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मैं हूँ ना

 

गाडरवारा शहर की उस संध्या में आकाश पर धूप का अंतिम स्पर्श ठहरा हुआ था। सूर्य मानो दिन के कंधों पर हाथ रखकर विदा ले रहा था। शहर अपनी सामान्य चहल-पहल में डूबा था, पर एक घर था जहाँ समय ठहर गया था।

वह घर कभी हँसी का आश्रम था। अब वह प्रतीक्षा का मठ बन चुका था।

उस घर में रहते थे विष्णुकांत आपटे। उम्र सत्तहत्तर वर्ष। सेवानिवृत्त प्राध्यापक। उनके चेहरे पर ज्ञान की शान्ति थी, पर आँखों में एक स्थायी प्रतीक्षा का धुँधलका भी था। 

उनका बेटा, आर्यन, विदेश में था। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर आसीन। उसकी सफलताओं की सूची लंबी थी, पर उसके जीवन में समय का अभाव सबसे बड़ा सत्य था।

विष्णुकांत जी की दिनचर्या सरल थी। सुबह उठकर तुलसी को जल देना, पुराने ग्रंथों के पन्ने पलटना, और फिर दरवाज़े की ओर देखना। 

डाकिया अब कम आता था, क्योंकि चिट्ठियों का युग समाप्त हो चुका था। अब संवाद स्क्रीन पर होता था, और संवेदनाएँ नेटवर्क के भरोसे जीवित थीं। 

हर शाम वे मोबाइल को हाथ में लेते। आर्यन का नाम देखते। कभी कॉल करते, कभी संदेश भेजते—“कैसे हो बेटा?”

अधिकतर उत्तर संक्षिप्त होता, “मैं ठीक हूँ, पापा। बहुत व्यस्त हूँ।” 

व्यस्तता एक ऐसा शब्द था, जिसने पिता और पुत्र के बीच की दूरी को वैधता दे दी थी।

एक दिन विष्णुकांत जी को हल्का बुख़ार हुआ। उन्होंने सोचा, मौसम का प्रभाव है। पर बुख़ार धीरे-धीरे उनके शरीर में स्थायी निवास बना बैठा।

डॉक्टर ने जाँच की। कुछ दवाइयाँ दीं। और एक मौन भी दिया, जिसे शब्दों में नहीं कहा गया, पर समझा जा सकता था।

उस रात विष्णुकांत जी ने बहुत देर तक छत को देखा। उन्हें लगा, छत पर समय की परछाइयाँ चल रही हैं।

उन्होंने अलमारी खोली। उसमें पुराने एलबम थे। आर्यन की बचपन की तस्वीरें। एक तस्वीर में आर्यन उनके कंधों पर बैठा था और हँस रहा था।

उन्होंने तस्वीर को छुआ। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। 

उन्हें याद आया, जब आर्यन छोटा था, तो रात में डरकर उनके पास आ जाता था। वे उसके सिर पर हाथ फेरते और कहते—“मैं हूँ ना।”

आज वही शब्द उनके भीतर गूँज रहे थे, ‘मैं हूँ ना’ पर अब यह आश्वासन देने वाला कोई नहीं था।

कुछ दिनों बाद उनकी तबीयत और बिगड़ गई। पड़ोसी, देशमुख जी, उन्हें अस्पताल ले गए। 

अस्पताल में मशीनों की आवाज़ें थीं। वहाँ जीवन को संख्याओं में मापा जाता था।

विष्णुकांत जी ने देशमुख जी से कहा, “आर्यन को मत बुलाइए। उसका काम बहुत महत्त्वपूर्ण है।” 

देशमुख जी ने पूछा, “पर वह आपका बेटा है।”

विष्णुकांत जी मुस्कराए, “इसीलिए तो नहीं बुला रहा हूँ।”

