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यादों की लालटेन

 

आज जब रात होते ही घरों की दीवारें रंगीन रोशनी से जगमगाने लगती हैं, बच्चे मोबाइल की चमकती स्क्रीन पर उँगलियाँ फेरते हुए नींद में चले जाते हैं और कहानियाँ किताबों से अधिक इंटरनेट पर खोजी जाती हैं, तब अचानक स्मृतियों की किसी पुरानी गली से एक पीली लौ टिमटिमाती हुई दिखाई देती है। वह लौ किसी बिजली के बल्ब की नहीं, बल्कि लालटेन और चिमनी की है। वही लालटेन, जिसकी धुँधली रोशनी में पूरा घर साँस लेता था। वही चिमनी, जिसकी कालिख दीवारों पर नहीं, बचपन की स्मृतियों पर भी हल्के निशान छोड़ जाती थी।

अशोक का बचपन भी उसी पीली रोशनी में बीता था। उन दिनों गाँव और क़स्बों में बिजली का आना किसी मेहमान के आने जैसा होता था। कभी आती, कभी चली जाती। लेकिन आश्चर्य यह है कि उस अँधेरे में भी उदासी नहीं थी। अंधकार डराता नहीं था, बल्कि परिवार को एक साथ बैठने का अवसर देता था। 

शाम होते ही उसकी माँ आवाज़ लगातीं, “अशोक, जल्दी हाथ मुँह धो ले। अभी बिजली चली जाएगी।”

और सचमुच थोड़ी देर बाद पूरा महल्ला अँधेरे में डूब जाता। फिर दादी की धीमी आवाज़ सुनाई देती, “अरे अशोक बेटा, ज़रा लालटेन उठा ला।”

अशोक भागकर कोठरी से लालटेन लाता। उसकी काँच की चिमनी पर जमी कालिख को माँ अपने आँचल से साफ़ करतीं। मिट्टी के तेल की गंध पूरे कमरे में फैल जाती। दादी बाती सीधी करतीं और माचिस की तीली से आग दिखातीं। एक छोटी सी लौ जन्म लेती और देखते ही देखते पूरा कमरा हल्के सुनहरे उजाले से भर जाता।

वह उजाला बहुत बड़ा नहीं होता था, लेकिन उसमें अपनापन बहुत होता था। 

अशोक अपने भाई बहनों के साथ उसी लालटेन के चारों ओर बैठ जाता। कोई पहाड़े रट रहा है, कोई हिंदी का पाठ पढ़ रहा है, कोई कॉपी में गणित के सवाल हल कर रहा है। बाहर दूर कहीं सियारों के रोने की आवाज़ आती, कभी कुत्ते भौंकते, तो कभी रात की हवा खिड़की को हिलाकर रहस्य पैदा करती।

पिताजी अक्सर कहते, “ध्यान लगाकर पढ़ो। यही पढ़ाई आगे काम आएगी।”

और अशोक सचमुच ध्यान लगाकर पढ़ता भी था। क्योंकि उस समय पढ़ाई केवल परीक्षा पास करने का साधन नहीं थी, बल्कि जीवन बदलने की उम्मीद थी। लेकिन उस पढ़ाई के साथ कई छोटे-छोटे हादसे भी जुड़े थे। 

अशोक को आज भी याद है, कई बार चिमनी के सामने बैठकर पढ़ते-पढ़ते उसे झपकी आ जाती थी। दिन भर खेलने और छोटे-मोटे काम करने के बाद शरीर थक जाता था। सिर धीरे-धीरे झुकता और अचानक जलन की तेज़ गंध आती।

“अरे . . . बाल जल गए!”

माँ दौड़कर आतीं। 
“कितनी बार कहा है, थोड़ा दूर बैठकर पढ़ा कर।”

अशोक घबराकर अपने बाल छूता। सामने के कुछ बाल सिकुड़कर भूरे हो चुके होते। दादी हँसने लगतीं, “पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा, तभी तो चिमनी भी परीक्षा ले रही है।”

उस समय यह सब सामान्य लगता था, लेकिन आज सोचने पर लगता है कि उस पीढ़ी ने सचमुच संघर्ष की रोशनी में जीवन जिया था। 

रात जैसे-जैसे गहराती, पढ़ाई समाप्त हो जाती। फिर शुरू होता था कहानियों का संसार।

दादी अपनी खाट पर बैठतीं। अशोक और बाक़ी बच्चे उनके आसपास घिर जाते। कोई उनकी गोद में सिर रख देता, कोई पैरों के पास बैठ जाता।

दादी पूछतीं, “आज कौन सी कहानी सुनोगे?”

