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वह तो झांसी वाली रानी थी

 

सन् अठारह सौ सत्तावन में
केवल एक युद्ध नहीं हुआ था, 
एक स्त्री ने
सदियों से पुरुषों द्वारा लिखे जा रहे इतिहास के बीच
अपना नाम
तलवार की नोक से अंकित कर दिया था। 
उस दिन
भारत की पवित्र भूमि ने देखा था
कि एक नारी
जब अपने स्वाभिमान के लिए खड़ी होती है, 
तो राजमुकुट छोटे पड़ जाते हैं
और साम्राज्य बौने। 
 
लक्ष्मीबाई . . . 
यह केवल एक नाम नहीं, 
पराधीनता के अंधकार में
अचानक फूट पड़ने वाली
उस दामिनी का नाम है
जिसने सिंहासनों की जड़ों तक
भय पहुँचा दिया था। 
वे कहते हैं
उसने युद्ध किया। 
मैं कहता हूँ
नहीं, 
उसने युद्ध नहीं किया। 
उसने
ग़ुलामी को अस्वीकार किया था। 
युद्ध तो
उस अस्वीकार का परिणाम भर था। 
 
जब अंग्रेज़ों ने
झाँसी को काग़ज़ के एक आदेश में बाँधना चाहा, 
तब पहली बार
किसी स्त्री ने सत्ता से कहा था
तुम्हारे नियम
मेरी आत्मा से बड़े नहीं हैं। 
उस क्षण
झाँसी का क़िला
पत्थरों का ढाँचा नहीं रहा, 
वह सम्पूर्ण भारत का मस्तक बन गया। 
और लक्ष्मीबाई
उस मस्तक पर
धधकती हुई बिंदी। 
वह तलवार लेकर निकली, 
किन्तु तलवार उसकी पहचान नहीं थी। 
पहचान थी
उसके भीतर का वह ज्वालामुखी
जो अन्याय के विरुद्ध
मौन रहने को पाप समझता था। 
उसकी नसों में
रक्त नहीं, 
नर्मदा का प्रवाह था। 
उसकी दृष्टि में
अश्रु नहीं, 
विन्ध्याचल की अडिगता थी। 
उसकी वाणी में
क्रोध नहीं, 
एक सभ्यता का अपमान बोलता था। 
 
और जब
दामोदर उसकी पीठ से बँधे थे, 
तब इतिहास ने पहली बार देखा
कि मातृत्व और रणकौशल
एक ही शरीर में निवास कर सकते हैं। 
उस दिन
एक माँ युद्धभूमि में उतरी थी। 
किन्तु वह
अपने पुत्र का भविष्य बचाने नहीं, 
समस्त संतानों का भविष्य बचाने निकली थी। 
उसे ज्ञात था
कि उसकी तलवार
शायद साम्राज्य को न हरा सके। 
किन्तु उसे यह भी ज्ञात था
कि आने वाली शताब्दियों में
कुछ बालिकाएँ
उसकी कथा सुनकर
अपने भय से लड़ना सीखेंगी। 
कुछ युवक
उसकी मृत्यु से
स्वतंत्रता का अर्थ समझेंगे। 
कुछ राष्ट्रभक्त
उसकी राख से
क्रांति का तिलक रचेंगे। 
और हुआ भी यही। 
वह गिरी, 
किन्तु पराजित नहीं हुई। 
क्योंकि पराजय
शरीर की होती है, 
संकल्प की नहीं। 
उसकी चिता की अग्नि से
भगत सिंह की आँखों में
स्वप्न जले। 
आज़ाद की बंदूक में
आग जली। 
सुभाष के स्वर में
गर्जना जली। 
और करोड़ों भारतीयों के भीतर
स्वाधीनता का सूर्य उगा। 
 
आज भी
जब कोई स्त्री
अपने आत्मसम्मान के लिए
समूचे समाज से लड़ जाती है, 
वहाँ लक्ष्मीबाई होती हैं। 
जब कोई बेटी
अपने सपनों के लिए
परम्पराओं की दीवार लाँघती है, 
वहाँ लक्ष्मीबाई होती हैं। 
जब कोई नागरिक
सत्य के पक्ष में
अकेला खड़ा रह जाता है, 
वहाँ लक्ष्मीबाई होती हैं। 
क्योंकि
लक्ष्मीबाई मरकर भी
इतिहास नहीं बनीं। 
वे चेतना बन गईं। 
वे स्मृति नहीं, 
संस्कार हैं। 
वे व्यक्तित्व नहीं, 
प्रतिरोध की अनश्वर परम्परा हैं। 
और जब तक
इस देश की किसी भी बेटी की आँखों में
स्वाभिमान की एक चिनगारी शेष है, 
जब तक
भारत की मिट्टी में
स्वतंत्रता का एक बीज जीवित है, 
तब तक
झाँसी की रानी
घोड़े पर सवार रहेगी, 
तलवार उठाए रहेगी, 
और समय के सिंहासन पर लिखती रहेगी
स्वाधीनता
प्राणों से नहीं, 
प्राणों के उत्सर्ग से प्राप्त होती है। 

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