यह मुस्कान त्याग की अंतिम परिभाषा थी।

उस रात उन्होंने नर्स से काग़ज़ और क़लम माँगा। 

उन्होंने लिखना शुरू किया
“प्रिय आर्यन,

जब तुम यह पढ़ रहे होगे, तब मैं समय के उस पार जा चुका होऊँगा।

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है। तुम्हारी सफलता ही मेरी साधना का फल है। जब तुम छोटे थे, तो तुम्हारी उँगली पकड़कर मैंने तुम्हें चलना सिखाया था।

आज तुमने जीवन की दौड़ में बहुत आगे तक चलना सीख लिया है। अब पीछे मुड़कर मत देखना। क्योंकि पीछे केवल स्मृतियाँ होती हैं, और स्मृतियाँ कभी-कभी पाँव रोक देती हैं।”

उन्होंने क़लम रोक दी।

उनकी आँखों में न आँसू थे, न शिकायत। केवल एक गहरी शान्ति थी।

कुछ दिनों बाद एक सुबह, जब सूर्य उग रहा था, विष्णुकांत जी ने अंतिम साँस ली। 

देशमुख जी ने आर्यन को फोन किया। आर्यन उस समय एक महत्त्वपूर्ण प्रस्तुति में था। 
फोन की घंटी बजती रही। वह देखता रहा। पर उसने फोन नहीं उठाया।

कुछ घंटे बाद उसने फोन किया।

जब उसे समाचार मिला, तो कुछ क्षण के लिए उसका मन शून्य हो गया। 

पर अगले ही क्षण उसने अपने सहायक से कहा, “मेरी फ़्लाइट बुक कर दीजिए।”

वह आया। पर तब तक सब समाप्त हो चुका था। 

घर वैसा ही था। पर अब वहाँ कोई प्रतीक्षा नहीं थी।

मेज़ पर एक चिट्ठी रखी थी।

उसने चिट्ठी खोली। पढ़ा।

शब्द उसकी आँखों में उतरते गए। 

उसे लगा, वह अचानक बहुत छोटा हो गया है।

उसने चारों ओर देखा। दीवारें मौन थीं। पर उस मौन में एक प्रश्न था, क्या सफलता का मूल्य यही होता है? 

वह उस कुर्सी के पास गया, जहाँ उसके पिता बैठते थे।

उसने कुर्सी को छुआ।

कुर्सी ठंडी थी। 

उसने पहली बार समझा, समय किसी के लिए प्रतीक्षा नहीं करता। 

उसने मोबाइल निकाला। उसमें सैकड़ों संपर्क थे। पर उस सूची में अब एक नाम ऐसा था, जिसे वह कभी कॉल नहीं कर सकता था। 

वह बाहर आया। आकाश में बादल थे। उसे लगा, आकाश रो नहीं रहा, बल्कि उसे दर्पण दिखा रहा है। 

उसने धीरे से कहा, “पापा, मैंने सब कुछ पा लिया, पर आपको खो दिया।”

उस दिन पहली बार उसे अपनी उपलब्धियाँ शून्य लगीं। 

क्योंकि जीवन में कुछ सम्बन्ध ऐसे होते हैं, जिन्हें बाद में नहीं जिया जा सकता।

वे केवल उस समय ही जीवित रहते हैं, जब वे हमारे पास होते हैं। 

समय बीत गया। आर्यन ने अपने जीवन की गति धीमी कर दी। अब वह हर सुबह अपने घर के बाहर एक पौधे को जल देता था। उसे लगता, वह अपने पिता की स्मृति को सींच रहा है। 

वह जान गया था, जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि वह नहीं, जो हमें दुनिया देती है। बल्कि वह है, जो हमें अपने लोगों के साथ बिताए गए समय से मिलती है। 

क्योंकि अंत में, जब सब कुछ समाप्त हो जाता है, तब केवल एक ही प्रश्न शेष रहता है—क्या हमने अपने प्रियजनों को वह समय दिया, जिसके वे अधिकारी थे? 

और इस प्रश्न का उत्तर किसी बैंक, किसी कंपनी, या किसी उपलब्धि में नहीं मिलता।

यह उत्तर केवल हृदय में मिलता है।

और हृदय कभी झूठ नहीं बोलता। 

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