दो कौड़ी बनाम फूटी कौड़ी
नाट्य-साहित्य | नाटक डॉ. सुशील कुमार शर्मा15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
(नाटिका)
पात्र परिचय
ज्ञानदेव: एक समर्पित, गंभीर और वैचारिक यूट्यूब शिक्षक (यू-ट्यूटर)। सादगीपसंद, जो डिजिटल मंच पर नि:शुल्क शिक्षा की क्रांति का नेतृत्व कर रहे हैं।
अनामिका सिंह: एक प्रतिष्ठित टीवी चैनल की मुख्य एंकर। सत्ता, टीआरपी और अहंकार के मद में चूर, जो पारंपरिक मीडिया को ही सर्वेसर्वा मानती हैं।
त्रिलोकीनाथ: मीडिया घराने के प्रबंध निदेशक (एमडी)। केवल मुनाफ़े, टीआरपी रेटिंग और सरकारी विज्ञापनों से सरोकार रखने वाले चतुर व्यवसायी।
विवेक: एक मेधावी छात्र, जो अभावों में रहकर यूट्यूब शिक्षकों के माध्यम से सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करता है।
सत्यप्रकाश: एक वरिष्ठ, निष्पक्ष पत्रकार जो अब मुख्यधारा की पत्रकारिता से निराश होकर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।
दृश्य 1:
(स्थान: एक भव्य, आधुनिक स्टुडियो। चकाचौंध रोशनी के बीच अनामिका सिंह हाथ में माइक थामे प्राइम टाइम की तैयारी कर रही हैं। पृष्ठभूमि में बड़ी स्क्रीन पर भड़काऊ ग्राफिक्स और टीआरपी के चार्ट चल रहे हैं। बग़ल में त्रिलोकीनाथ फ़ाइलें देख रहे हैं)
अनामिका:
(माइक को सँभालते हुए, तीखे स्वर में) “त्रिलोकी जी! देखिए इन ‘दो कौड़ी’ के डिजिटल दुकानदारों को! मोबाइल का कैमरा क्या मिल गया, ख़ुद को राष्ट्र का भाग्यविधाता समझने लगे हैं। हमारे स्टुडियो की एक लाइट की क़ीमत इनके पूरे साल के बजट से ज़्यादा है, और ये ज्ञान बाँट रहे हैं!”
त्रिलोकीनाथ:
(कुटिल मुस्कान के साथ) “शांत अनामिका, शांत। उनकी औक़ात ही क्या है? लेकिन सच यह है कि वे हमारी टीआरपी के बड़े हिस्से में सेंध लगा रहे हैं। युवा वर्ग अब शाम सात बजे हमारा डिबेट शो देखने के बजाय, इन शिक्षकों के ऑनलाइन व्याख्यान सुन रहा है। यह हमारे व्यापार के लिए शुभ संकेत नहीं है।”
अनामिका:
(क्रोध से पैर पटकते हुए) व्यापार तो तब चलेगा न जब इनका वुजूद होगा! “आज रात के प्राइम टाइम में मैं इनका ऐसा भंडाफोड़ करूँगी कि इनकी सारी बौद्धिक हेकड़ी हवा हो जाएगी।”
(कैमरे की ओर मुख करके, नाटकीय भावभंगिमा के साथ) “नमस्कार! मैं अनामिका सिंह। आज रात हम बेनक़ाब करेंगे उन स्वयंभू गुरुओं को, जो बंद कमरों में बैठकर, चंद सब्सक्राइबर के दम पर, ख़ुद को ज्ञान का सागर समझते हैं। ये दो कौड़ी के शिक्षक, जो केवल चंद रुपयों और व्यूज़ के लिए देश के युवाओं को दिगभ्रमित कर रहे हैं, इनकी असलियत आज पूरा देश देखेगा!”
त्रिलोकीनाथ:
(ताली बजाते हुए) “अद्भुत! बेमिसाल! यही तो वह पंच है जो दर्शकों को टीवी स्क्रीन से चिपकाए रखेगा। चाहे तथ्य कुछ भी हों, सनसनी कम नहीं होनी चाहिए। सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनता तक, आज रात केवल तुम्हारा ही डंका बजेगा।”
(अनामिका गर्व से अपनी गर्दन ऊँची करती है, जबकि पार्श्व में टीआरपी मीटर की सूई तेज़ी से ऊपर भागती दिखाई देती है। मंच पर अँधेरा छा जाता है)
दृश्य 2:
(स्थान: एक साधारण कमरा। एक सफ़ेद बोर्ड, एक साधारण कैमरा, कुछ किताबें और एक मेज़। ज्ञानदेव शांत मुद्रा में बैठे कुछ नोट्स तैयार कर रहे हैं। तभी उनका एक छात्र, विवेक, उत्तेजित अवस्था में मोबाइल हाथ में लिए प्रवेश करता है)
विवेक:
(आक्रोशित स्वर में) “गुरुजी! अनर्थ हो गया! देखिए इस बड़े चैनल की मुख्य एंकर ने आपके और पूरे ऑनलाइन शिक्षक समुदाय के ख़िलाफ़ कैसी अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया है। हमें ‘दो कौड़ी का’ कहा गया है! हमारी मेहनत, हमारी साधना का ऐसा क्रूर उपहास?”
