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माँ आशुतोषी नर्मदा

 

अनादि के मौन से
जब सृष्टि ने प्रथम स्पंदन पाया
तभी जल ने शब्द सीखा
और शब्द ने प्रवाह
उसी क्षण
नर्मदा
आदि माता के रूप में
काल की गोद से उतरीं। 
 
वह जन्म नहीं था
वह आविर्भाव था
उमारूद्रांग की तपश्चर्या से
उद्भूत वह चेतना
जो शिव के नेत्रों से
करुणा बनकर बही। 
ऋक्षपाद की कठोर साधना में
उनका स्रोत जागा
और त्रिकूट की पावन शिला ने
उन्हें दिशा दी। 
 
नर्मदा
केवल नदी नहीं
वह काल की शिराओं में
बहती हुई प्राणवायु हैं। 
उनका जल
स्मृति है
उनका निनाद
उपनिषद का घोष। 
जहाँ गंगा मोक्ष की आकांक्षा हैं
वहाँ नर्मदा
जीवन की निरंतरता हैं। 
 
उनका कलकल स्वर
वनस्पति में हरियाली
प्राणी में श्वास
और मानव में
आशा का संचार करता है। 
वह पर्वतों को चूमती हुई
मैदानों में उतरती हैं
और मैदानों को
सभ्यता का संस्कार देती हैं। 
 
दशार्णा बनकर
वह जनपदों को सींचती हैं
शांकरी होकर
आस्था को अक्षुण्ण रखती हैं। 
मुरंदला की वक्रता में
वह सौंदर्य रचती हैं
और इन्दुभवा स्वरूप में
रजनी को भी पावन करती हैं। 
 
चित्रोत्पला का तेज
उनके प्रवाह में
सूर्य की साक्षी बनता है। 
दुर्गम पथों पर चलती हुई
वह थकती नहीं
क्योंकि नर्मदा
थकान नहीं
संकल्प की संज्ञा हैं। 
 
विदशा हो या विपाशा
करभा हो या रंजना
हर नाम
उनके विराट व्यक्तित्व का
एक आयाम है। 
वह मुना बनकर
माधुर्य देती हैं
सुभाषा बनकर
संवाद रचती हैं। 
 
उनका जल
अमल है
शीतल है
पर निर्बल नहीं। 
वह सतत प्रवाह में
भी स्थिर मूल्य हैं। 
न ठहराव में मृत्यु
न वेग में विनाश
यह नर्मदा की
आंतरिक मर्यादा है। 
 
विमला और अमृता
उनके नाम नहीं
उनका स्वभाव हैं। 
शोण और विपापा
उनके विस्तार हैं। 
महानद और मंदाकिनी
उनकी विराटता के
उपमान हैं। 
 
नील धवल धाराएँ
दिन रात्रि
सहस्त्र कोस की यात्रा में
सृष्टि को
जीवंत रखती हैं। 
उनका जल
अन्न बनता है
औषधि बनता है
और अंततः
मानव की चेतना में
श्रद्धा बनकर बसता है। 
 
नर्मदा
सार्वकालिक हैं
क्योंकि जीवन
सार्वकालिक है। 
जब तक पृथ्वी
अपनी धुरी पर घूमेगी
जब तक मानव
प्रकृति से संवाद करेगा
तब तक नर्मदा
आशुतोषी माता बनकर
सबको तृप्त करती रहेंगी। 
 
उनकी परिक्रमा
पाँव की नहीं
अहं की यात्रा है। 
जो उन्हें नमन करता है
वह जल को नहीं
जीवन को प्रणाम करता है। 
 
माँ आशुतोषी नर्मदे
तुम प्रवाह हो
तुम प्रार्थना हो
तुम सृष्टि की
अक्षय पंक्ति हो। 

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