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दो कौड़ी बनाम फूटी कौड़ी

 (नाटिका)
पात्र परिचय

 

ज्ञानदेव: एक समर्पित, गंभीर और वैचारिक यूट्यूब शिक्षक (यू-ट्यूटर)। सादगीपसंद, जो डिजिटल मंच पर नि:शुल्क शिक्षा की क्रांति का नेतृत्व कर रहे हैं।

अनामिका सिंह: एक प्रतिष्ठित टीवी चैनल की मुख्य एंकर। सत्ता, टीआरपी और अहंकार के मद में चूर, जो पारंपरिक मीडिया को ही सर्वेसर्वा मानती हैं।
त्रिलोकीनाथ: मीडिया घराने के प्रबंध निदेशक (एमडी)। केवल मुनाफ़े, टीआरपी रेटिंग और सरकारी विज्ञापनों से सरोकार रखने वाले चतुर व्यवसायी।
विवेक: एक मेधावी छात्र, जो अभावों में रहकर यूट्यूब शिक्षकों के माध्यम से सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करता है।
सत्यप्रकाश: एक वरिष्ठ, निष्पक्ष पत्रकार जो अब मुख्यधारा की पत्रकारिता से निराश होकर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

 

दृश्य 1: 

 

(स्थान: एक भव्य, आधुनिक स्टुडियो। चकाचौंध रोशनी के बीच अनामिका सिंह हाथ में माइक थामे प्राइम टाइम की तैयारी कर रही हैं। पृष्ठभूमि में बड़ी स्क्रीन पर भड़काऊ ग्राफिक्स और टीआरपी के चार्ट चल रहे हैं। बग़ल में त्रिलोकीनाथ फ़ाइलें देख रहे हैं)

अनामिका:

(माइक को सँभालते हुए, तीखे स्वर में) “त्रिलोकी जी! देखिए इन ‘दो कौड़ी’ के डिजिटल दुकानदारों को! मोबाइल का कैमरा क्या मिल गया, ख़ुद को राष्ट्र का भाग्यविधाता समझने लगे हैं। हमारे स्टुडियो की एक लाइट की क़ीमत इनके पूरे साल के बजट से ज़्यादा है, और ये ज्ञान बाँट रहे हैं!”

त्रिलोकीनाथ:

(कुटिल मुस्कान के साथ) “शांत अनामिका, शांत। उनकी औक़ात ही क्या है? लेकिन सच यह है कि वे हमारी टीआरपी के बड़े हिस्से में सेंध लगा रहे हैं। युवा वर्ग अब शाम सात बजे हमारा डिबेट शो देखने के बजाय, इन शिक्षकों के ऑनलाइन व्याख्यान सुन रहा है। यह हमारे व्यापार के लिए शुभ संकेत नहीं है।”

अनामिका:

(क्रोध से पैर पटकते हुए) व्यापार तो तब चलेगा न जब इनका वुजूद होगा! “आज रात के प्राइम टाइम में मैं इनका ऐसा भंडाफोड़ करूँगी कि इनकी सारी बौद्धिक हेकड़ी हवा हो जाएगी।”

(कैमरे की ओर मुख करके, नाटकीय भावभंगिमा के साथ) “नमस्कार! मैं अनामिका सिंह। आज रात हम बेनक़ाब करेंगे उन स्वयंभू गुरुओं को, जो बंद कमरों में बैठकर, चंद सब्सक्राइबर के दम पर, ख़ुद को ज्ञान का सागर समझते हैं। ये दो कौड़ी के शिक्षक, जो केवल चंद रुपयों और व्यूज़ के लिए देश के युवाओं को दिगभ्रमित कर रहे हैं, इनकी असलियत आज पूरा देश देखेगा!”

त्रिलोकीनाथ:

(ताली बजाते हुए) “अद्भुत! बेमिसाल! यही तो वह पंच है जो दर्शकों को टीवी स्क्रीन से चिपकाए रखेगा। चाहे तथ्य कुछ भी हों, सनसनी कम नहीं होनी चाहिए। सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनता तक, आज रात केवल तुम्हारा ही डंका बजेगा।”

(अनामिका गर्व से अपनी गर्दन ऊँची करती है, जबकि पार्श्व में टीआरपी मीटर की सूई तेज़ी से ऊपर भागती दिखाई देती है। मंच पर अँधेरा छा जाता है)

 

दृश्य 2: 

 

