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विवेक हॉस्टल रूम नंबर 186

 

पुरानी अलमारी के एक कोने में दबा हुआ वह पहचान पत्र जब वर्षों बाद हाथ में आया, तो लगा जैसे समय ने अचानक अपनी धूल झाड़ दी हो। हल्के नीले रंग का वह आई कार्ड केवल एक परिचय पत्र नहीं था, वह एक पूरे युग का प्रवेश द्वार था। उस पर लिखे शब्द—“UTD Dr. HSGVV Sagar” और नीचे मेरा नाम—“Sushil Sharma”—देखते ही स्मृतियों की परतें धीरे-धीरे खुलने लगीं। ऐसा लगा मानो डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय का पूरा परिसर फिर से जीवित होकर आँखों के सामने खड़ा हो गया हो। वही लाल मिट्टी की सड़कें, वही हवा में घुली युवावस्था की गंध, वही सपनों से भरे चेहरे, वही अनिश्चित भविष्य और वही अनंत उत्साह। 

सन् 1986 में जब मैंने डिपार्टमेंट ऑफ़ एप्लाइड जियोलॉजी में एम.टेक. में प्रवेश लिया था, तब मन में एक अलग ही गर्व था। उन दिनों इंजीनियरिंग से इतर विषयों में एम.टेक. की डिग्री बहुत कम विश्वविद्यालयों में उपलब्ध थी। और फिर सागर विश्वविद्यालय का भूगर्भ शास्त्र विभाग जिसे देश के विख्यात भूवैज्ञानिक डब्ल्यू.डी. वेस्ट ने स्थापित करवाया था उसकी प्रतिष्ठा पूरे देश में थी। उस समय भूगर्भ शास्त्र केवल एक विषय नहीं लगता था, वह पृथ्वी के भीतर छिपे समय का इतिहास प्रतीत होता था। पत्थरों को देखकर उनकी उम्र बताना, जीवाश्मों में लाखों वर्षों की कहानी पढ़ना, मिट्टी की परतों में समय के पदचिह्न ढूँढ़ना इन सबमें एक विचित्र रोमांच था। हम स्वयं को केवल विद्यार्थी नहीं, पृथ्वी के इतिहास का पाठक समझते थे। 

विभागाध्यक्ष श्री मूर्ति सर अपने व्यक्तित्व में अनुशासन और गरिमा का अद्भुत संतुलन लिए हुए थे। उनका कक्षा में प्रवेश करना ही वातावरण बदल देता था। वे कम बोलते थे, पर जो बोलते थे उसमें ज्ञान की गंभीरता होती थी। प्रोफ़ेसर दास की शैली बिल्कुल अलग थी। वे पढ़ाते कम और विषय को जीते अधिक थे। प्रोफ़ेसर दुर्गे का व्यावहारिक ज्ञान छात्रों के लिए ख़ज़ाना था, जबकि प्रोफ़ेसर अलेक्जेंडर के व्याख्यानों में अंग्रेज़ी का ऐसा प्रभाव होता था कि आधा समय शब्द समझने में निकल जाता था और आधा उनके व्यक्तित्व को देखने में। प्रोफ़ेसर बाबू अपने सहज व्यवहार के कारण विद्यार्थियों में अत्यंत लोकप्रिय थे। विभाग का हर शिक्षक अपने आप में एक अलग संसार था और हम उन संसारों के बीच अपनी युवा आकांक्षाओं को आकार दे रहे थे। 

मेरा निवास विवेक हॉस्टल के कमरा नंबर 186 में था। वह कमरा आज भी स्मृतियों में उसी तरह सुरक्षित है जैसे किसी पुराने चलचित्र का स्थिर दृश्य। लोहे का पलंग, किताबों से भरी मेज़, दीवारों पर फ़िल्मी पोस्टर, आधी रात तक चलती चर्चाएँ, चाय के दाग वाले कप और भविष्य के असंख्य अधूरे नक़्शे सब कुछ आज भी भीतर कहीं जीवित है। हॉस्टल वास्तव में केवल रहने की जगह नहीं था; वह युवा जीवन की प्रयोगशाला था, जहाँ मित्रता, संघर्ष, प्रेम, राजनीति, विद्रोह और सपने एक साथ पकते थे। 

उन दिनों रैगिंग का बहुत चलन था। आज की पीढ़ी शायद उसकी कठोरता को समझ भी न सके। हमारी भी रैगिंग हुई, पर सौभाग्य से कुछ वरिष्ठ छात्रों से अच्छी पटरी होने के कारण हम अपेक्षाकृत बच गए। फिर भी पहली रातों का भय आज भी याद है। रात होते ही कमरे के बाहर क़दमों की आहट सुनकर दिल की धड़कन तेज़ हो जाती थी। कभी गाना गाने को कहा जाता, कभी फ़िल्मी डायलॉग बोलने को, कभी किसी काल्पनिक प्रेमिका के नाम पत्र लिखने को। उस समय यह सब अपमान जैसा लगता था, पर बाद में वही सीनियर सबसे बड़े संरक्षक बन गए। यही विश्वविद्यालय जीवन का विचित्र सत्य है जो लोग पहले डराते हैं, वही बाद में सबसे अधिक अपनापन देते हैं। 

