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जो लौटकर नहीं आता 

 

ऋतुएँ हर वर्ष
अपना कैलेंडर लेकर लौट आती हैं। 
पतझर के बाद
फिर हरे हो जाते हैं सूखे वृक्ष। 
नदियाँ
गर्मी में सिकुड़कर भी
पहली वर्षा के साथ
अपनी बाँहें फैला देती हैं। 
 
टूटे हुए घर
फिर बन जाते हैं। 
उजड़े हुए नगर
फिर बस जाते हैं। 
बुझे हुए दीप
फिर जल उठते हैं। 
रूठे हुए लोग
कभी न कभी
मुस्कुरा भी लेते हैं। 
घावों पर
समय की त्वचा चढ़ जाती है। 
रात के सबसे गहरे अँधेरे के बाद भी
सूरज
अपना रास्ता नहीं भूलता। 
बहुत कुछ
बार बार जन्म लेता है। 
 
किन्तु . . . 
कभी नहीं लौटती
वह उँगली
जिसे पकड़कर
हमने चलना सीखा था। 
कभी नहीं लौटती
माँ की वह आवाज़
जो बिना पुकारे
हमारी भूख पहचान लेती थी। 
कभी नहीं लौटता
पिता का वह मौन, 
जो अपने हिस्से की इच्छाएँ बेचकर
हमारे सपने ख़रीद लाता था। 
 
कभी नहीं लौटती
स्कूल की अंतिम घंटी, 
जिसके बाद
बचपन
चुपचाप बस्ता समेटकर
समय के साथ चला गया। 
कभी नहीं लौटते
वे मित्र, 
जो बिना कारण
घंटों साथ बैठे रहते थे। 
 
कभी नहीं लौटता
पहला विश्वास, 
पहला निष्कपट प्रेम, 
पहली निश्चिंत हँसी, 
और सबसे अधिक . . . 
कभी नहीं लौटता
वह समय, 
जब हम
अपने सबसे प्रिय लोगों के साथ थे, 
पर उन्हें
इतना प्रिय होने का
अहसास नहीं करा सके। 
 
इसलिए
जब तक
माँ की गोद शेष है, 
उसमें सिर रख लो। 
जब तक
पिता का हाथ
तुम्हारे कंधे पर है, 
उसे थाम लो। 
जब तक
मित्रों की हँसी
तुम्हारे आसपास है, 
उसे सुन लो। 
जब तक
सम्बन्ध
तुम्हारे द्वार पर खड़े है, 
उसे प्रतीक्षा मत कराओ। 
 
क्योंकि
जीवन में
सबसे बड़ा अभाव
वह नहीं होता
जो हमें कभी मिला ही नहीं, 
सबसे बड़ा अभाव
वह होता है
जो हमारे पास था, 
और हम
उसे जी नहीं सके। 

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