अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

मुझे छोड़ कर मत जाओ

"ठीक है मैंने सारी दलीलें सुनीं। दोनों ओर के आरोप प्रत्यारोप सुने और समझे और मैं अब  इस केस का निर्णय सुनाता हूँ," जज ने बहुत गंभीरता से अजय और अनामिका की और देखते हुए कहा।

"आप दोनों विगत पाँच वर्ष से एक दूसरे से अलग रह रहे हैं और आप लोगों के बीच किसी भी प्रकार के पति पत्नी के सम्बन्ध नहीं हैं। और भविष्य में आप साथ रहना भी नहीं चाहते इस कारण कोर्ट आपसी सहमति के आधार पर इस तलाक़ को मंजूर करता है। लेकिन इसकी एक शर्त है कि आप दोनों को पूरे आठ दिन कोर्ट की निगरानी में एक दूसरे के कार्य करने होंगे। अजय घर के सारे कार्य करेंगे और अनामिका अजय के सारे कार्य। अगर आप दोनों सहमत हों तो आप के तलाक़ को मंजूरी दी जा सकती है। ध्यान रहे दोनों को आठ दिन एक दूसरे के काम पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से करने होंगे अन्यथा तलाक को मंजूरी नहीं मिलेगी," जज ने मुस्कुराते हुए दोनों की ओर देखा।

जज का निर्णय सुनकर एकबारगी दोनों अचकचा गए किन्तु आठ दिन की ही तो बात है सोच कर दोनों ने हामी भर दी। जज ने दो निष्पक्ष ऑब्ज़र्वर नियुक्त कर दोनों को अपने-अपने काम सँभालने का आदेश दे दिया।

सुबह जैसे ही पाँच बजे दोनों अपने कमरों से निकल कर अपने-अपने काम में लग गए। अजय ने उठ कर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार किया। अनामिका उठकर ऑफ़िस के लिए तैयार होने लगी।

अजय नाश्ता लेकर अनामिका के पास आया, "लो नाश्ता कर लो। मुझे मालूम है वहाँ ऑफ़िस में टाइम ही नहीं रहता।"

अनामिका ने देखा अजय दुबला हो गया है, "बीमार हो क्या?"

"नहीं," अजय ने निरीह भाव से अनामिका को देखा।

अजय की आँखों में उठते प्रश्नों  को अनामिका ने पढ़ा किन्तु दोनों के अहंकारों ने संबंधों के बीच एक दीवार सी खींच दी थी।

आठ दिन के बाद एक दूसरे की भूमिका निभाते हुए दोनों को पता चला कि वो ख़ुद कितने ग़लत थे।

दोनों तरफ़ के परिवार वाले चाह रहे थे कि दोनों एक हो जाएँ; लेकिन वहीं पर बात रुकी थी कौन एक वाक्य कहे, "मुझे छोड़ कर मत जाओ।"

जज महोदय के कोर्ट में दोनों पेश हुए।

"हाँ तुम दोनों ने कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन किया है अतः कोर्ट तुम दोनों का तलाक़. . ." जज साहब अपना वाक्य पूरा नहीं कर पाए तभी अनामिका के आँखों में आँसू बहने लगे।

अनामिका के आँसू को देख कर अजय फफक कर रो पड़ा, "प्लीज़ अन्नू मुझे छोड़ कर मत जाओ।"

अनामिका के आँसू अजय की छाती भिगो रहे थे।

जज साहब डायस पर बैठे मुस्कुरा रहे थे।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अँगूठे की छाप
|

सुबह छोटी बहन का फ़ोन आया। परेशान थी। घण्टा-भर…

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

काव्य नाटक

कविता

गीत-नवगीत

दोहे

लघुकथा

कविता - हाइकु

नाटक

कविता-मुक्तक

वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

चिन्तन

कविता - क्षणिका

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

सामाजिक आलेख

बाल साहित्य कविता

अनूदित कविता

साहित्यिक आलेख

किशोर साहित्य कविता

कहानी

एकांकी

स्मृति लेख

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

ग़ज़ल

बाल साहित्य लघुकथा

व्यक्ति चित्र

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

ललित निबन्ध

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं