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त्रिकाल: जन्मों के पार एक अनुराग


 (यह कहानी एक वास्तविक घटना पर आधारित है, यह कहानी स्वर्णलता के जीवन के रहस्यों, उनकी आंतरिक उथल-पुथल और वैज्ञानिक अन्वेषण की गहराई को उजागर करती है) 

भोपाल की कोचर कॉलोनी के एक साधारण से घर में बैठी स्वर्णलता जब अपनी आँखें मूँदती हैं, तो उन्हें आज की गाड़ियों का शोर सुनाई नहीं देता। उन्हें सुनाई देता है सन् 1930 के दशक की किसी बैलगाड़ी के चक्कों की चूँ-चूँ और कटनी की गलियों में गूँजती अपनी ही पायल की खनक।

स्वर्णलता का वर्तमान जन्म 1948 में टीकमगढ़ के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। जब वे महज़ तीन वर्ष की थीं, तब से ही उनके व्यवहार में एक अजीब-सा ‘प्रौढ़पन’ झलकने लगा था। अन्य बच्चे जहाँ गुड़ियों से खेलते थे, स्वर्णलता एकांत में बैठकर कुछ गुनगुनाती रहती थीं। एक दिन उनके पिता उन्हें कटनी के रास्ते से लेकर कहीं जा रहे थे। अचानक नन्ही स्वर्णलता ने कार रुकवा दी। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने काँपती उँगली से एक पुराने मकान की ओर इशारा किया और चहक उठी, “बाबूजी! देखो मेरा घर! मेरी सहेली वहाँ रहती है . . . और मेरी अलमारी . . . क्या वह अब भी वहीं होगी?”

पिता दंग रह गए। उनके पैर जैसे ज़मीन में धँस गए। जिस बच्ची ने कभी कटनी का नाम तक नहीं सुना था, वह उस शहर की रग-रग से वाक़िफ़ थी। घर लौटकर स्वर्णलता ने अपनी माँ से कहा, “माँ, मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगता। मेरे बच्चे मुरली और नरेश भूखे होंगे। मुझे सावित्री की शादी की चिंता है।”

यह सुनकर परिवार में कोहराम मच गया। क्या बच्ची पर किसी साये का असर है? या यह कोई मानसिक रोग है? लेकिन स्वर्णलता की बातें इतनी तर्कसंगत और विस्तृत थीं कि उन्हें झुठलाना नामुमकिन था। वह बताती थीं कि पिछले जन्म में वह ‘बुंदा बाई’ थीं, जो एक समृद्ध पाठक परिवार की सदस्य थीं। उनकी मृत्यु 1939 में हुई थी। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। वह एक और जन्म का ज़िक्र करती थीं बांग्लादेश के सिलहट में ‘कमलेश गोस्वामी’ के रूप में उनका जन्म।

स्वर्णलता के लिए यह जीवन एक पहेली बन गया था। वह दो मृत स्त्रियों की यादों को एक जीवित शरीर में ढो रही थीं। रातों को वह नींद में बंगाली गाने गातीं, जबकि उनके घर में किसी को बंगाली का ज्ञान तक न था। रहस्य गहराता जा रहा था क्या एक ही आत्मा दो अलग-अलग जन्मों की यादें साथ लेकर आ सकती है? यह प्रश्न न केवल परिवार के लिए, बल्कि समूचे विज्ञान के लिए एक चुनौती बनने वाला था।

♦ ♦

1960 के दशक में, जब विज्ञान और तर्क अपने चरमोत्कर्ष पर थे, अमेरिका के विख्यात पैरासाइकोलॉजिस्ट प्रोफ़ेसर इयान स्टीवेन्सन तक यह ख़बर पहुँची। वे भारत आए, क्योंकि स्वर्णलता का केस दुनिया का अब तक का सबसे पेचीदा मामला था। स्टीवेन्सन संशयवादी थे; वे प्रमाणों के बिना किसी भी चमत्कार पर विश्वास नहीं करते थे।

उन्होंने स्वर्णलता को कटनी ले जाने का निश्चय किया। यह एक ‘अग्निपरीक्षा’ थी। स्वर्णलता को उन लोगों के बीच ले जाया गया जिन्हें उन्होंने इस जन्म में कभी नहीं देखा था। कटनी के पाठक परिवार को पहले ही सतर्क कर दिया गया था कि वे अपनी पहचान उजागर न करें।

जैसे ही स्वर्णलता उस हवेली में प्रविष्ट हुईं, वहाँ का वातावरण तनावपूर्ण हो गया। सत्तर साल के एक वृद्ध, जो बुंदा बाई के देवर थे, भीड़ में छिपे खड़े थे। स्वर्णलता ने उन्हें देखते ही उनके पाँव छुए और सजल आँखों से कहा, “भोलू! तू इतना बुज़ुर्ग कैसे हो गया? देख, मैंने कहा था न कि मैं लौटूँगी!” भोलू काका की चीख़ निकल गई। वे फफक कर रो पड़े।

प्रोफ़ेसर स्टीवेन्सन ने अपनी डायरी में दर्ज किया—“बच्ची ने न केवल रिश्तों को पहचाना, बल्कि उन गुप्त कोड-वर्ड्स का भी उल्लेख किया जो केवल बुंदा बाई और उनके देवर के बीच थे।” रोमांच तब और बढ़ गया जब स्वर्णलता ने उस दीवार की ओर इशारा किया जहाँ एक गुप्त ताक (आला) बना हुआ था। वह ताक सालों पहले प्लास्टर से ढक दिया गया था। जब उसे खुरचा गया, तो उसके भीतर से पुराने पीतल के बरतन और कुछ पैसे निकले, जिन्हें बुंदा बाई ने अपनी मृत्यु से पूर्व छिपाया था।

स्टीवेन्सन ने स्वर्णलता का साक्षात्कार लिया। संवाद कुछ इस प्रकार था:

प्रोफ़ेसर: “स्वर्णलता, क्या तुम्हें पता है कि तुम इस जन्म में तिवारी हो, पाठक नहीं?”

स्वर्णलता: “डॉक्टर साहब, नाम तो बस एक लेबल है। जैसे किसी किताब का कवर बदल जाए, पर उसके भीतर की कहानी वही रहती है। मेरी कहानी इन तीनों परिवारों में बिखरी हुई है।”

प्रोफ़ेसर: “पर विज्ञान कहता है कि स्मृति मस्तिष्क के साथ समाप्त हो जाती है।”

स्वर्णलता: “तो फिर मेरे हृदय की इस तड़प का विज्ञान के पास क्या उत्तर है? मैं आज भी उन बच्चों के लिए रोती हूँ जो मुझसे उम्र में दोगुने बड़े हैं।”

यह शोध वैश्विक सुर्ख़ियों में आ गया। ‘रेयर ऑफ़ रेयरेस्ट’ स्वर्णलता अब एक अध्ययन का विषय थीं, पर उनके भीतर की ‘माँ’ आज भी अपने पिछले जन्म की संतानों के लिए व्याकुल थी। 

स्वर्णलता जब बड़ी हुईं, तो उनके जीवन में एक नया संघर्ष शुरू हुआ अतीत और वर्तमान के बीच सामंजस्य का। वे भोपाल में प्रोफ़ेसर बनीं, उनका विवाह डीपी तिवारी (पूर्व आईएएस) से हुआ। लेकिन उनके जीवन में ‘पाठक’ और ‘गोस्वामी’ परिवार की उपस्थिति सदैव बनी रही।

कल्पना कीजिए उस दृश्य की, जहाँ एक 25 साल की युवती (स्वर्णलता) के पास 60 साल का एक वृद्ध आता है और उसे ‘माँ’ कहकर पुकारता है। समाज के लिए यह एक तमाशा था, पर स्वर्णलता के लिए यह एक पवित्र कर्त्तव्य। कटनी के पाठक परिवार के हर छोटे–बड़े उत्सव में स्वर्णलता को आमंत्रित किया जाता। वे वहाँ ‘स्वर्णलता’ बनकर नहीं, बल्कि अपनी ‘बुंदा बुआ’ या ‘बड़ी मम्मी’ के रूप में शामिल होतीं। 

रोमांचकारी मोड़ तब आया जब स्वर्णलता को सिलहट (बांग्लादेश) के अपने दूसरे जन्म के माता-पिता की यादें आने लगीं। उन्होंने बताया कि कैसे ‘कमलेश’ के रूप में उनकी मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हुई थी। उन्होंने उन सड़कों का नक़्शा तक काग़ज़ पर उकेर दिया जहाँ दुर्घटना हुई थी। शोधकर्ताओं ने पाया कि 1947 में वास्तव में सिलहट में उसी जगह एक बच्ची की मौत हुई थी, जिसके विवरण स्वर्णलता की यादों से हू-ब-हू मिलते थे।

संवादों की संवेदनशीलता तब और बढ़ गई जब उनके वर्तमान पति, डीपी तिवारी ने एक दिन उनसे पूछा, “स्वर्ण, क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि तुम तीन अलग-अलग व्यक्तियों की ज़िन्दगी एक साथ जी रही हो? क्या तुम्हारा अपना व्यक्तित्व इस भीड़ में कहीं खो नहीं जाता?”

