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शनि वंदना


नाराच छंद
 
प्रचण्ड दृष्टि धारिणं! समस्त पाप हारिणं! 
कुदृष्टि दर्प वारिणं! सुनीति मार्ग चारिणं! 
कराल काल रूपिणं! त्रिलोक कर्म साक्षिणं! 
नमामि नित्य त्वां पदम् भजामि देव शनि प्रभं॥१॥
 
निलाम्बराङ्ग राजितं! कागासनं विराजितं! 
सुरासुरैः सुपूजितं! महाभयापहारितं! 
उदग्र दण्ड धारिणं! समस्त मोह मारिणं! 
नमामि नित्य त्वां पदम् भजामि देव मन्दगं॥२॥
 
कपाल भाल दीपितं! सुदीर्घ देह शोभितं! 
प्रकोप ज्वाल मालिनं! महादुरन्त कालिनं! 
अधर्म वृन्द भंजनं! सुकर्म पंथ रंजनं! 
नमामि नित्य त्वां पदम् भजामि देव सूर्यजं॥३॥
 
प्रसन्न भाव धारिणं! सुभक्त कष्ट तारिणं! 
कृपासुधा प्रवारिणं! मनोमलापहारिणं! 
सदैव सत्य भाषिणं! दुरन्त दम्भ नाशिणं! 
नमामि नित्य त्वां पदम् भजामि देव छायजं॥४॥
 
धरा धुरीं चलावितं! गगन सुचक्र भ्रामितं! 
समस्त लोक कंपितं! दुरात्म गर्व खण्डितं! 
सुकर्म पुण्य वर्धनं! कुकर्म मूल छेदनं! 
नमामि नित्य त्वां पदम् भजामि देव न्यायकम्॥५॥
 
विलम्ब चाल धारिणं! महाधियां विचारिणं! 
कुबुद्धि मूल दारिणं! सुदीप्त ज्ञान कारिणं! 
अहं विकार मोचकं! सुदैन्य दुःख भक्षकं! 
नमामि नित्य त्वां पदम् भजामि देव तारकम्॥६॥
 
सुरेन्द्र वन्द्य देवतं! मुनीन्द्र चित्त सेवितं! 
अनन्त शक्तिधारिणं! सदाशिवांश चारिणं! 
प्रजापतिं निरीक्षकं! समस्त कर्म दर्शकं! 
नमामि नित्य त्वां पदम् भजामि देव सौरिणं॥७॥
 
हृदि प्रतिष्ठितो भव! मदीय चेत आलये! 
हरस्व पाप संचयं! प्रकाशितं विवेकये! 
कृपालु देव पाहि माँ! भवाब्धि मध्य क्लान्तकम्! 
नमामि नित्य त्वां पदम् भजामि देव शाश्वतम्॥८॥

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