(स्थान: एक साधारण कमरा। एक सफ़ेद बोर्ड, एक साधारण कैमरा, कुछ किताबें और एक मेज़। ज्ञानदेव शांत मुद्रा में बैठे कुछ नोट्स तैयार कर रहे हैं। तभी उनका एक छात्र, विवेक, उत्तेजित अवस्था में मोबाइल हाथ में लिए प्रवेश करता है)

विवेक:

(आक्रोशित स्वर में) “गुरुजी! अनर्थ हो गया! देखिए इस बड़े चैनल की मुख्य एंकर ने आपके और पूरे ऑनलाइन शिक्षक समुदाय के ख़िलाफ़ कैसी अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया है। हमें ‘दो कौड़ी का’ कहा गया है! हमारी मेहनत, हमारी साधना का ऐसा क्रूर उपहास?”

ज्ञानदेव:

(धीमी और गंभीर मुस्कान के साथ) “विवेक, वत्स! शांत हो जाओ। उद्वेग बुद्धि का हरण कर लेता है। जो महलों में बैठकर चकाचौंध के आदी हो चुके हैं, उन्हें कुटिया का दिया हमेशा तुच्छ ही दिखाई देता है। वे दीपक की लौ को नहीं, केवल उसकी बाती के कालेपन को देखते हैं।”

विवेक:

लेकिन गुरुजी, यह मौन रहने का समय नहीं है। इनकी स्वेच्छाचारिता इतनी बढ़ गई है कि ये ख़ुद को ही समाज का न्यायाधीश समझने लगे हैं। जो देश के सुदूर गाँवों तक, जहाँ न कोई स्कूल है न कोई साधन, शिक्षा की अलख जगा रहे हैं, उन्हें ये दो कौड़ी का कह रहे हैं?”

ज्ञानदेव:

(उठकर विवेक के कंधे पर हाथ रखते हैं) “सुनो विवेक, सत्य को किसी गगनचुंबी अट्टालिका के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती। हमारी क़ीमत वह छात्र जानता है जिसके पास महँगे कोचिंग संस्थानों की फ़ीस भरने के पैसे नहीं थे, लेकिन आज वह अपने पैरों पर खड़ा है। मीडिया का एक बड़ा वर्ग आज सत्ता की चाटुकारिता में लीन है, वे जनसरोकार भूल चुके हैं। वे जब हमें ‘दो कौड़ी का’ कहते हैं, तो वास्तव में वे अपनी ही नैतिक गिरावट का विज्ञापन कर रहे होते हैं। 

(ज्ञानदेव बोर्ड पर चाक से एक वाक्य लिखते हैं: “ज्ञान की क़ीमत सिंहासन तय नहीं करता, समाज का आत्मसम्मान तय करता है।” मंच पर प्रकाश धीमा होता है।)

 

दृश्य 3:

 

चाटुकारिता का नैवेद्य (स्थान: त्रिलोकीनाथ का आलीशान केबिन। टेबल पर विदेशी मदिरा की बोतलें और कुछ फ़ाइलें रखी हैं। सत्ता पक्ष के एक बड़े नेता का प्रतिनिधि)

(नेपथ्य से आवाज़) और त्रिलोकीनाथ बात कर रहे हैं। अनामिका भी वहाँ मौजूद है)

त्रिलोकीनाथ:

(फोन पर, विनीत भाव से) “जी हुज़ूर, बिल्कुल। आप निश्चिंत रहें। आज रात के डिबेट में विपक्ष के प्रवक्ता का माइक ठीक उसी समय बंद होगा जब वह बेरोज़गारी पर आँकड़े देना शुरू करेगा। हमने अनामिका को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया है कि कब राष्ट्रवाद का मुद्दा उछालना है और कब मूल मुद्दों से ध्यान भटकाना है।”

अनामिका:

(गर्व से) “और सर, मैंने आज उन ऑनलाइन शिक्षकों पर जो हमला किया है, उससे युवाओं का ध्यान सरकार की नई नीतियों के विरोध से हटकर इस नए विवाद पर टिक गया है। सोशल मीडिया पर अब इसी बात पर युद्ध छिड़ा है।”

त्रिलोकीनाथ:

(फोन रखकर) “शाबाश अनामिका! इस तिमाही का हमारा विज्ञापन बजट सरकार ने दोगुना कर दिया है। इसे कहते हैं पत्रकारिता का असली हुनर। सत्य वह नहीं है जो घटित हो रहा है, सत्य वह है जो हम दिखाना चाहते हैं।”

