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माँ बगलामुखी स्तवन


(नाराच छंद:)
 
नमो नमो सुपीत वर्ण दिव्य कान्ति धारिणी,
प्रचंड वेग शत्रु सैन्य बुद्धि दोष हारिणी।
गदा धरे कराल हस्त जिह्वा खैंचि मारती।
नमो सुसिद्धि दायिनी विपत्ति जाल तारती॥ १ ॥
 
विराजती सुवर्ण सिंह पीत वस्त्र सोहने।
त्रिलोक भक्त मोहिनी स्वरूप चित्त मोहने।
हृदय मँझार ध्याय के आप नाम उच्चरै।
तहाँ न व्याधि संकटैं न काल पाँव डग्गरै॥ २ ॥
 
करो सुस्तम्भ जिह्व को शत्रु कुबुद्धि डारि के,
विनाश पुष्ट दुष्ट को सुमुद्गरैं पछाड़ि के।
असाध्य काज साधि के सुसिद्धि हाथ धारिही।
जगत् प्रसूति मातु की जो आरती उतारही॥ ३ ॥
 
अराति झुंड देखि के जो प्रखंभ रूप धारती,
भयंकरैं सुडाकिनी पिसाच कूँ पछारती।
नमो सुपीठ पीत की अनन्त शक्ति धारिणी,
कुमार्ग गामि जीव की कुवासना निवारिणी॥ ४॥
 
उदग्र रूप धाय के हनें जो बैरी घात रे।
पुकारूँ मातु बार बार राखि लाज तात रे।
गँवार बुद्धि नाशि के सुज्ञान जोति बारिये,
दुसह दरिद्र को उखारि दूर पार डारिये॥ ५॥
 
सुमेरु शृंग पै बिराजि कान्ति पुंज मण्डिते।
प्रताप मातु देखि के प्रदंभ गर्व खण्डिते।
त्रिनेत्र धार ईश्वरी सुमोद चित्त धारिये।
सदा सहाय होय के सुकाज सिद्ध वारिये॥ ६ ॥
 
हरद रँगी सुमालिका जपै जो नाम तोर रे।
मिटै कलेस चित्त को भागै दुष्ट घोर रे।
पीत अम्ब कृपालु मातु भक्ति दान दीजिये।
कटाक्ष फेरि दास की दशा सुधार कीजिये॥ ७ ॥
 
नमो नमो प्रचंडमुखी त्रिलोक राज राजते।
विराजि हृदय माँझ मातु दिव्य रूप साजते।
सुछंद ईश को सुमिरि जोइ पाठ ठानही।
तहाँ न कष्ट संकटैं न शूल आँखि तानही॥ ८ ॥
 

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