ज्ञानदेव:
(धीमी और गंभीर मुस्कान के साथ) “विवेक, वत्स! शांत हो जाओ। उद्वेग बुद्धि का हरण कर लेता है। जो महलों में बैठकर चकाचौंध के आदी हो चुके हैं, उन्हें कुटिया का दिया हमेशा तुच्छ ही दिखाई देता है। वे दीपक की लौ को नहीं, केवल उसकी बाती के कालेपन को देखते हैं।”
विवेक:
लेकिन गुरुजी, यह मौन रहने का समय नहीं है। इनकी स्वेच्छाचारिता इतनी बढ़ गई है कि ये ख़ुद को ही समाज का न्यायाधीश समझने लगे हैं। जो देश के सुदूर गाँवों तक, जहाँ न कोई स्कूल है न कोई साधन, शिक्षा की अलख जगा रहे हैं, उन्हें ये दो कौड़ी का कह रहे हैं?”
ज्ञानदेव:
(उठकर विवेक के कंधे पर हाथ रखते हैं) “सुनो विवेक, सत्य को किसी गगनचुंबी अट्टालिका के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती। हमारी क़ीमत वह छात्र जानता है जिसके पास महँगे कोचिंग संस्थानों की फ़ीस भरने के पैसे नहीं थे, लेकिन आज वह अपने पैरों पर खड़ा है। मीडिया का एक बड़ा वर्ग आज सत्ता की चाटुकारिता में लीन है, वे जनसरोकार भूल चुके हैं। वे जब हमें ‘दो कौड़ी का’ कहते हैं, तो वास्तव में वे अपनी ही नैतिक गिरावट का विज्ञापन कर रहे होते हैं।
(ज्ञानदेव बोर्ड पर चाक से एक वाक्य लिखते हैं: “ज्ञान की क़ीमत सिंहासन तय नहीं करता, समाज का आत्मसम्मान तय करता है।” मंच पर प्रकाश धीमा होता है।)
दृश्य 3:
चाटुकारिता का नैवेद्य (स्थान: त्रिलोकीनाथ का आलीशान केबिन। टेबल पर विदेशी मदिरा की बोतलें और कुछ फ़ाइलें रखी हैं। सत्ता पक्ष के एक बड़े नेता का प्रतिनिधि)
(नेपथ्य से आवाज़) और त्रिलोकीनाथ बात कर रहे हैं। अनामिका भी वहाँ मौजूद है)
त्रिलोकीनाथ:
(फोन पर, विनीत भाव से) “जी हुज़ूर, बिल्कुल। आप निश्चिंत रहें। आज रात के डिबेट में विपक्ष के प्रवक्ता का माइक ठीक उसी समय बंद होगा जब वह बेरोज़गारी पर आँकड़े देना शुरू करेगा। हमने अनामिका को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया है कि कब राष्ट्रवाद का मुद्दा उछालना है और कब मूल मुद्दों से ध्यान भटकाना है।”
अनामिका:
(गर्व से) “और सर, मैंने आज उन ऑनलाइन शिक्षकों पर जो हमला किया है, उससे युवाओं का ध्यान सरकार की नई नीतियों के विरोध से हटकर इस नए विवाद पर टिक गया है। सोशल मीडिया पर अब इसी बात पर युद्ध छिड़ा है।”
त्रिलोकीनाथ:
(फोन रखकर) “शाबाश अनामिका! इस तिमाही का हमारा विज्ञापन बजट सरकार ने दोगुना कर दिया है। इसे कहते हैं पत्रकारिता का असली हुनर। सत्य वह नहीं है जो घटित हो रहा है, सत्य वह है जो हम दिखाना चाहते हैं।”
सत्यप्रकाश:
(अचानक कमरे में प्रवेश करते हुए, हाथ में कुछ काग़ज़ात लिए) “धिक्कार है! त्रिलोकी, और शत-शत धिक्कार है तुम पर अनामिका! जिसे तुम हुनर कह रही हो, वह पत्रकारिता की अर्थी पर किया जाने वाला अश्लील नृत्य है।”
अनामिका:
(तेवर दिखाते हुए) “सत्यप्रकाश जी! आप अपनी पुरानी, सड़ चुकी आदर्शवादी पत्रकारिता की पोटली अपने पास ही रखिए। आज के दौर में जो बिकता है, वही टिकता है। आपकी तथाकथित निष्पक्षता ने आपको एक छोटे से स्वतंत्र ब्लॉग तक सीमित कर दिया, और हम आज देश के सबसे रसूख़दार नाम हैं।”