हॉस्टल जीवन का सबसे स्वादिष्ट अध्याय था “सुरेश समोसे वाले” की आवाज़। आज के बड़े-बड़े कैफ़े और फ़ूड कोर्ट भी उस थैले का मुक़ाबला नहीं कर सकते। शाम होते ही वहाँ हॉस्टल के गलियारों में विद्यार्थियों की भीड़ लग जाती थी। समोसे की ख़ुश्बू, गर्म चाय और साथियों की हँसी मिलकर ऐसा वातावरण बनाती थी जिसमें भविष्य की सारी चिंताएँ कुछ देर के लिए ग़ायब हो जाती थीं। कई बार जेब में पैसे कम होते थे, पर सुरेश भाई का विश्वास बड़ा था। वे जानते थे कि विश्वविद्यालय के लड़के भूखे रह सकते हैं, उधार नहीं भूलते। 

वह समय फ़िल्मों के ज़बरदस्त नशे का भी था। नब्बे का दशक अभी पूरी तरह आया नहीं था, पर उसकी आहट सुनाई देने लगी थी। सागर की लगभग हर टॉकीज हमारे छात्र जीवन का हिस्सा थी। नई फ़िल्म लगते ही पूरी टोली योजना बनाती। कई बार क्लास छोड़कर फ़िल्म देखने जाना भी किसी राष्ट्रीय आंदोलन जैसा रोमांच देता था। टिकट ब्लैक में लेना, सीटियों और तालियों के बीच फ़िल्म देखना, और लौटते समय हीरो बनने की कोशिश करना युवावस्था के वे छोटे-छोटे पागलपन आज स्मृतियों के सबसे चमकीले रंग हैं। 

विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई और मटरगश्ती का संसार नहीं था; वहाँ राजनीति भी धड़कती थी। छात्रसंघ चुनावों का माहौल पूरे परिसर को किसी लोकतांत्रिक युद्धभूमि में बदल देता था। भाषण, पोस्टर, नारे, गुटबाज़ी और रात-रात भर चलने वाली रणनीतियाँ सब कुछ विद्यार्थियों को समय से पहले राजनीतिक बना देता था। उन्हीं दिनों वर्तमान मंत्री श्री गोविंद राजपूत छात्र राजनीति में सक्रिय थे। चुनाव में उनकी हार और उसके बाद का तनाव आज भी याद है। हॉस्टल के गलियारों में बहसें इतनी तीखी हो जाती थीं मानो संसद यहीं चल रही हो। कई बार बहसें हाथापाई तक पहुँच जाती थीं। दरवाज़े टूटते थे, कुर्सियाँ उड़ती थीं और अगले दिन वही लोग साथ बैठकर चाय पीते दिखाई देते थे। 

1984 की वह घटना आज भी रोंगटे खड़े कर देती है जब हॉस्टल के विद्यार्थियों और पुलिस के बीच झड़प हुई थी। उस रात विश्वविद्यालय परिसर में भय और विद्रोह दोनों एक साथ तैर रहे थे। पुलिस ने छात्रों को बुरी तरह पीटा था। कई छात्र घायल हुए। हॉस्टल के कमरों में सन्नाटा और आक्रोश दोनों भरे हुए थे। हम युवा थे, इसलिए भीतर कहीं यह विश्वास भी था कि दुनिया बदल सकते हैं। शायद हर पीढ़ी अपनी युवावस्था में यही सोचती है। 

लेकिन विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी स्मृति न राजनीति है, न रैगिंग, न फ़िल्में। सबसे बड़ी स्मृति है मित्रता। वे मित्र जो रक्त सम्बन्धी नहीं थे, पर परिवार से कम भी नहीं थे। रात दो बजे किसी के कमरे में जाकर घंटों जीवन पर चर्चा करना, परीक्षा से पहले नोट्स बाँटना, प्रेम असफल होने पर कंधा देना, बीमारी में दवा लाना यही विश्वविद्यालय जीवन की वास्तविक पूँजी थी। उन दिनों मोबाइल नहीं थे, पर संवाद अधिक थे। सुविधाएँ कम थीं, पर सम्बन्ध अधिक सच्चे थे। 

आज जब वर्षों बाद उस पहचान पत्र को देखता हूँ, तो महसूस होता है कि वह केवल एक छात्र का परिचय पत्र नहीं था। वह उस समय का प्रमाण था जब सपने बहुत बड़े थे और जेब बहुत छोटी। जब भविष्य अनिश्चित था, पर आत्मविश्वास असीम। जब हम पत्थरों और जीवाश्मों का अध्ययन करते-करते स्वयं भी समय की चट्टानों पर अपनी युवावस्था के निशान अंकित कर रहे थे। 

डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय ने केवल डिग्री नहीं दी; उसने जीवन का एक ऐसा मौसम दिया जिसकी सुगंध आज भी स्मृतियों में बसी हुई है। विवेक हॉस्टल का कमरा नंबर 186 अब शायद बदल चुका होगा, दीवारों का रंग बदल गया होगा, वहाँ रहने वाले चेहरे भी बदल गए होंगे, पर मेरे भीतर वह कमरा अब भी वैसा ही है युवावस्था की अधूरी कविताओं, अनगिनत सपनों और अनकही बातों से भरा हुआ। 

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