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माँ महागौरी: भगवती का अष्टम प्राकट्य स्वरूप

 

हे माँ महागौरी, 
नवरात्र के अष्टम दिवस पर
आपके दिव्य प्राकट्य का ध्यान करता हूँ। 
तप और कठोर साधना से तप्त हुई आप
शिव की कृपा से गौरवर्णा बनीं, 
और महागौरी नाम से पूजित हुईं। 
आपका अवतरण ही है
पवित्रता का संदेश, 
आपका स्वरूप ही है
भक्ति का प्रमाण। 
 
हे श्वेतवर्णा देवी, 
आपका रूप पूर्णिमा की चाँदनी-सा निर्मल, 
आपका आभामंडल में शान्ति का विस्तार, 
आपके श्वेत वस्त्र और आभूषण
संसार को यह बताते हैं
कि पवित्रता ही सबसे बड़ा आभूषण है। 
आपकी चार भुजाएँ
त्रिशूल, डमरू, वरमुद्रा और अभय से सुसज्जित, 
आपके करुणा से भरे नेत्र
भक्त के संशय को तुरंत हर लेते हैं। 
 
आपका वाहन बैल
धैर्य, स्थिरता और निष्ठा का प्रतीक है। 
हे माँ, 
आपके स्वरूप का स्मरण करते ही
मेरा हृदय निर्मल हो उठता है। 
 
आपकी आराधना में नारियल और गुड़, 
हलवा और श्वेत पुष्प अर्पित करता हूँ। 
पर जानता हूँ माँ
आपका सच्चा भोग है मेरा शुद्ध मन, 
आपका प्रिय उपहार है मेरा सरल जीवन। 
 
हे करुणामयी, 
आपकी कृपा से पापों का शमन होता है, 
आपके चरणों में दुःख और कष्ट मिट जाते हैं। 
जो आपके व्रत का पालन करता है
उसे वैवाहिक सुख और पारिवारिक समृद्धि मिलती है, 
और जो आत्मा की मुक्ति चाहता है
उसे मोक्ष का मार्ग सहज उपलब्ध होता है। 
 
आज जब संसार
ईर्ष्या, लालच और अशान्ति से घिरा है, 
आपका व्रत सबसे प्रासंगिक है। 
आपकी उपासना मुझे सिखाती है
कि भीतर की श्वेतता ही
सच्चे सुख का मार्ग है। 
 
हे माँ महागौरी, 
आपके चरणों में यही प्रार्थना है
मेरा मन निर्मल कर दो, 
मुझे धैर्य और शान्ति प्रदान करो, 
मुझे सरल और सहनशील बना दो। 
आपकी श्वेत आभा से
मेरा जीवन उज्ज्वल कर दे। 
आपकी कृपा से
मेरा हर दिन धर्म और करुणा से भरा हो, 
और मेरी आत्मा आपके
आशीष से मोक्ष की ओर बढ़े। 
 
हे माँ महागौरी, 
आपके बिना जीवन शून्य है। 
आपके साथ ही जीवन पूर्ण है। 

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