अशोक तुरंत बोल पड़ता, “दादी, आज परियों वाली कहानी सुनाओ।”

फिर दादी की आवाज़ धीरे-धीरे जादू बुनने लगती।

“एक राजा था . . . उसकी सात बेटियाँ थीं . . . ”

बस, यहीं से बच्चों की दुनिया बदल जाती। मिट्टी का वह छोटा-सा घर अचानक महलों में बदल जाता। लालटेन की लौ उन्हें कभी घने जंगलों में ले जाती, कभी उड़ते घोड़ों पर बैठा देती, कभी किसी नदी किनारे पहुँचा देती जहाँ सोने की मछलियाँ बोलती थीं।

अशोक मंत्रमुग्ध होकर सुनता रहता। उसकी आँखों में चमक आ जाती। कभी वह डरकर दादी का हाथ पकड़ लेता, कभी ख़ुशी से हँस पड़ता।

आज जब वह पीछे मुड़कर देखता है तो समझ आता है कि वे कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं थीं। वे बच्चों के भीतर कल्पना की खेती कर रही थीं। उनमें लोकजीवन की नैतिकता थी। अच्छाई और बुराई का अंतर था। त्याग, प्रेम, साहस और करुणा के बीज थे। 

दादी अक्सर कहानी के अंत में कहतीं, “देखो, झूठ बोलने वाले का अंत अच्छा नहीं होता।” या फिर “जो दूसरों की मदद करता है, भगवान उसकी रक्षा करते हैं।”

अशोक उन बातों को किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि जीवन के सत्य की तरह सुनता था।

आज के बच्चों के पास साधन बहुत हैं, लेकिन शायद वह सामूहिकता नहीं है। तब एक कहानी पूरा परिवार सुनता था। एक ही लालटेन पूरे घर की रोशनी होती थी। एक ही थाली में कई बच्चे खाना खा लेते थे। अभाव थे, लेकिन रिश्तों में दरारें कम थीं। 

अशोक को याद है, बरसात की रातों में जब तेज़ हवा चलती थी तो लालटेन की लौ काँपने लगती। माँ तुरंत उसे दोनों हाथों से ढँक लेतीं।

“धीरे दरवाज़ा बंद करो, नहीं तो बुझ जाएगी।”

उस लौ को बचाने की वह कोशिश केवल रोशनी बचाने की कोशिश नहीं थी, बल्कि घर की आत्मा को बचाने जैसा भाव था।

कई बार मिट्टी का तेल ख़त्म हो जाता। तब ढिबरी जलती। उसकी रोशनी और भी कम होती। अशोक कॉपी को बिल्कुल पास लाकर पढ़ता। आँखें दुखने लगतीं, लेकिन भीतर एक अजीब ज़िद होती थी। 

पिताजी कहते, “सुविधाएँ नहीं हैं तो क्या हुआ, मेहनत मत छोड़ना।”

उनकी वही बात अशोक के जीवन का मंत्र बन गई।

आज जब बड़े-बड़े विद्यालयों में वातानुकूलित कमरों के भीतर बच्चे पढ़ते हैं, तब भी एकाग्रता का संकट दिखाई देता है। अशोक सोचता है कि उनके पास साधन कम थे, इसलिए मन भटकने के अवसर भी कम थे। मनोरंजन सीमित था, इसलिए कल्पना अधिक थी।

वह समय तकनीक से ग़रीब था, लेकिन भावनाओं से बहुत समृद्ध था। 

कभी कभी अशोक को लगता है कि लालटेन की वह रोशनी वास्तव में बाहर कम, भीतर अधिक जलती थी। उसने धैर्य सिखाया। प्रतीक्षा सिखाई। छोटे साधनों में संतोष ढूँढ़ना सिखाया।

आज की पीढ़ी शायद यह कल्पना भी न कर सके कि एक समय ऐसा भी था जब रात का अर्थ सचमुच रात होता था। जब बिजली जाने पर लोग परेशान नहीं, बल्कि सहज हो जाते थे। जब परिवार अँधेरे में भी एक दूसरे के क़रीब बैठता था। 

अब घरों में रोशनी बहुत है, लेकिन साथ बैठने का समय कम है। कहानियाँ हैं, लेकिन कहानी सुनाने वाली दादियाँ कम होती जा रही हैं। बच्चों के हाथों में मोबाइल हैं, लेकिन परियों की उड़ान कहीं खो गई है।

फिर भी जब कभी अशोक गाँव जाता है और किसी पुराने घर में टँगी लालटेन देखता है, तो लगता है जैसे उसका बचपन अभी भी वहीं कहीं बैठा है। वही पीली लौ अब भी काँप रही है। दादी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी कानों में गूँजती है,

“एक राजा था . . . ”

और अशोक अचानक फिर वही छोटा बच्चा बन जाता है, जिसकी आँखों में सपने थे, सामने चिमनी की लौ थी और किताब पर झुकते हुए कभी कभी बाल भी जल जाया करते थे।

सच तो यह है कि उस पीढ़ी ने केवल लालटेन की रोशनी में पढ़ाई नहीं की, बल्कि उसी रोशनी में जीवन को समझा। वही धुँधली लौ आज भी अशोक की स्मृतियों में सबसे स्थायी उजाला बनकर जल रही है। 

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