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पिता बरगद की छाया

 

पिता के जाने के बाद घर में सबसे अधिक जो चीज़ ग़ायब हुई, वह उनकी चारपाई नहीं थी, उनका पुराना चश्मा नहीं था और न ही दीवार पर टँगी उनकी घड़ी। ग़ायब हुआ था—घर का पता। मुझे यह बात उनके जीवित रहते कभी समझ नहीं आई। जब तक पिता थे, घर बस घर था। सुबह चाय मिल जाती थी, फ़ीस समय पर जमा हो जाती थी, माँ की दवाइयाँ आ जाती थीं, त्योहार पर नए कपड़े भी आ जाते थे और महीने के अंत में राशन भी कभी समाप्त नहीं होता था। मुझे लगता था कि यह सब अपने आप होता है, जैसे सूरज का निकलना या ऋतुओं का बदलना।

पिता उन लोगों में से थे जो कम बोलते थे। इतना कम कि कई बार मुझे लगता था कि उन्हें हम लोगों से कोई विशेष लगाव ही नहीं है। मेरे मित्रों के पिता उनके साथ बैठकर घंटों बातें करते थे, हँसते थे, घूमने जाते थे, लेकिन मेरे पिता सुबह काम पर जाते और शाम को लौटकर बरामदे में चुपचाप बैठ जाते। कभी अख़बार पढ़ते, कभी पुराने हिसाब-किताब देखते रहते। एक दिन मैंने झुँझलाकर माँ से कहा, "पिताजी, आप कभी खुलकर बात क्यों नहीं करते?" माँ मुस्कुराईं और बोलीं, "बेटा, जिनके कंधों पर पूरा घर होता है, उनके पास शब्द कम बचते हैं।" उस समय यह बात मेरी समझ में नहीं आई थी।

पिता का छोटा-सा व्यवसाय था। आमदनी निश्चित नहीं थी, लेकिन ख़र्चे निश्चित थे। मेरी पढ़ाई, छोटी बहन की फ़ीस, दादी की दवाइयाँ और घर का ख़र्च—सब कुछ उन्हीं के कंधों पर था। फिर भी उन्होंने कभी हमें अभाव का एहसास नहीं होने दिया। मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैंने कॉलेज में अपने मित्रों को नए जूते पहने देखा और घर आकर वैसी ही जोड़ी की ज़िद कर बैठा। पिता ने केवल क़ीमत पूछी। अगले सप्ताह जूते मेरे सामने थे। मैं ख़ुशी से भर उठा। लेकिन मैंने यह नहीं देखा कि पिता के पैरों में पड़े जूतों की एड़ी लगभग घिस चुकी थी। बहुत बाद में माँ ने बताया कि उन दिनों वे अपने लिए जूते ख़रीदने वाले थे, पर मेरी इच्छा के आगे उन्होंने अपनी आवश्यकता टाल दी।

उस रात पहली बार मुझे लगा कि कुछ इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, वे किसी और की ख़ुशी में चुपचाप ख़र्च हो जाती हैं।

समय आगे बढ़ता गया। मैं पढ़ाई पूरी करके नौकरी के लिए दूसरे शहर चला गया। अब बातचीत का माध्यम फ़ोन था। माँ हमेशा पूछतीं, "खाना समय पर खा रहे हो न?" और पिता पूछते, "काम ठीक चल रहा है?" बातचीत यहीं समाप्त हो जाती। कई बार मुझे लगता कि उन्हें मेरी याद नहीं आती होगी। एक दिन मैंने हँसते हुए कह भी दिया, "पिताजी, आप कभी कहते क्यों नहीं कि आपको मेरी याद आती है?"

फ़ोन के उस पार कुछ क्षण मौन रहा। फिर उनकी धीमी आवाज़ आई, "बेटा, जब बच्चे घर से दूर होते हैं, तो पिता उन्हें याद कम और उनकी चिंता ज़्यादा करते हैं।" उस समय भी मैं इस वाक्य की गहराई नहीं समझ पाया।

नौकरी लग गई। विवाह हो गया। जीवन अपनी रफ़्तार से दौड़ने लगा। धीरे-धीरे मैं भी ज़िम्मेदारियों के उसी चक्र में प्रवेश कर चुका था जिसमें कभी पिता थे। महीने की कमाई और ख़र्च का हिसाब अब मुझे भी परेशान करने लगा था। बच्चों की फ़ीस, घर की किस्त, माता-पिता की दवाइयाँ, सामाजिक दायित्व—सब कुछ मेरे सामने था। तब पहली बार मुझे पिता की चुप्पी का अर्थ समझ में आने लगा।

एक बार घर गया तो देखा पिता पहले की तुलना में बहुत दुबले हो गए हैं। बाल लगभग सफ़ेद हो चुके थे। मैंने पूछा, "स्वास्थ्य ठीक है न?" वे मुस्कुराकर बोले, "अब इस उम्र में क्या ख़राब और क्या ठीक?" फिर बात बदल दी।

लेकिन माँ ने बाद में बताया कि कई महीनों से उन्हें घुटनों का दर्द था। दवा भी नियमित नहीं ले रहे थे। कारण वही पुराना था—ख़र्च बढ़ जाएगा।

