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नदी तुम समय हो

 

नदी, 
तुम केवल जल नहीं हो
तुम समय हो, जो ठहरता नहीं
टूटता नहीं
बस
बहता रहता है। 
 
तुम्हारे रास्ते में
पहाड़ आते हैं, पत्थर, काँटे
और मनुष्य की
लालच से भरी, दीवारें। 
फिर भी तुम
अपनी दिशा नहीं छोड़ती। 
 
तुम जानती हो कि रुक जाना
मृत्यु है
और बहते रहना ही जीवन। 
 
कभी
तुम्हारा वेग प्रलय कहलाता है
कभी तुम्हारी शान्ति करुणा। 
पर हर रूप में
तुम
सृजन हो। 
 
तुम्हारे जल में
पूर्वजों की स्मृतियाँ बहती हैं
उनके श्रम, उनकी प्यास
उनकी प्रार्थनाएँ। 
तुम
इतिहास को अपने भीतर
चुपचाप सँभाले रखती हो। 
 
जब तुम्हें
कंक्रीट में बाँधा जाता है
जब तुम्हारा प्रवाह
लाभ और सुविधा में
तौला जाता है
तब सिर्फ़ नदी नहीं
संवेदना भी
सूखने लगती है। 
 
तुम्हारे सूखने से
धरती की नसें सिकुड़ती हैं
और मनुष्य
अंदर से रेगिस्तान बनने लगता है। 
 
नदी
तुमसे कोई
चमत्कार नहीं चाहता
बस इतना चाहता है
कि तुम
अपनी तरह बहती रहो। 
 
तुम्हारा बहना
हमारे भीतर जीवित रहने की
इच्छा को
जगाए रखता है। 
 
इसलिए
हे नदी
मत रुको, मत थको
मत मरो। 
 
क्योंकि
जब तक तुम बहती रहोगी
तब तक
जीवन किसी न किसी रूप में
सम्भव रहेगा। 

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