प्रेम सम्मान
कथा साहित्य | कहानी डॉ. सुशील कुमार शर्मा1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
क़स्बे के उस पुराने सरकारी कन्या विद्यालय की पीली पड़ चुकी दीवारों के पीछे एक ऐसा मौन पसरा रहता था, जो अक्सर मध्यांतर की शोर-शराबे वाली आवाज़ों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता था। इसी विद्यालय की वरिष्ठ शिक्षिका थीं वैदेही। वैदेही, जिनके नाम में ही विदेह की गरिमा और जानकी की पीड़ा समाहित थी। वे केवल एक अध्यापिका नहीं थीं, वे इस धूल भरे क़स्बे के लिए सौंदर्य और विद्वत्ता का एक ऐसा प्रतिमान थीं, जिसे दूर से निहारा तो जा सकता था, पर छुआ नहीं जा सकता था।
उनका रूप? जैसे किसी शिल्पी ने शरद ऋतु की चाँदनी को संगमरमर में ढाल दिया हो। लंबी छरहरी काया, बड़ी-बड़ी हिरनी जैसी आँखें जिनमें सदैव एक हल्का सा धुँधलका छाया रहता, और वाणी ऐसी कि जैसे निर्झरिणी पत्थरों से टकराकर संगीत पैदा कर रही हो। उनकी साड़ियों के सलीक़ेदार पल्लू और माथे पर बिंदी की स्थिरता उनकी आंतरिक दृढ़ता का परिचय देती थी। किन्तु उस दृढ़ता के पीछे एक ऐसा हृदय धड़कता था, जो शब्दों के मायाजाल में क़ैद हो चुका था।
उनका प्रेम कोई साधारण आकर्षण नहीं था। वह प्रेम था शिखर के प्रति। शिखर, जिनका नाम ही साहित्य की दुनिया में उस ऊँचाई का प्रतीक था जहाँ तक पहुँचना साधारण जन के बस की बात नहीं थी।
शिखर उसी क़स्बे के पुश्तैनी हवेली के वारिस थे, किन्तु उनका वास्तविक घर उनकी रचनाओं के शब्द थे। उनके उपन्यास और कविताएँ देश की बौद्धिक चेतना को झकझोरती थीं। उनका व्यक्तित्व इतना विराट था कि जब वे क़स्बे की लाइब्रेरी की सीढ़ियों से उतरते, तो समय जैसे अपनी गति धीमी कर लेता। भारी आवाज़, खिचड़ी बाल, और आँखों में एक ऐसी दार्शनिक गहराई जो सामने वाले के अस्तित्व को आर-पार देख ले।
वैदेही उन्हें वर्षों से पढ़ती आ रही थीं। वे उनके शब्दों की पूजा करती थीं। उनकी हर नई किताब वैदेही के लिए किसी ईश्वरीय प्रसाद जैसी होती। पर यह उपासना केवल पन्नों तक सीमित नहीं थी। संयोगवश, शिखर का भाँजा वैदेही की ही कक्षा में पढ़ता था, और इसी सूत्र ने उन्हें कई बार आमने-सामने खड़ा किया था।
वैदेही के भीतर एक ज्वालामुखी धड़कता था, पर अधरों पर सदैव ‘साहित्यिक मर्यादा’ की बर्फ़ जमी रहती। वे जब भी शिखर से मिलतीं, उनकी मेधा और सौंदर्य के सम्मुख शिखर भी क्षण भर के लिए अपनी शब्द-सामर्थ्य खो देते थे। पर विडंबना देखिए, जिस व्यक्ति के पास संसार की हर भावना को व्यक्त करने के लिए हज़ारों शब्द थे, वह वैदेही की उपस्थिति में ‘मौन’ का पर्याय बन जाता।
एक शाम, क़स्बे के वार्षिक साहित्य उत्सव के बाद, जब आकाश सिंदूरी हो रहा था, दोनों पुस्तकालय के एकांत गलियारे में आमने-सामने थे।
वैदेही के हाथों में शिखर का नया कविता संग्रह था। उन्होंने काँपते स्वर में पूछा, “शिखर जी, आपकी इस नवीनतम कृति में जो विरह है, क्या वह केवल कल्पना है या किसी अधूरेपन की प्रतिध्वनि?”
