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माँ स्कंदमाता: माँ का पंचम रूप

 

माँ जगदम्बे,
शारदीय नवरात्र की 
पवित्र अर्चना में
आज प्रकट होती हैं माँ स्कंदमाता,
करकमलों में कुमार कार्तिकेय को लिए,
सिंह पर आरूढ़,
करुणा और शौर्य का संगम बनकर।
 
उनके मुखमंडल पर अद्वितीय शांति है,
पर नेत्रों में तप, 
तेज और शक्ति का आलोक।
माँ की गोद में विराजित 
स्कंद ही
युद्ध के देवता हैं,
किन्तु माँ का हृदय है 
वात्सल्य से परिपूर्ण,
मानव मात्र के लिए 
अनंत करुणा का स्रोत।
 
आराधना में भक्त समर्पित करते हैं
केले का भोग,
क्योंकि फल की मधुरता
माँ की ममता का प्रतीक है।
सुगंधित पुष्पों से सजा आसन
माँ की गोद का विस्तार बन जाता है,
जहाँ शरण लेने वाला
निर्भय हो जाता है।
 
आध्यात्मिक रूप में
माँ स्कंदमाता ज्ञान और 
वैराग्य की ज्योति हैं।
वे कहती हैं
सच्चा साधक वही है
जो आत्मा की गहराई में उतरकर
ममता और करुणा से
जगत को आलोकित करे।
उनकी उपासना में छिपा है
हृदय की शुद्धि का रहस्य,
मन के संशयों का विसर्जन,
और आत्मबल की अनंत प्राप्ति।
 
भक्त जब माँ स्कंदमाता 
का ध्यान करते हैं,
तो वे केवल फल और सुख की
याचना नहीं करते,
बल्कि ज्ञान की वह सीढ़ी पाते हैं
जो उन्हें ईश्वर के साक्षात्कार 
तक ले जाती है।
उनकी उपासना का फल है
धैर्य, विवेक और अनंत साहस।
वह साहस जो विपत्तियों में भी
मनुष्य को अडिग बनाए रखता है।
 
वर्तमान समय में
जब संसार भय, अशांति और असुरक्षा से घिरा है,
माँ स्कंदमाता का व्रत और उनकी उपासना
और भी प्रासंगिक हो जाती है।
आज आवश्यकता है
कि हम उनके वात्सल्य में शरण लें,
अपने हृदय को निर्मल करें,
और भीतर जागृत करें वह शक्ति
जो करुणा के साथ संगठित हो,
जो साहस को करुणा से जोड़े,
और विवेक को धर्म से।
 
माँ स्कंदमाता का आशीष
भक्तों के लिए ढाल है,
उनका स्मरण ही कवच है,
उनकी गोद ही शरण है।
और उनका व्रत
आज के अशांत युग में
मनुष्य के भीतर वह संतुलन रचता है
जो जीवन को सार्थक बना देता है।
 
हे माँ स्कंदमाता,
आपके चरणों में प्रणति।
आपका आशीर्वाद
हमारे जीवन को आलोकित करे,
ताकि हम साहस और करुणा का संगम बन सकें,
और आपकी कृपा से
धर्म और सत्य की रक्षा कर सकें।

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