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प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान


(वेलेंटाइन डे पर विशेष) 

प्रेम संसार का वह सर्वाधिक प्रयुक्त और सम्भवतः सर्वाधिक अनभिज्ञ शब्द है, जिसकी व्याख्या करने का साहस आदि कवि वाल्मीकि से लेकर आधुनिक दार्शनिकों तक ने किया है। किन्तु प्रेम किसी परिभाषा की परिधि में बँधने वाला तत्त्व नहीं है; यह तो एक चिरंतन प्रवाह है। प्रश्न उठता है कि प्रेम क्या है? क्या यह किसी को पा लेने की व्याकुलता है, या स्वयं को मिटा देने की पराकाष्ठा? क्या यह कर्त्तव्यों की वेदी पर किया गया त्याग है, या साधारण मानवीय चेतना में ‘पा लेना’ ही प्रेम की सफलता माना जाता है। हम जिसे चाहते हैं, उस पर अपना अधिकार चाहते हैं। किन्तु सत्य इसके उलट है। जिसे हम पा लेते हैं, वह वस्तु बन जाता है; और जिसे हम प्रेम करते हैं, वह चैतन्य बना रहना चाहिए। वास्तव में, प्रेम पाने की नहीं, बल्कि खो जाने की प्रक्रिया है। जब तक मैं शेष है, तब तक प्रेम केवल एक सौदा है। जिस क्षण मैं गलकर तू में विलीन हो जाता है, वहीं से प्रेम की वास्तविक दीक्षा प्रारंभ होती है। कबीर ने ठीक ही कहा था “जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं”। यह मैं का विसर्जन ही प्रेम का प्रथम सोपान है।

अपेक्षा और त्याग का संतुलन

अक्सर हम प्रेम को अपेक्षा का पर्याय मान लेते हैं। हम अपेक्षा करते हैं कि प्रिय हमारे अनुरूप आचरण करे। जहाँ अपेक्षा है, वहाँ व्यापार है, प्रेम नहीं। प्रेम तो वह त्याग है जो त्याग होने का आभास तक नहीं होने देता। यदि आपको लगता है कि आपने किसी के लिए कुछ त्याग किया है, तो वह आपका अहंकार बोल रहा है। सच्चा त्याग वह है जहाँ स्वयं को मिटा देना भी एक उत्सव बन जाए। प्रेम में त्याग बोझ नहीं, बल्कि एक सहज उल्लास है। यह वह भूमि है जहाँ लेने की इच्छा समाप्त हो जाती है और केवल देना शेष रह जाता है। 

प्रेम रिश्तों का सम्यक निर्वहन और मर्यादा है, क्या केवल भावों में बह जाना प्रेम है? नहीं। मानवीय धरातल पर प्रेम रिश्तों का सम्यक निर्वहन है। यह एक उत्तरदायित्व है। बिना अनुशासन और मर्यादा के प्रेम स्वच्छंदता बन जाता है। एक शिक्षक का छात्र के प्रति, पिता का पुत्र के प्रति, या पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति प्रेम तभी सार्थक है जब वह समाज की नैतिक संरचना को सुदृढ़ करे। प्रेम वह सूत्र है जो दो भिन्न व्यक्तित्वों को जोड़ते हुए भी उनकी वैयक्तिकता का सम्मान करता है। यह एक-दूसरे को जकड़ना नहीं, बल्कि एक-दूसरे को खिलने के लिए आकाश देना है। 

क्या प्रेम कुछ ऐसा है जिसे बाहर से अर्जित करना पड़ता है? कदापि नहीं। प्रेम मनुष्य का मूल स्वभाव है। जैसे अग्नि का स्वभाव तपना है, जल का स्वभाव शीतलता है, वैसे ही मनुष्य की आत्मा का स्वभाव प्रेम है। हम प्रेम करते नहीं हैं, हम प्रेम हो जाते हैं। जब हम अपने भीतर के सारे द्वेष, ईर्ष्या और संकीर्णताओं की धूल साफ़ कर देते हैं, तब जो शेष बचता है, वही प्रेम है। यह हमारे अस्तित्व की वह सुगंध है जो तब प्रकट होती है जब हम पूर्णतः वर्तमान में होते हैं।

प्रकृति और वैश्विक प्रेम

यदि हम सूक्ष्मता से देखें, तो प्रकृति ही प्रेम है। सूर्य का बिना किसी भेदभाव के प्रकाश देना, वृक्षों का फल देना, नदियों का अविरल बहना क्या यह प्रेम का विराट रूप नहीं है? प्रकृति हमें सिखाती है कि प्रेम अकारण होता है। वह किसी पात्रता की प्रतीक्षा नहीं करता। जब मनुष्य का प्रेम केवल एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर चराचर जगत के लिए फैल जाता है, तब वह करुणा बन जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ प्रेम अपनी सीमाओं को तोड़कर वैश्विक चेतना में रूपांतरित होता है।

ईश्वर और प्रेम की पराकाष्ठा

अंतिम प्रश्न आता है क्या ईश्वर को पाना प्रेम है या उसमें खो जाना? आध्यात्मिक दृष्टि से, ईश्वर में खो जाना ही प्रेम की पूर्णता है। पाने में दूरी बनी रहती है, खो जाने में अभेद हो जाता है। ईश्वर को पाने के लिए किया गया सतत प्रयास प्रेम की वह साधना है जिसे हम भक्ति कहते हैं। यह साधना एक प्यास है, एक ऐसी व्याकुलता जो साधक को स्वयं से मुक्त कर विराट से जोड़ देती है। मीरा का नृत्य हो या सूफियों का रक़्स, यह सब उस दिव्य चेतना में विलीन होने की छटपटाहट है। 

प्रेम कोई गंतव्य नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली यात्रा है। यह व्यक्ति से शुरू होकर समष्टि तक और अंततः परमेष्टि (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग है। यह स्वयं को रिक्त करने की कला है ताकि वह असीम ऊर्जा हमारे भीतर समा सके। 

आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ प्रेम को भी उपभोग की वस्तु बना दिया गया है, क्या हम साहस कर सकते हैं स्वयं को खोकर किसी दूसरे के भीतर जीवित रहने का? क्या हम रिश्तों की मर्यादाओं को निभाते हुए भी अपनी आत्मा की स्वतंत्रता को बचाए रख सकते हैं?

प्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक निर्णय है। यह निर्णय है स्वयं से ऊपर उठकर सत्य को स्वीकार करने का।

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