शिखर ने चश्मा उतारकर वैदेही की ओर देखा। उस क्षण वैदेही की सुंदरता अपनी पूरी आभा में थी। सूर्यास्त की किरणें उनके चेहरे पर पड़कर उन्हें किसी देवालय की प्रतिमा जैसा आभास दे रही थीं।
शिखर धीमे स्वर में बोले, “वैदेही, लेखक जो लिखता है, वह उसका आधा सत्य होता है। शेष आधा सत्य वह होता है, जिसे वह चाहकर भी काग़ज़ पर उतार नहीं पाता। कभी सामाजिक मर्यादाओं की बेड़ियों के कारण, तो कभी अपनी ही ‘बौद्धिक श्रेष्ठता’ के दंभ के कारण।”
वैदेही ने पलकें झुका लीं। “क्या बड़ा होना इतना कष्टदायी है कि इंसान अपनी सहज भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार भी खो दे?”
शिखर एक क़दम आगे बढ़े, उनकी आत्मा वैदेही के प्रेम को महसूस कर रही थी। वे जानते थे कि यह स्त्री उनसे कितना अगाध प्रेम करती है। उन्हें पता था कि वैदेही की डायरी के पन्नों पर उनके नाम के कितने अश्क गिरे होंगे। पर ठीक उसी क्षण, उनके कानों में समाज की वे कर्कश आवाज़ें गूँज उठीं, जो जाति और कुल की ऊँची दीवारों पर पहरा दे रही थीं।
शिखर का कुल उच्च ब्राह्मणों का वह गढ़ था जहाँ ‘शुद्धता’ के नाम पर भावनाओं का गला घोंटा जाता था। वैदेही, जो एक भिन्न जाति और साधारण पृष्ठभूमि से आती थीं, उस हवेली की चौखट कभी पार नहीं कर सकती थीं।
शिखर ने लंबी साँस ली और कहा, “वैदेही, कुछ पात्रों को ईश्वर केवल दूर से प्रेम करने के लिए गढ़ता है। उन्हें पास लाना, उनकी गरिमा को खंडित करना होता है।”
वैदेही की आँखों में आँसू भर आए। “और यदि वह पात्र स्वयं खंडित होने को तैयार हो? यदि वह अपनी गरिमा को आपके शब्दों के चरणों में चढ़ा देना चाहे, तब?”
शिखर का हृदय चीख़ उठा, ‘मैं भी तुमसे उतना ही प्रेम करता हूँ वैदेही! तुम्हारी यह विद्वत्ता, यह सौंदर्य, यह समर्पण . . . यह सब मेरे साहित्य का केंद्र है।’ पर उनके मुख से केवल इतना निकला, “तब भी . . . समय हमें अपराधी ही मानेगा।”
महीने बीतते गए। दोनों के बीच पत्रों का एक सिलसिला शुरू हुआ, पर उनमें भी ‘प्रेम’ शब्द का प्रयोग वर्जित था। वे दर्शन, साहित्य और समाज पर बातें करते, पर उन पंक्तियों के बीच के ख़ाली स्थान में उनकी तड़प स्पष्ट दिखाई देती थी।
वैदेही के घरवाले उनके विवाह के लिए दबाव बना रहे थे। उनके पास कई बड़े घरानों के रिश्ते थे, पर वैदेही ने मौन का व्रत धारण कर लिया था। उनकी सुंदरता अब पीली पड़ने लगी थी, जैसे कोई फूल बिना धूप के कुम्हला रहा हो।
एक दिन, शिखर को पता चला कि वैदेही का स्थानांतरण किसी दूरदराज़ के पहाड़ी गाँव में हो गया है। वे समझ गए कि यह वैदेही का स्वयं को उनसे दूर करने का अंतिम प्रयास है। वे उनसे मिलने स्टेशन पहुँचे।
भीड़-भाड़ वाले स्टेशन पर, रेलगाड़ी की सीटी के बीच, दोनों एक बार फिर आमने-सामने थे। वैदेही की आँखों में अब कोई प्रश्न नहीं था, केवल एक शांत स्वीकारोक्ति थी।
शिखर ने एक छोटी सी डायरी उनकी ओर बढ़ाई। “इसमें मेरा वह सत्य है, जो मैंने कभी प्रकाशित नहीं किया।”
