अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

सीता परित्याग पर दोहे

 

सन्नाटे में थी सभा, सम्मुख खड़ा समाज। 
कठिन घड़ी थी राम को, चुनना धर्म-जहाज॥
 
धोबी तो बस नाम था, संशय था चहुँ ओर। 
मर्यादा की डोर थी, खींची दोनों छोर॥
 
त्याग नहीं परित्याग था, सुधि लेना यह बात। 
जग के हित ही राम ने, सहे विरह के घात॥
 
लोक-लाज की कीच को, लेकर अपने अंग। 
सीता को रक्षित किया, होकर के बदरंग। 
 
शिक्षा, रक्षा साधना, सीता रहे अनाम। 
वाल्मीकि गुरु की शरण, भेजा पावन धाम॥
 
सिया ओर जो बाण थे, रोके अपने अंग। 
अपराधी सिय के बने, रहे नेह के संग॥
 
महल तपोवन है बना, त्यागे सब सुख-भोग। 
राम भोगते हैं विरह, जैसे कोई रोग॥
 
अग्नि परीक्षा राम की, अब तक जारी मीत। 
दुनिया बस लांछन गढ़े, समझे नहीं प्रतीत॥
 
मर्यादा थी सामने, रोये अंतस राम। 
राजधर्म सर्वोपरि, रिश्ते सब निष्काम॥
 
सिंहासन के साथ ही, बँधा कठोर विधान। 
राम हृदय अति कष्ट था, सुनकर निंदा गान॥
 
सीता जैसी पावनी, नहीं कभी थी त्याज्य। 
राज्य लोक अपवाद से, दग्ध प्रेम अविभाज्य। 
 
राम हृदय थी वेदना, आँसू रहे अघोष। 
राजमुकुट ने ढँक लिया, अंतस पीड़ा कोष॥
 
प्रेम अनश्वर दीप था, जलता रहा अनाम। 
राजधर्म को पाल कर, त्याग दिया निज धाम॥
 
वन पथ पर सीता चलीं, हृदय धीर विश्वास। 
पति की पीड़ा जानतीं, मौन रहा इतिहास॥

राजधर्म की धार पर, रखा हृदय निष्प्राण। 
निर्णय कठिन कठोर ही, करता पुरुष महान॥
 
त्याग बना संवाद तब, युग से करता बात। 
नेता पहले लोक का, फिर निज सुख की रात॥
 
राम न थे निष्कंप मन, थे संवेदन शील। 
चले राजपथ राम जी, हृदय चुभा कर कील॥
 
नाम सिया का अग्र है, पीछे राघव मान। 
पत्नी के सम्मान को, त्यागा निज सम्मान॥
 
प्रेमी ऐसा कौन जग, सहे जगत की रार। 
प्रिया-मान की ओट में, वार दिया संसार॥
 
प्रेम विरह की अग्नि में, तपकर हुआ उजास। 
रामचरित में है छुपा, सत्य त्याग इतिहास॥

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश!! 
|

मन को करें प्रकाशमय, भर दें ऐसा प्यार! हर…

अंकित
|

(स्थान-5 मात्रा उच्चारण)    'राना'…

अटल बिहारी पर दोहे
|

है विशाल व्यक्तित्व जिमि, बरगद का हो वृक्ष। …

अभिमान
|

  नित्य बचें अभिमान से, धैर्य धरें…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

दोहे

गीत-नवगीत

कविता

साहित्यिक आलेख

कविता-मुक्तक

लघुकथा

सांस्कृतिक आलेख

बाल साहित्य कविता

स्मृति लेख

कहानी

काम की बात

सामाजिक आलेख

कविता - हाइकु

ऐतिहासिक

कविता - क्षणिका

चिन्तन

व्यक्ति चित्र

किशोर साहित्य कहानी

सांस्कृतिक कथा

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

ललित निबन्ध

स्वास्थ्य

खण्डकाव्य

नाटक

रेखाचित्र

काव्य नाटक

यात्रा वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

अनूदित कविता

किशोर साहित्य कविता

एकांकी

ग़ज़ल

बाल साहित्य लघुकथा

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं