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गीता-श्रीकृष्ण का शाश्वत स्वर


(गीता जयंती पर कविता)

 

मार्गशीर्ष की शीतल भोर में
जब एकादशी का दीप
मन की देहरी पर जलता है
तभी कहीं भीतर से उठती है
एक प्राचीन पुकार
जो पाँच हज़ार वर्षों के पार
आज भी उतनी ही स्पष्ट सुनाई देती है
यह वही पुकार है
जो कुरुक्षेत्र के रणभेरी बीच
एक मोहग्रस्त मन को
उसके सत्य से जगा गई थी। 
 
उसी दिवस की स्मृति
आज गीता जयंती बनकर लौटती है
जैसे समय स्वयं ठहर कर कह रहा हो
ज्ञान का वह सूर्य
आज भी उतनी ही ऊष्मा से
मानव हृदय को आलोकित कर सकता है
यदि हम उसकी ओर
एक बार भर आँख उठाकर देखें। 
 
युद्ध का वह क्षण
सामान्य क्षण नहीं था
वह मनुष्य के भीतर उठते
सबसे बड़े युद्ध का रूपक था
कर्त्तव्य बनाम मोह
सत्य बनाम भ्रम
धर्म बनाम भय। 
 
अर्जुन के काँपते हाथ
किसी धनुर्धर के हाथ नहीं
हर उस व्यक्ति के हाथ हैं
जो अपने जीवन के मोड़ पर
किसी गहन उलझन में खड़ा होता है। 
 
और कृष्ण
किसी देवता का रूप नहीं
बल्कि वह प्रकाश हैं
जो जब चाहे
मनुष्य की चेतना में उतर सकता है। 
 
यही गीता का चमत्कार है
वह युद्ध में जन्मी
और शान्ति का मार्ग बनी
वह रणभूमि में बोई गई
और अध्यात्म का वटवृक्ष बनकर खड़ी हो गई। 
 
कर्म योग की धारा
हमारे भीतर बहती
एक नैतिक नदी है
जो कहती है
सारे कर्म करते चलो
ईश्वर को समर्पित कर के
प्रयास में ही तुम्हारा अधिकार है
फल तो केवल समय का है
और समय किसी का पक्ष नहीं लेता। 
 
ज्ञान योग
अंतर्मन का दर्पण है
जो दिखाता है
कि जो दिखाई देता है
वह सत्य नहीं
और जो सत्य है
वह कभी दिखाई नहीं देता। 
आत्मा की अविनाशी लौ
जब भीतर प्रज्वलित होती है
तो आशंका के अंधकार
स्वयं कहीं विलीन हो जाते हैं। 
 
भक्ति योग
सबसे सरल पथ है
पर सबसे कठिन भी
क्योंकि समर्पण
केवल शब्द नहीं
एक विशाल आंतरिक विसर्जन है
अहंकार का
मिथ्या पहचानों का
उन सभी बंधनों का
जिन्हें हम प्रेम समझकर
जीवन भर ढोते रहते हैं। 
 
कृष्ण का संदेश
अर्जुन तक सीमित नहीं
वह हर उस हृदय में प्रविष्ट होता है
जो भय से काँपता है
जो सत्य से दूर भागता है
जो जीवन की उलझनों को
भाग्य का अभिशाप समझ बैठता है। 
 
पाँच हज़ार वर्ष बाद भी
गीता का प्रत्येक श्लोक
मानव मनोविज्ञान की धड़कन की तरह
वैसा ही जीवित है
जब हम तनाव से भर जाते हैं
कृष्ण का वाक्य
हवा की तरह भीतर उतरता है
कर्म करो
फल की चिंता छोड़ दो। 
 
जब हम निर्णयों में उलझ जाते हैं
कृष्ण कहते हैं
धर्म को पहचानो
और उसके साथ खड़े रहो
चाहे पूरी दुनिया विपरीत क्यों न हो। 
 
जब हम मोह में डूबते हैं
वे धीरे से याद दिलाते हैं
जो बदलता है
वह तुम नहीं
जो नष्ट होता है
वह तुम नहीं। 
 
गीता
धर्म का आदेश नहीं
जीवन का विज्ञान है
आचरण की कला है
उन्नति का संकल्प है
और आत्मा के पथ का दीपक है। 
 
गीता जयंती
किसी पर्व का नाम नहीं
एक जागरण का क्षण है
जो बार-बार कहता है
तुम्हारे भीतर भी अर्जुन है
तुम्हारे भीतर भी रण है
और तुम्हारे भीतर ही
कृष्ण का शाश्वत स्वर
आज भी बोलता है। 
 
संकल्प यही है
कि हम उस स्वर को
पहचानें
स्वीकारें
और उसके मार्ग पर चलें
ताकि हमारा जीवन
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे की उलझनों से
योग-क्षेत्र की शान्ति तक
अपनी यात्रा पूरी कर सके। 
 
गीता
भारत का उपहार है
पर मानवता की धरोहर
यह जीवन को केवल समझाती नहीं
उसे सुंदर भी बनाती है
गहन भी बनाती है
अर्थपूर्ण भी बनाती है। 
 
आज
गीता जयंती पर
यदि हम इतना भर कर लें
कि एक श्लोक भी
अपने आचरण का हिस्सा बना दें
तो जीवन की दिशा बदल सकती है
और भीतर का अंधकार
बहुत दूर तक हट सकता है। 
 
क्योंकि गीता का सार
किसी पुस्तक के पन्नों में नहीं
मानव हृदय में है
और जब हृदय
कृष्ण की वाणी को
एक बार सुन लेता है
तो फिर
वह कभी अकेला नहीं रहता।

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