वैदेही ने उसे सीने से लगा लिया। उन्होंने धीमे से कहा, “शिखर जी, समाज जीत गया, जाति जीत गई, आपका ‘बड़ा व्यक्तित्व’ जीत गया। हार गया तो केवल वह प्रेम, जो आपके शब्दों में तो अमर है, पर मेरे जीवन में मृत।”
शिखर कुछ कहना चाहते थे। उनका हाथ बढ़ा कि वैदेही का हाथ थाम लें, उन्हें रोक लें, चिल्लाकर कहें कि वे इस दुनिया की सारी दीवारों को ढहा देंगे। पर समाज के संस्कार और अपनी ही बनाई हुई ‘आदर्श पुरुष’ की छवि ने उनके पैरों में बेड़ियाँ डाल दीं।
गाड़ी चल पड़ी। वैदेही खिड़की से बाहर देखती रहीं जब तक कि शिखर का वह ‘विराट व्यक्तित्व’ एक छोटे से बिंदु में बदलकर ओझल नहीं हो गया।
वर्षों बाद, जब शिखर का निधन हुआ, तो उनके सिरहाने वही पुरानी डायरी मिली। उसके अंतिम पृष्ठ पर लिखा था “वैदेही, मैं डर गया था। लोग कहते हैं मैं शब्दों का जादूगर हूँ, पर मैं अपनी ही जाति और समाज के सामने एक कायर सिद्ध हुआ। तुम्हारा सौंदर्य मेरे शब्दों की शक्ति था, पर मेरा अहंकार तुम्हारी आँखों के आँसुओं को नहीं पोंछ सका। हम साहित्य के पन्नों पर मिलेंगे, जहाँ न कोई जाति होगी, न कोई दीवार।”
वैदेही आज भी उस पहाड़ी गाँव के स्कूल में पढ़ाती हैं। वे आज भी उतनी ही सुंदर हैं, पर वह सौंदर्य अब एक तपस्या बन चुका है। वे हर रोज़ शिखर की कृतियाँ पढ़ती हैं, और हर शब्द में ख़ुद को ढूँढ़ती हैं।
कहानी समाप्त हो गई, पर क्या यह प्रेम वास्तव में अधूरा रहा? क्या समाज की बनाई दीवारें इतनी सुदृढ़ हैं कि दो महान आत्माओं के मिलन को रोक सकें?
शिखर ने अपनी छवि बचाने के लिए प्रेम का बलिदान दिया, और वैदेही ने प्रेम को बचाने के लिए स्वयं का बलिदान कर दिया।
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- व्यक्तित्व व आत्मविश्वास
- शिक्षक पेशा नहीं मिशन है
- शिक्षण का वर्तमान परिदृश्य: चुनौतियाँ, अपेक्षाएँ और भावी दिशा
- संकट की घड़ी में हमारे कर्तव्य
- सम्बन्ध और स्वार्थ का द्वंद्व
- सम्बन्धों का क्षरण: एक सामाजिक विमर्श
- स्वतंत्रता दिवस: गौरव, बलिदान, हमारी ज़िम्मेदारी और स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत
- स्वामी विवेकानंद: आधुनिक भारत के आध्यात्मिक महाप्राण
- हिंदी और रोज़गार: भाषा से अवसरों की नई दुनिया
- हैलो मैं कोरोना बोल रहा हूँ
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
लघुकथा
- अंतर
- अनैतिक प्रेम
- अपनी जरें
- आँखों का तारा
- आओ तुम्हें चाँद से मिलाएँ
- उजाले की तलाश
- उसका प्यार
- एक बूँद प्यास
- काहे को भेजी परदेश बाबुल
- कोई हमारी भी सुनेगा
- गाय की रोटी
- गाय ‘पालन की परिभाषा’!
- डर और आत्म विश्वास
- तहस-नहस
- तुलना का बोझ
- दूसरी माँ
- नारी ‘तुम मत रुको’!
- पति का बटुआ
- पत्नी
- पाँच लघु कथाएँ
- पौधरोपण
- बेटी की गुल्लक
- माँ का ब्लैकबोर्ड
- माँ ‘छाया की तरह’!
- मातृभाषा
- माया
- मुझे छोड़ कर मत जाओ
- मुझे ‘बहने दो’!