मैं चौंक गया। जिनकी वजह से हम कभी अभाव में नहीं रहे, वे स्वयं अपनी पीड़ा को ख़र्च समझकर टाल रहे थे।

एक दिन अलमारी साफ़ करते समय कुछ पुराने काग़ज़ मिले। उनमें मेरी कॉलेज फ़ीस की रसीदें थीं, बैंक से लिए गए छोटे-छोटे ऋणों के दस्तावेज़ थे, बहन की पढ़ाई के लिए गिरवी रखी गई एक पुरानी ज़मीन का काग़ज़ था। मैं अवाक रह गया। मुझे कभी पता ही नहीं चला था कि मेरी पढ़ाई के लिए पिता ने कितने संघर्ष किए थे। उन्होंने कभी इसका उल्लेख नहीं किया। कभी यह नहीं कहा कि तुम्हारी सफलता में मेरा त्याग है। वे बस चुपचाप अपना कर्तव्य निभाते रहे।

उसी रात मैं देर तक जागता रहा। बरामदे में बैठे पिता को देखता रहा। पहली बार लगा कि यह व्यक्ति केवल मेरा पिता नहीं है, यह वह वृक्ष है, जिसकी छाया में खड़े होकर मैं धूप का अर्थ ही भूल गया था।

कुछ वर्षों बाद पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। अस्पताल के कमरे में पहली बार मैंने उन्हें कमज़ोर देखा। वह व्यक्ति जो हर संकट में दीवार की तरह खड़ा रहता था, आज स्वयं बिस्तर पर था। मैं उनके पास बैठा रहा। उन्होंने मेरा हाथ दबाया और कहा, "घबराना मत, सब ठीक हो जाएगा।"

मुझे उस क्षण बड़ी विडंबना लगी। जो व्यक्ति स्वयं जीवन की अंतिम लड़ाई लड़ रहा था, वह आज भी दूसरों को ढाढ़स बाँध रहा था।

उनकी बीमारी लंबी नहीं चली। एक सुबह वे चुपचाप चले गए। जैसे जीवन-भर शोर से दूर रहे, वैसे ही मृत्यु भी बिना किसी शोर के उन्हें अपने साथ ले गई।

घर लोगों से भर गया था। रिश्तेदार थे, मित्र थे, परिचित थे। लेकिन उस भीड़ में एक ख़ालीपन ऐसा था जिसे कोई भर नहीं सकता था।

तेरहवीं के बाद जब सब लौट गए, तब पहली बार घर सचमुच सूना लगा। बरामदे की वह कुर्सी ख़ाली थी जहाँ पिता बैठा करते थे। दीवार पर टँगा उनका चश्मा वैसा ही था। उनकी घड़ी भी चल रही थी, लेकिन समय जैसे कहीं ठहर गया था।

उनके जाने के बाद अनेक छोटी-छोटी बातें समझ में आने लगीं। बिजली का बिल समय पर कैसे भर जाता था। राशन कैसे आ जाता था। घर की मरम्मत कब होती थी। रिश्तेदारों की सहायता कैसे पहुँचा दी जाती थी। माँ की दवाइयाँ कौन लाता था। परिवार के संकटों को कौन अपने ऊपर ले लेता था। यह सब किसी व्यवस्था से नहीं, पिता से चल रहा था।

एक दिन मेरा बेटा मेरे पास आया और बोला, "पापा, आप मेरी बात नहीं समझते।" मैंने कुछ क्षण चुप रहा। यही वाक्य मैंने भी कभी अपने पिता से कहा था। उस दिन पहली बार मेरी आँखें भर आईं।

अब जब भी कोई कठिन निर्णय लेना होता है, मैं अनायास सोचता हूँ—पिताजी होते तो क्या करते? जब कोई संकट सामने खड़ा होता है, तो लगता है जैसे जीवन का सबसे मज़बूत स्तंभ अचानक अनुपस्थित हो गया हो।

आज पिता नहीं हैं, लेकिन उनकी सीख, उनका त्याग, उनकी चुप्पी और उनका प्रेम घर की दीवारों में अब भी मौजूद है। अब समझ में आता है कि पिता कंधा नहीं होते, जिस पर सिर रखकर रो लिया जाए। वे धरती होते हैं, जिस पर खड़े होकर हम पूरी दुनिया का सामना कर लेते हैं।

जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने एक बात सीखी है—घर का पता मकान नंबर नहीं होता, न गली का नाम होता है और न किसी शहर का नक़्शा। घर का असली पता वह व्यक्ति होता है, जो अपने सपनों को गिरवी रखकर हमारे सपनों की रक्षा करता है, जो अपनी इच्छाओं को त्यागकर हमारी ख़ुशियाँ ख़रीदता है, जो अपनी पीड़ा छिपाकर हमारे चेहरे पर मुस्कान बनाए रखता है।

मेरे घर का वह पता अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन आज भी जब स्मृतियों के दरवाज़े खुलते हैं, सबसे पहले वही दिखाई देते हैं—एक साधारण-सा आदमी, घिसे हुए जूते पहने, चेहरे पर थकान लिए, फिर भी पूरे परिवार के लिए एक पहाड़ की तरह खड़ा हुआ। और तब महसूस होता है कि पिता कभी मरते नहीं। वे घर की दीवारों, बच्चों के संस्कारों और स्मृतियों की नमी में जीवन भर जीवित रहते हैं।

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