सत्यप्रकाश:

(अचानक कमरे में प्रवेश करते हुए, हाथ में कुछ काग़ज़ात लिए) “धिक्कार है! त्रिलोकी, और शत-शत धिक्कार है तुम पर अनामिका! जिसे तुम हुनर कह रही हो, वह पत्रकारिता की अर्थी पर किया जाने वाला अश्लील नृत्य है।”

अनामिका:

(तेवर दिखाते हुए) “सत्यप्रकाश जी! आप अपनी पुरानी, सड़ चुकी आदर्शवादी पत्रकारिता की पोटली अपने पास ही रखिए। आज के दौर में जो बिकता है, वही टिकता है। आपकी तथाकथित निष्पक्षता ने आपको एक छोटे से स्वतंत्र ब्लॉग तक सीमित कर दिया, और हम आज देश के सबसे रसूख़दार नाम हैं।”

सत्यप्रकाश:

(हँसते हुए, व्यंग्य के बाण छोड़ते हुए) “रसूख़दार? या चाटुकारिता के कीचड़ में उगे हुए कुकुरमुत्ते? तुमने उन शिक्षकों को दो कौड़ी का कहा, जो राष्ट्र के निर्माण में मूक साधक की तरह लगे हैं। तुम्हारी ख़ुद की क़ीमत क्या है अनामिका? एक सरकारी विज्ञापन की किश्त, या किसी बड़े कॉर्पोरेट घराने की एक मुस्कुराती हुई मंज़ूरी? तुम लोग अब पत्रकार नहीं रहे, तुम तो केवल सत्ता के दरबार के चारण हो, जो राजा की हर ग़लती पर ‘वाह-वाह’ की तान छेड़ते हो। 

(त्रिलोकीनाथ क्रोध में खड़ा हो जाता है, सत्यप्रकाश मुस्कुराते हुए वहाँ से निकल जाते हैं। अनामिका का चेहरा ग़ुस्से से तमतमा उठता है)

 

दृश्य 4:

 

जनक्रांति और विमर्श (स्थान: विश्वविद्यालय का एक चौराहा। कई छात्र हाथों में तख़्तियाँ लिए खड़े हैं जिन पर लिखा है:

“मैं भी दो कौड़ी का छात्र,”

“शिक्षा का व्यापार बंद करो,”

“गोदी मीडिया होश में आओ।”

विवेक मंच पर खड़ा होकर संबोधित कर रहा है)

विवेक:

(जोशपूर्ण आवाज़ में) “साथियों! आज लड़ाई सिर्फ़ एक बयान की नहीं है। यह लड़ाई उस मानसिकता के ख़िलाफ़ है जो मानती है कि ज्ञान केवल बड़े शहरों के वातानुकूलित कमरों और लाखों की फ़ीस देने वालों की बपौती है। जब मुख्यधारा का मीडिया करप्शन के दलदल में धँसा था, जब वे रिया चक्रवर्ती की कुंडली और सुशांत के घर के पंखे की लंबाई नाप रहे थे, तब इन यू-ट्यूटरों ने हमें इतिहास, भूगोल, विज्ञान और संविधान सिखाया।” 

छात्र समूह:

(एक स्वर में) “इंक़िलाब जिंदाबाद! हमारी शिक्षा, हमारा गौरव!”
विवेक:

“जो एंकर ख़ुद टेलीप्रॉम्प्टर के बिना एक वाक्य शुद्ध हिंदी या अंग्रेज़ी का नहीं बोल सकते, वे उन शिक्षकों पर उँगली उठा रहे हैं जो बिना किसी लिखित पर्ची के चार-चार घंटे लगातार ज्ञान की नदियाँ बहाते हैं। यह मीडिया स्वेच्छाचारी हो चुका है। इन्हें टीआरपी की भूख है, और हमें ज्ञान की प्यास है। जीत हमेशा प्यास की होगी, भूख की नहीं!”