- म्यूज़िक कंसर्ट
- रिश्ते (डॉ. सुशील कुमार शर्मा)
- रौब
- शर्बत
- शिक्षक सम्मान
- शिक्षा की पाँच दीपशिखाएँ
- शुद्धि की प्रतीक्षा
- शेष शुभ
- सपनों की उड़ान
- हर चीज़ फ़्री
- हिंदी–माँ की आवाज़
- हिन्दी इज़ द मोस्ट वैलुएबल लैंग्वेज
- ग़ुलाम
- ज़िन्दगी और बंदगी
- फ़र्ज़
व्यक्ति चित्र
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- अमृत काल का आम
- एक कप चाय और सौ जज़्बात
- कविता बेचो, कविता सीखो!
- काश मैं नींबू होता
- गुरु दक्षिणा का नया संस्करण—व्हाट्सएप वाला प्रणाम!
- घरेलू मॉडल स्त्री
- डॉ. सिंघई का ‘संतुलित’ संसार
- नवदुर्गा महोत्सव और मोबाइल
- न्याय की गली में कुत्तों का दरबार
- प्रोफ़ाइल पिक की देशभक्ति
- मातृ दिवस और पितृ दिवस: कैलेंडर पर टँगे शब्द
- मिठाइयों में बसा मनुष्य का मनोविज्ञान
- वाघा का विघटन–जब शेर भी कन्फ्यूज़ हो गया
- शर्मा जी और सब्ज़ी–एक हरी-भरी कथा
ललित निबन्ध
गीत-नवगीत
- अखिल विश्व के स्वामी राम
- अच्युत माधव
- अनुभूति
- अब कहाँ प्यारे परिंदे
- अब का सावन
- अब नया संवाद लिखना
- अब वसंत भी जाने क्यों
- अबके बरस मैं कैसे आऊँ
- आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
- आज से विस्मृत किया सब
- इस बार की होली में
- उठो उठो तुम हे रणचंडी
- उर में जो है
- कि बस तुम मेरी हो
- कृष्ण मुझे अपना लो
- कृष्ण सुमंगल गान हैं
- गमलों में है हरियाली
- गर इंसान नहीं माना तो
- गुरु पूर्णिमा पर गीत
- गुलशन उजड़ गया
- गोपी गीत
- घर घर फहरे आज तिरंगा
- चला गया दिसंबर
- चलो होली मनाएँ
- चढ़ा प्रेम का रंग सभी पर
- ज्योति शिखा सी
- झरता सावन
- टेसू की फाग
- तुम तुम रहे
- तुम मुक्ति का श्वास हो
- दिन भर बोई धूप को
- धरती बोल रही है
- नया कलेंडर
- नया वर्ष
- नव अनुबंध
- नववर्ष
- फागुन ने कहा
- फूला हरसिंगार
- बहिन काश मेरी भी होती
- बेटी घर की बगिया
- बोन्साई वट हुए अब
- भरे हैं श्मशान
- मतदाता जागरूकता पर गीत
- मन का नाप
- मन को छलते
- मन गीत
- मन बातें
- मन वसंत
- मन संकल्पों से भर लें
- महावीर पथ
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 001
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 002
- मौन गीत फागुन के
- मज़दूर दिवस पर गीत
- यूक्रेन युद्ध
- वयं राष्ट्र
- वसंत पर गीत
- वासंती दिन आए
- विधि क्यों तुम इतनी हो क्रूर
- शस्य श्यामला भारत भूमि
- शस्य श्यामली भारत माता
- शिव
- श्रावण
- सत्य का संदर्भ
- सुख-दुख सब आने जाने हैं
- सुख–दुख
- सूना पल
- सूरज की दुश्वारियाँ
- सूरज को आना होगा
- स्वागत है नववर्ष तुम्हारा
- हर हर गंगे
- हिल गया है मन
- ख़ुद से मुलाक़ात
- ख़ुशियों की दीवाली हो
स्वास्थ्य
स्मृति लेख
खण्डकाव्य
बाल साहित्य कविता
- अरे गिलहरी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - ठंड
- गर्मी की छुट्टी
- चिड़िया का दुःख
- चिड़िया की हिम्मत
- पतंग
- पानी बचाओ
- बादल भैया
- बाल कविताएँ – 001 : डॉ. सुशील कुमार शर्मा
- बेचारा गोलू
- मुनमुन गिलहरी
- मैं कुछ ख़ास बनूँगा
- मैं ही तो हूँ— तुम्हारे भीतर
- लोरी
- लौकी और कद्दू की लड़ाई
- हम हैं छोटे बच्चे
- होली चलो मनायें
नाटक
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
ग़ज़ल
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
विडियो
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