अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

स्पर्श से परे

 

देह भाषा नहीं है, 
वह शब्दों को नहीं पहचानती, 
उसकी अपनी व्याकरण है
रक्त की लय, 
त्वचा की गर्मी, 
साँसों की गति। 
 
तुमने मुझे छुआ
और देह तो चुप रही, 
उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया, 
उसके लिए वह
बस एक क्षणिक कम्पन था। 
पर मन ने
उस स्पर्श को पत्थर की लकीर बना लिया। 
वह दाग़ अब भी
मिटता नहीं है। 
 
स्पर्श की एक लिपि है
उसकी ध्वनि नहीं, 
उसके अक्षर नहीं, 
केवल कम्पन है। 
मैंने जब उसे
किसी दूसरी लिपि में अनुवाद करना चाहा, 
तो अर्थ खो गया। 
जैसे किसी ने
पानी पर शब्द लिख दिए हों। 
 
छुई गई देह भर थी, 
पर घायल हुआ मन। 
देह की स्मृति तो
थोड़ी देर में विलीन हो जाती है, 
किन्तु आत्मा की स्मृति
न मिटती है, 
न क्षीण होती है। 
 
कितना अजीब है
हमने एक-दूसरे को छुआ, 
फिर भी हम
कभी एक-दूसरे को नहीं छू सके। 
क्योंकि छूना
सिर्फ़ त्वचा तक सीमित नहीं, 
वह आत्मा तक उतरने का नाम है। 
 
जिसे विकलता थी
स्पर्श के लिए, 
वह देह नहीं थी
वह मन था, 
वह हृदय था, 
वह आत्मा थी, 
जो किसी सच्चे आलिंगन की प्रतीक्षा में थी। 
 
देह के भूगोल में
सिर्फ़ सीमाएँ हैं, 
पर आत्मा का भूगोल
असीम है। 
देह का स्पर्श
क्षणिक है, 
मन का स्पर्श
अनन्त है। 
 
इसलिए
किसी ने यदि सच में छुआ, 
तो वह त्वचा को नहीं
अंतरतम को छूता है। 
और वही छुअन
अर्थपूर्ण है। 
 
बाक़ी सब
बस आकृति का खेल है, 
भाषा का भ्रम है, 
एक शून्य की नक़ल है। 
 
मैं प्रतीक्षा करता हूँ
उस स्पर्श की
जो देह की दीवार पार कर
आत्मा की चौखट तक पहुँचे। 
उस स्पर्श की
जो कोई दाग़ न छोड़े, 
बल्कि घाव धोकर
मन को निर्मल बना दे। 
 
स्पर्श जब प्रेम से जन्म ले
तो वह वाणी बन जाता है। 
स्पर्श जब वासना से उपजे
तो वह मौन का बोझ है। 
स्पर्श जब करुणा से छलके
तो वह अनन्त आलोक है। 
 
मैं वही स्पर्श चाहता हूँ
जो मुझे समेट ले, 
मुझे खोल दे, 
मुझे मिटा दे, 
और फिर
मुझे मेरे ही भीतर
संपूर्ण कर दे। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

काम की बात

साहित्यिक आलेख

कविता

कविता-मुक्तक

दोहे

सामाजिक आलेख

सांस्कृतिक आलेख

कविता - हाइकु

कहानी

ऐतिहासिक

कविता - क्षणिका

चिन्तन

लघुकथा

व्यक्ति चित्र

किशोर साहित्य कहानी

सांस्कृतिक कथा

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

ललित निबन्ध

गीत-नवगीत

स्वास्थ्य

स्मृति लेख

खण्डकाव्य

बाल साहित्य कविता

नाटक

रेखाचित्र

काव्य नाटक

यात्रा वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

अनूदित कविता

किशोर साहित्य कविता

एकांकी

ग़ज़ल

बाल साहित्य लघुकथा

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं