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स्मृतियों के अवशेष

 

उस पुराने पुश्तैनी मकान के बरामदे में बिछी आरामकुर्सी अब केवल नाम की आराम कुर्सी रह गई थी। नब्बे वर्षीय दीनानाथ जी के लिए वह उनकी देह का विस्तार बन चुकी थी। ढलती साँझ की मद्धम रोशनी में वे सामने लगे नीम के दरख़्त को निहार रहे थे, जिसकी टहनियाँ वक़्त के बोझ से झुक गई थीं बिल्कुल उनकी तरह। 

भीतर के वातानुकूलित कमरों में आधुनिकता की गहमागहमी थी। उनका पोता, विहान, अपने नए आईफोन पर उँगलियाँ चला रहा था, और बेटा, समर्थ, लैपटॉप पर किसी विदेशी ग्राहक के साथ इमोशनल इंटेलिजेंस और ‘एम्पैथी’ (संवेदना) जैसे विषयों पर प्रेजेंटेशन तैयार कर रहा था। विडंबना यह थी कि जिस घर में संवेदना पर व्याख्यान लिखे जा रहे थे, उसी घर के कोने में बैठी एक जीवित संवेदना मौन के घूँट पी रही थी। 

दीनानाथ जी को अचानक पुराने दिनों की याद आई, जब पूरा महल्ला एक ही आँगन में सिमट आता था। दुख किसी एक का होता, तो चूल्हे कई घरों के नहीं जलते थे। पर आज? आज तो सगे रिश्तों के बीच भी वाई-फ़ाई के सिगनल जैसी दूरी है।

“विहान बेटा,” दीनानाथ जी ने दबी हुई आवाज़ में पुकारा।

विहान ने बिना सिर उठाए जवाब दिया, “दादाजी, प्लीज़! मैं एक गेम के बीच में हूँ। आपको कुछ चाहिए तो एलेक्सा से कह दीजिए, वह लाइट जला देगी या गाना सुना देगी।”

दीनानाथ जी मुस्कुरा दिए एक कड़वी मुस्कुराहट। वे पूछना चाहते थे कि क्या कोई मशीन उनकी अकेलेपन की टीस को भी समझ सकती है? क्या तकनीक उस हाथ की गरमाहट दे सकती है, जो कभी उनके पिता उनके सिर पर रखा करते थे?

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