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ब्रह्म-घोष


(अक्षय तृतीया पर कविता)

 

अक्षय पुण्य की पावन बेला,
 जाग्रत ब्रह्म-तेज श्रीमान।
अक्षय तृतीया के सूरज का
शौर्य-अर्घ्य  से है सम्मान।
 
परशु और पोथी के संगम, 
का यह अमित सवेरा है।
जहाँ त्याग है नेतृत्व वहीं है, 
वहीं ज्ञान का घेरा है।
 
शास्त्रों की मर्यादा रक्षित, 
शस्त्रों की है धार यहाँ।
दानशीलता की परिपाटी, 
त्याग का पारावार यहाँ।
 
दधीचि की हड्डियों ने जब, 
दानव को संहारा था।
परहित के हित मिट जाने का,
वह संकल्प हमारा था।
 
याचक बनकर जो खड़ा रहा,
वह जग का भाग्य विधाता है।
स्वर्ण-दान की झड़ी लगा दे, 
वह ऐसा दानी दाता है।
 
मित्र सुदामा की गठरी में,
ब्रह्मांडों का सार छिपा।
राम चरित तुलसी के स्वर में,
युग का है संस्कार छिपा।
 
रणभेरी जब-जब गूँजी है,
चाणक्य नीति जब जागी है।
सत्ता जिसके चरणों में है,
ब्राह्मण केवल त्यागी है।
 
अन्याय के सम्मुख जिसने,
परशु अपना उठा लिया।
आततायी लोगों को फिर,
मिट्टी में ही मिला दिया।
 
ज्ञान-दीप की लौ में जिसने,
झोंकी अपनी काया है।
उसी विप्र के तप-बल पर ही,
टिकी हुई यह माया है।
 
त्याग तपस्या और तेज का,
हम पावन संकल्प करें
परशुराम के पद-चिह्नों पर,
नूतन सृजन विकल्प करें।
 
अक्षय तृतीया की आभा,
शौर्य-शिखर पर चमकेगी।
ब्राह्मण की नेतृत्व-शक्ति,
हर दम जग में दमकेगी।
 
अक्षय तृतीया एवं भगवान परशुराम जयंती की आपको सपरिवार हार्दिक मंगलकामनाएँ!
 

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