सत्यप्रकाश:

(भीड़ से निकलकर आगे आते हैं) “युवाओ! तुम्हारी इस वैचारिक चेतना को मेरा सलाम है। जब देश का मुख्यधारा का मीडिया सत्ता का भोंपू बन जाए, तो वैकल्पिक मीडिया को ही कमान सँभालनी पड़ती है। इन डिजिटल शिक्षकों ने शिक्षा का लोकतंत्रीकरण किया है। इन्होंने महल की चारदीवारी से सरस्वती को निकालकर ग़रीब की झोपड़ी तक पहुँचाया है। यही कारण है कि महलों के पहरेदार घबराए हुए हैं।”

(सभी छात्र तालियाँ बजाते हैं। नारों की गूँज और तेज़ हो जाती है। मंच पर दृश्य बदलता है)

 


दृश्य 5: 

 

(स्थान: पुनः वही आधुनिक टीवी स्टुडियो। अनामिका लाइव शो में है, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर वह पुराना आत्मविश्वास नहीं है। उसकी स्क्रीन पर लगातार लाइव कमेंट्स आ रहे हैं जो उसके ख़िलाफ़ हैं। फोन लाइनों पर जनता का ग़ुस्सा फूट रहा है)

अनामिका:

(सँभलने का प्रयास करते हुए) “दर्शको, आज हमारे साथ पैनल में जुड़े हैं . . .”

(तभी स्क्रीन पर एक लाइव कॉलर की आवाज़ गूँजती है)। कॉलर की आवाज़

 

विवेक:

“अनामिका जी, मैं आपसे सीधा सवाल करना चाहता हूँ। आपने जिन शिक्षकों को दो कौड़ी का कहा, क्या आप जानती हैं कि पिछले वर्ष इसी राज्य से सिविल सेवा में चयनित होने वाले 50 प्रतिशत से अधिक छात्र उन्हीं ‘दो कौड़ी’ के चैनलों से पढ़कर निकले हैं? आपकी क़ीमत क्या है, जो हर शाम समाज में नफ़रत का ज़हर बोने के बदले करोड़ों का पैकेज लेती हैं?”

अनामिका:

(बौखलाते हुए) “देखिए, आप मुद्दे से भटक रहे हैं। हम विनियमन की बात कर रहे हैं . . . पीसीआर, इस कॉलर का फोन काटो!”

त्रिलोकीनाथ:

(केबिन से दौड़ते हुए स्टुडियो में आते हैं, बदहवास) “अनामिका! शो रोको! तुरंत विज्ञापन पर जाओ! हमारे चैनल का बहिष्कार ट्रेंड कर रहा है। बड़े स्पॉन्सर्स ने अपने विज्ञापन वापस लेने की धमकी दी है। वे कह रहे हैं कि वे युवाओं के ग़ुस्से का शिकार नहीं होना चाहते।”

अनामिका:

(सकते में आते हुए) “क्या? लेकिन त्रिलोकी जी, हमने तो वही किया जो हमेशा करते आए हैं। सनसनीखेज़ पंच!”

सत्यप्रकाश:

(स्टुडियो के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर, हाथ बाँधे हुए) “पंच जब सही जगह पड़ता है अनामिका, तो सत्ता के सिंहासन हिल जाते हैं। तुमने क़लम की ताक़त को भूलकर उसे सत्ता की चौखट पर गिरवी रख दिया था। आज देश के युवाओं ने तुम्हें तुम्हारी असली क़ीमत बता दी है।”

ज्ञानदेव:

(एक वीडियो संदेश के माध्यम से स्टुडियो की बड़ी स्क्रीन पर अवतरित होते हैं, शांत और गंभीर स्वर) “अनामिका जी, और त्रिलोकीनाथ जी। कौड़ी की चिंता वे करते हैं जिनका अस्तित्व और मूल्य बाज़ार तय करता है। शिक्षक कबीर की उस साखी की तरह होता है जो ‘बाज़ार में खड़ा होकर सबकी ख़ैर’ माँगता है। हमारी साधना को आपके टीआरपी के तराज़ू में तौलने की भूल मत कीजिए। हम कल भी राष्ट्र का निर्माण कर रहे थे, हम आज भी कर रहे हैं। आपके तीखे बाणों का उत्तर हम नफ़रत से नहीं, बल्कि एक और ग़रीब बच्चे को अधिकारी बनाकर देंगे।”

 

(स्क्रीन पर ज्ञानदेव का मुस्कुराता हुआ चेहरा स्थिर हो जाता है। अनामिका का माइक उसके हाथ से छूटकर गिर जाता है। त्रिलोकीनाथ अपना सिर पकड़कर बैठ जाता है। चारों ओर छात्रों के नारों और ज्ञानदेव के व्याख्यान की गूँज सुनाई देती है)


॥पटाक्षेप॥ 

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