाव पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर पड़ा। इसी प्रकार अंग्रेज़ी आज वैश्विक भाषा बन गई है क्योंकि आधुनिक विज्ञान, तकनीक और व्यापार में उसका व्यापक उपयोग होता है। 

बोलचाल में प्रसार और जनभाषा का स्वरूप

​कोई भी भाषा राजप्रासादों में नहीं, बल्कि गलियों, चौपालों और हाट-बाजारों में फलती-फूलती है। जब कोई विशिष्ट बोली अपने स्थानीय परिवेश से निकलकर व्यापक जनसमूह द्वारा अपनाई जाती है, तो वह जनभाषा बन जाती है।

​लोक-संपर्क: व्यापारी, घुमंतू बंजारे और साधु-संत भाषा के प्रसार के सबसे बड़े माध्यम रहे हैं। उदाहरण स्वरूप, कबीर की ‘सधुक्कड़ी’ भाषा ने विभिन्न अंचलों के शब्दों को समेटकर एक जन-संवाद का सेतु बनाया।

​स्थानीय पुट: भाषा जब फैलती है, तो वह स्थानीय जलवायु और उच्चारण की आदतों से प्रभावित होती है। जैसे ब्रज की कोमलता, बुंदेलखंडी की ठसक और अवधी की मिठास। पानी कहीं ‘जल’ है, तो कहीं नीर और लोक में कहीं पानी।

सांस्कृतिक विनिमय: जब दो भिन्न संस्कृतियाँ मिलती हैं, तो शब्दों का आदान-प्रदान होता है। हिंदी में अरबी, फ़ारसी और तुर्की शब्दों का समावेश इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

भारत में संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ।

उदाहरण के लिए हिंदी का उद्भव अपभ्रंश की विभिन्न बोलियों से हुआ। धीरे-धीरे खड़ी बोली ने साहित्यिक स्वरूप प्राप्त किया और आधुनिक हिंदी का निर्माण हुआ।

व्याकरण-अनुशासन की मर्यादा

​बिना व्याकरण के भाषा उच्छृंखल हो जाती है। व्याकरण वह शास्त्र है जो भाषा के अनगढ़ स्वरूप को तराशकर उसे परिनिष्ठित बनाता है।

​नियमन: जब भाषा का विस्तार अधिक हो जाता है, तब अर्थ की स्पष्टता के लिए व्याकरणिक ढाँचा तैयार किया जाता है। लिंग, वचन, कारक और काल के अनुशासन से भाषा में एकरूपता आती है।

​मानकीकरण: व्याकरण ही वह तत्त्व है जो बोली को भाषा के पद पर प्रतिष्ठित करता है। पाणिनी का अष्टाध्यायी इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है, जिसने संस्कृत को एक अभेद्य और वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया।

भाषा का विकास क्रम

भाषा स्थिर नहीं होती, वह निरंतर बदलती रहती है। समय के साथ शब्द बदलते हैं, उच्चारण बदलता है और नए शब्द जुड़ते जाते हैं।

भाषा का विकास चक्र सरलता की ओर होता है। मनुष्य हमेशा कठिन ध्वनियों को सरल बनाने का प्रयास करता है।

उदाहरण के लिए हिंदी में आज अनेक अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग सामान्य हो गया है जैसे ट्रेन, मोबाइल, इंटरनेट।

इसी प्रकार संस्कृत के अनेक शब्द आधुनिक भारतीय भाषाओं में अलग अलग रूपों में जीवित हैं।

संस्कृत से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश और अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म इसी सरलीकरण का परिणाम है। 

“भाषा बहता नीर है।”

यह रुकती नहीं, सड़ती नहीं। यह निरंतर नए प्रयोगों, नई तकनीकी शब्दावली और युवा पीढ़ी के मुहावरों को आत्मसात करती हुई आगे बढ़ती है। आज की ‘हिंग्लिश’ या इंटरनेट की भाषा भी इसी विकास क्रम का एक पड़ाव मात्र है। 

जनभाषा का स्वरूप:

जनभाषा वह होती है जो जनता के जीवन से जुड़ी होती है। उसमें कृत्रिमता नहीं होती, वह सहज और प्रवाहपूर्ण होती है।

जनभाषा में लोकगीत होते हैं, कहावतें होती हैं, मुहावरे होते हैं। यही तत्त्व भाषा को जीवंत बनाते हैं।

भाषा के विकास में साहित्य की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कवि और लेखक भाषा को नया सौंदर्य और नई अभिव्यक्ति देते हैं।

तुलसीदास ने अवधी को अमर बना दिया, सूरदास ने ब्रजभाषा को काव्य की भाषा बना दिया और आधुनिक काल में प्रेमचंद ने हिंदी को जनजीवन की भाषा बना दिया।

जब साहित्यकार जनभाषा को अपनाते हैं तब भाषा में नई शक्ति आती है। यही कारण है कि महान साहित्य अक्सर जनभाषा में ही लिखा गया है। 

भाषा का जन्म मानव की आवश्यकता से होता है, उसका विकास समाज के अनुभवों से होता है और उसकी समृद्धि संस्कृति और साहित्य से होती है।

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, वह एक सभ्यता की आत्मा होती है। उसमें इतिहास भी होता है, संस्कृति भी और भविष्य की संभावनाएँ भी।

जब कोई भाषा जीवित रहती है तो उसके साथ एक पूरी संस्कृति जीवित रहती है। इसलिए भाषा का संरक्षण और विकास केवल भाषाविदों का कार्य नहीं बल्कि पूरे समाज की ज़िम्मेदारी है।

भाषा का जन्म मानवीय जिजीविषा और संवाद की अदम्य इच्छा का प्रतिफल है। भौगोलिक सीमाओं को लाँघकर जब शब्द एक हृदय से दूसरे हृदय तक पहुँचते हैं, तभी एक समर्थ सभ्यता का निर्माण होता है। लिपि उसे इतिहास देती है, व्याकरण उसे मर्यादा और जनभाषा उसे प्राणवायु।

मानव की चेतना जब शब्दों में ढलती है तो भाषा जन्म लेती है और जब वही भाषा पीढ़ियों तक अनुभवों को सँजोकर आगे बढ़ाती है तो वह सभ्यता की अमर धरोहर बन जाती है। 

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