अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

वृद्ध—समय की धरोहर


(विश्व वृद्ध दिवस पर कविता-सुशील शर्मा)
 
समय की थाप पर झूमते क़दम, 
अब धीमे हो चले हैं, 
किन्तु इन क़दमों की थिरकन में
युगों का संगीत बसा है। 
 
चेहरे की झुर्रियाँ
सिर्फ़ बुढ़ापे की निशानियाँ नहीं, 
ये जीवन के युद्धों की पदक हैं, 
जो अनुभवों के रक्त से अर्जित हुए। 
 
वृद्ध
वे थके नहीं हैं, 
वे थम नहीं गए हैं, 
वे समाज की जड़ों में 
छिपा हुआ
वह जल हैं, 
जो वृक्ष को हरित बनाता है। 
 
आज का समय
कभी-कभी उन्हें
कोनों में धकेल देता है, 
अब इनका क्या काम
यह प्रश्न तलवार-सा चुभता है। 
 
पर कौन समझे
कि वही वृद्ध
कभी पिता बनकर सीढ़ी बने थे, 
माँ बनकर छाया बने थे, 
जिन्होंने बच्चों की हथेलियों में
सपनों के अक्षर लिखे थे। 
 
आज वही हाथ
काँपते हैं, 
पर उनमें अब भी है
दुआओं की अथाह शक्ति। 
आज वही आँखें
धुँधली हैं, 
पर उनमें अब भी है
मार्गदर्शन का दीप। 
 
समाज का भविष्य
युवाओं की ऊर्जा है, 
पर उसकी दिशा
वृद्धों की स्मृति से ही निकलती है। 
युवाओं की गति
आँधी हो सकती है, 
पर वृद्धों की स्थिरता
पर्वत जैसी है। 
 
आज
जब हम आधुनिकता के नाम पर
उन्हें उपेक्षित करते हैं, 
तब वास्तव में हम
अपने ही अतीत को नकारते हैं। 
 
वृद्ध
स्मृतियों की नदी हैं, 
अनुभवों का पुस्तकालय हैं, 
सहनशीलता का सागर हैं। 
उनके बिना
समाज केवल वर्तमान होगा, 
भविष्य और अतीत से विहीन। 
 
इस विश्व वृद्ध दिवस पर
आओ प्रण करें
वृद्धों को केवल स्मृति न मानें, 
बल्कि वर्तमान का सहारा भी समझें। 
उनकी थकान को सम्मान दें, 
उनकी हँसी को अपना उजाला मानें। 
 
वृद्ध होना
कमज़ोर होना नहीं है, 
वृद्ध होना
पूर्ण होना है
समय की यात्रा का 
मुकुट पहनना है। 
 
हम सब साठोत्तर पीढ़ी के लोग
यही कहना चाहते हैं
हमारे भीतर अब भी
सपनों की नमी है, 
शरद चाँदनी-सी उजली आस्था है, 
और अपनों के लिए
अनगिनत आशीष हैं। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

काम की बात

साहित्यिक आलेख

कविता

कविता-मुक्तक

दोहे

सामाजिक आलेख

सांस्कृतिक आलेख

कविता - हाइकु

कहानी

ऐतिहासिक

कविता - क्षणिका

चिन्तन

लघुकथा

व्यक्ति चित्र

किशोर साहित्य कहानी

सांस्कृतिक कथा

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

ललित निबन्ध

गीत-नवगीत

स्वास्थ्य

स्मृति लेख

खण्डकाव्य

बाल साहित्य कविता

नाटक

रेखाचित्र

काव्य नाटक

यात्रा वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

अनूदित कविता

किशोर साहित्य कविता

एकांकी

ग़ज़ल

बाल साहित्य लघुकथा

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं