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बहुआयामी कविताएँ

 

कविताएँ
केवल शब्दों का अनुशासन नहीं होतीं
वे चेतना की वह खुली खिड़की होती हैं
जहाँ से समय, समाज और आत्मा
एक साथ झाँकते हैं।
 
कविता
लिखी नहीं जाती
क्योंकि लिखना तो केवल
क़लम की गति है
कविता तो
मन के उन कोनों से बहती है
जहाँ स्मृतियाँ
अनकहे प्रश्नों से उलझी होती हैं
जहाँ पीड़ा
मौन साधे बैठी रहती है
और प्रेम
अपनी परिभाषा खोजता रहता है।
 
बहते हुए शब्द
कभी नदी नहीं बनते
वे तो धाराएँ होती हैं
जो पाठक के हृदय में उतरकर
उसके अनुभवों से मिल जाती हैं।
यहीं
कवि का एकांत
पाठक की भीड़ में बदल जाता है
और कविता
संवाद बन जाती है।
 
यह संवाद
केवल सुनने का नहीं होता
यह भीतर तक
हिलोर मारता है
हृदय की सतह पर नहीं
उसके तलघर में जाकर
अनुभूतियों को जगाता है।
जहाँ
रेतीले कोने हैं
जहाँ भावनाएँ
सूखी प्रतीत होती हैं
वहीं कविता
नमी छोड़ जाती है।
 
कविता
न तो उपदेश है
न प्रदर्शन
यह आत्मा की धीमी पदचाप है
जो पाठक के भीतर
अपना घर बना लेती है।
वह पाठक
जो स्वयं को कविता में खोजता है
और कविता में
स्वयं को पाता है।
 
इसलिए
बहुआयामी कविताएँ
सार्थक संवाद लिए होती हैं
क्योंकि वे
कवि से निकलकर
पाठक में पूर्ण होती हैं
और समय के साथ
एक साझा अनुभूति बन जाती हैं।

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