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सपनों की उड़ान

 

गाँव की मिट्टी की गली से रोज़ सुबह एक नन्ही बालिका, सुषमा, अपने बिखरे बाल और हाथ में पुरानी सी कॉपी लेकर स्कूल की ओर दौड़ती थी। घर में अक्सर यह ताना मिलता—“लड़की होकर इतना पढ़-लिख कर क्या करेगी? रसोई ही तो सँभालनी है।” लेकिन उसकी आँखों में सपनों की चमक किसी नदी की लहरों की तरह थी—न रुकने वाली, न थमने वाली। 

एक दिन कक्षा में अध्यापिका से उसने पूछा, “मैडम, क्या मैं भी हवाई जहाज़ उड़ाना सीख सकती हूँ?” 

मैडम मुस्कराईं, “क्यों नहीं, बेटा? आकाश सबके लिए खुला है।” 

उस दिन से सुषमा की दुनिया बदल गई। अब वह हर सवाल के पीछे अपने सपनों का पंख खोजती। किताबों के पन्ने उसके लिए सीढ़ियाँ बन गए, और हौसले की उड़ान ने उसे बाँधने वाली हर बेड़ी तोड़ दी। 

सालों बाद वही बालिका, पायलट की वर्दी में गाँव के बच्चों से कह रही थी—“सपने लड़कियों और लड़कों के लिए अलग नहीं होते, फ़र्क़ बस इतना है कि हमें अपने सपनों पर यक़ीन करना होता है।” 

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