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मुक्त छंद रचनाओं में आज की हिंदी

 

हिंदी और समय का अटूट सम्बन्ध

सज्जनों, भाषा कभी स्थिर नहीं होती। वह समय के साथ चलती है, समाज के साथ बदलती है और मनुष्य के अनुभवों से अपना विस्तार करती है। जो भाषा समय से संवाद नहीं करती, वह धीरे-धीरे संग्रहालय की वस्तु बन जाती है। हिंदी ने यह जोखिम नहीं उठाया। उसने अपने भीतर परिवर्तन को सहर्ष स्वीकार किया और मुक्त छंद उसी स्वीकार का परिणाम है। आज की हिंदी अपने सबसे बड़े संक्रमण काल से गुज़र रही है और मुक्त छंद उसकी सबसे मुखर अभिव्यक्ति बनकर सामने आया है। 

यहाँ एक भ्रांति का निवारण आवश्यक है। मुक्त छंद का अर्थ छंदहीनता कदापि नहीं है। यह अनुशासन से मुक्ति नहीं, बल्कि भाव की प्राथमिकता है। जहाँ परंपरागत छंद मात्राओं, गणों और यतियों से संचालित होते हैं, वहीं मुक्त छंद अनुभूति, लय और संवेदना से संचालित होता है। यह कवि को वह संप्रभुता देता है कि वह अपने समय को, अपने शब्दों में और अपने ढंग से कह सके। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कभी कहा था कि “यदि गद्य कवियों की कसौटी है, तो निबंध गद्य की कसौटी है।” परन्तु आज के दौर में मैं यह कहना चाहूँगा कि यदि कविता हृदय की पुकार है, तो मुक्त छंद उस पुकार की बेबाक प्रतिध्वनि है। 

आज का मनुष्य बहुत तेज़ जी रहा है पर भीतर से अत्यंत उलझा हुआ है। उसके अनुभव खंडित हैं, अपूर्ण हैं और अक्सर असमाप्त हैं। ऐसे विखंडित समय को चौपाइयों या मात्रिक बंधनों के साँचे में पूरी तरह बाँध पाना कई बार सम्भव नहीं होता। मुक्त छंद इसी टूटे हुए समय की सबसे ईमानदार भाषा है। इसमें आज की हिंदी सरल है, संक्षिप्त है और सीधी बात कहने वाली है। 

मुक्त छंद में हिंदी का नया स्वरूप

मुक्त छंद की इस सरिता में संस्कृतनिष्ठ शब्द भी हैं, लोकभाषा की सौंधी महक भी है और शहरी बोलचाल की खनक भी। यह वह हिंदी है जो शुद्धता से अधिक सार्थकता को महत्त्व देती है। यह अख़बार की सुर्ख़ियों से लेकर मोबाइल की स्क्रीन तक और कवि की आत्मा तक एक साथ यात्रा करती है। यहाँ ‘भाव’ राजा होता है और शब्द उसका अनुचर। शब्द यहाँ सजाने के लिए नहीं बल्कि सच कहने के लिए आते हैं। इसीलिए मुक्त छंद की हिंदी कभी कड़वी लगती है, कभी अत्यंत कोमल और कभी बिल्कुल मौन। यह मौन भी आज की हिंदी का एक नया व्याकरण है। 

अक्सर यह प्रश्न उठता है कि मुक्त छंद में कोई भी कुछ भी लिख सकता है। यह पूर्ण सत्य नहीं है। मुक्त छंद में लय का अनुशासन अदृश्य होता है पर अनिवार्य होता है। जो रचना सिर्फ़ गद्य को पंक्तियों में तोड़ देती है, वह मुक्त छंद नहीं, केवल अव्यवस्थित अभिव्यक्ति है। आज की हिंदी कविता समाज से मुँह नहीं मोड़ती। वह व्यवस्था, सत्ता और स्वयं से भी प्रश्न पूछती है। मुक्त छंद इन प्रश्नों को बिना अलंकारों के सीधे पाठक तक पहुँचाता है। 

मुक्त छंद ने कविता को भारी-भरकम पुस्तकों के बोझ से निकालकर सामान्य पाठक के हृदय तक पहुँचाया है। आज का पाठक लंबे छंदों के पांडित्य से भले ही दूर रहे, पर वह संवेदनशील पंक्तियों से तुरंत जुड़ जाता है। मुक्त छंद ने पाठक और कवि के बीच एक सीधा सेतु निर्मित किया है। इसमें खड़ी बोली का वह ठाठ भी है और आंचलिक बोलियों की वह सौंधी मिठास भी, जिसकी वकालत सुप्रसिद्ध विद्वान करते रहे हैं। 

अंततः, मुक्त छंद में आज की हिंदी अपने समय की सबसे प्रामाणिक आवाज़ है। यह भाषा सजने से अधिक सच होने पर विश्वास करती है। यह कविता ताल से नहीं, बल्कि तल्ख़ सच्चाइयों और कोमल संवेदनाओं से अपनी लय खोजती है। अधिकांश विद्वान भी मानते हैं कि यदि हिंदी को जीवंत बनाए रखना है, तो हमें मुक्त छंद को अराजकता नहीं बल्कि एक सम्भावना के रूप में देखना होगा। क्योंकि जब भाषा स्वतंत्र होती है, तभी वह मनुष्य को भी स्वतंत्र होने का साहस देती है। 

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