स्वर्णलता ने गहरी साँस ली और कहा, “शायद मेरा अपना कोई व्यक्तित्व है ही नहीं। मैं बस एक निरंतरता हूँ। जैसे गंगा अलग-अलग घाटों से गुज़रती है, पर रहती वह गंगा ही है। मैं तिवारी परिवार की बहू हूँ, पर पाठक परिवार की आत्मा हूँ।”

उनके बेटे संजीव और संदीप जब बड़े हुए, तो उनके सामने एक अनोखी चुनौती थी। उनके घर में अक्सर अपरिचित मेहमान आते थे, जो उनकी माँ को अपना पूर्वज मानते थे। लेकिन स्वर्णलता की ममता ने इन सभी रिश्तों को जोड़कर रखा। उन्होंने कभी किसी से कुछ माँगा नहीं, बस लुटाया वही ममता, जो जन्मों से उनके साथ चली आ रही थी।

♦ ♦

आज 79 वर्ष की आयु में, स्वर्णलता तिवारी एक शांत द्वीप की भाँति हैं। उनका केस अब केवल वैज्ञानिक शोध का हिस्सा नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक दार्शनिक संदेश है। इंदौर की पुनर्जन्म विशेषज्ञ डॉ. ज्योति गुप्ता और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया कि स्वर्णलता का मामला ‘डिटेल्ड प्रूवन रीइन्कार्नेशन’ का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है। 
कहानी का सबसे संवेदनशील हिस्सा वह है, जब स्वर्णलता कटनी और शहडोल के उन बच्चों से मिलती हैं जो अब बूढ़े हो चुके हैं। डॉ. राहुल पांडे (रिटायर्ड सिविल सर्जन) कहते हैं, “बड़ी मम्मी जब मेरा सिर सहलाती हैं, तो मुझे विज्ञान की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह स्पर्श ही प्रमाण है।”

स्वर्णलता के जीवन का दर्शन यह है कि मृत्यु अंत नहीं है। वे अक्सर कहती हैं, “लोग मृत्यु से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे सब कुछ खो देंगे। पर सच तो यह है कि हम कुछ नहीं खोते। प्यार और स्मृतियाँ हमारी आत्मा का हिस्सा बन जाती हैं। मैंने दो बार अपनी देह को मिट्टी होते देखा है, पर मेरा अनुराग आज भी जीवित है।”

वैज्ञानिक रूप से यह माना गया कि स्वर्णलता के मस्तिष्क में कुछ ऐसे न्यूरल पाथवे थे जो जन्मों के पार की जानकारी सुरक्षित रख सके। पर स्वर्णलता इसे ईश्वरीय कृपा मानती हैं। वे आज भी हर वर्ष मदर्स डे पर चर्चा का विषय बनती हैं, क्योंकि वे दुनिया की इकलौती माँ हैं जिनके पास तीन जन्मों की संतानों का प्यार है। 

भोपाल की शाम ढल रही है। स्वर्णलता अपनी बालकनी में बैठी हैं। उनके हाथ में गीता है। वे उस श्लोक को पढ़ती हैं जो उनके जीवन का सार है “वासांसि जीर्णानि यथा विहाय . . . ” (जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नए धारण करता है)। वे मुस्कुराती हैं। वे जानती हैं कि जब यह शरीर भी पुराना हो जाएगा, तो वे फिर कहीं किसी नई किलकारी में लौटेंगी।

यह कहानी केवल स्वर्णलता की नहीं है, यह हम सबके अस्तित्व की है। क्या हम केवल हाड़-मांस के पुतले हैं, या हम भी किसी लंबी यात्रा के मुसाफ़िर हैं? स्वर्णलता तिवारी उस रहस्यमयी खिड़की के समान हैं, जिससे झाँकने पर हमें अपने ही अमर होने का आभास होता है।

प्रेम जन्मों का बंधन नहीं, बल्कि जन्मों का आधार है। 

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