सत्यप्रकाश:
(हँसते हुए, व्यंग्य के बाण छोड़ते हुए) “रसूख़दार? या चाटुकारिता के कीचड़ में उगे हुए कुकुरमुत्ते? तुमने उन शिक्षकों को दो कौड़ी का कहा, जो राष्ट्र के निर्माण में मूक साधक की तरह लगे हैं। तुम्हारी ख़ुद की क़ीमत क्या है अनामिका? एक सरकारी विज्ञापन की किश्त, या किसी बड़े कॉर्पोरेट घराने की एक मुस्कुराती हुई मंज़ूरी? तुम लोग अब पत्रकार नहीं रहे, तुम तो केवल सत्ता के दरबार के चारण हो, जो राजा की हर ग़लती पर ‘वाह-वाह’ की तान छेड़ते हो।
(त्रिलोकीनाथ क्रोध में खड़ा हो जाता है, सत्यप्रकाश मुस्कुराते हुए वहाँ से निकल जाते हैं। अनामिका का चेहरा ग़ुस्से से तमतमा उठता है)
दृश्य 4:
जनक्रांति और विमर्श (स्थान: विश्वविद्यालय का एक चौराहा। कई छात्र हाथों में तख़्तियाँ लिए खड़े हैं जिन पर लिखा है:
“मैं भी दो कौड़ी का छात्र,”
“शिक्षा का व्यापार बंद करो,”
“गोदी मीडिया होश में आओ।”
विवेक मंच पर खड़ा होकर संबोधित कर रहा है)
विवेक:
(जोशपूर्ण आवाज़ में) “साथियों! आज लड़ाई सिर्फ़ एक बयान की नहीं है। यह लड़ाई उस मानसिकता के ख़िलाफ़ है जो मानती है कि ज्ञान केवल बड़े शहरों के वातानुकूलित कमरों और लाखों की फ़ीस देने वालों की बपौती है। जब मुख्यधारा का मीडिया करप्शन के दलदल में धँसा था, जब वे रिया चक्रवर्ती की कुंडली और सुशांत के घर के पंखे की लंबाई नाप रहे थे, तब इन यू-ट्यूटरों ने हमें इतिहास, भूगोल, विज्ञान और संविधान सिखाया।”
छात्र समूह:
(एक स्वर में) “इंक़िलाब जिंदाबाद! हमारी शिक्षा, हमारा गौरव!”
विवेक:
“जो एंकर ख़ुद टेलीप्रॉम्प्टर के बिना एक वाक्य शुद्ध हिंदी या अंग्रेज़ी का नहीं बोल सकते, वे उन शिक्षकों पर उँगली उठा रहे हैं जो बिना किसी लिखित पर्ची के चार-चार घंटे लगातार ज्ञान की नदियाँ बहाते हैं। यह मीडिया स्वेच्छाचारी हो चुका है। इन्हें टीआरपी की भूख है, और हमें ज्ञान की प्यास है। जीत हमेशा प्यास की होगी, भूख की नहीं!”
सत्यप्रकाश:
(भीड़ से निकलकर आगे आते हैं) “युवाओ! तुम्हारी इस वैचारिक चेतना को मेरा सलाम है। जब देश का मुख्यधारा का मीडिया सत्ता का भोंपू बन जाए, तो वैकल्पिक मीडिया को ही कमान सँभालनी पड़ती है। इन डिजिटल शिक्षकों ने शिक्षा का लोकतंत्रीकरण किया है। इन्होंने महल की चारदीवारी से सरस्वती को निकालकर ग़रीब की झोपड़ी तक पहुँचाया है। यही कारण है कि महलों के पहरेदार घबराए हुए हैं।”
(सभी छात्र तालियाँ बजाते हैं। नारों की गूँज और तेज़ हो जाती है। मंच पर दृश्य बदलता है)
दृश्य 5:
(स्थान: पुनः वही आधुनिक टीवी स्टुडियो। अनामिका लाइव शो में है, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर वह पुराना आत्मविश्वास नहीं है। उसकी स्क्रीन पर लगातार लाइव कमेंट्स आ रहे हैं जो उसके ख़िलाफ़ हैं। फोन लाइनों पर जनता का ग़ुस्सा फूट रहा है)
अनामिका:
(सँभलने का प्रयास करते हुए) “दर्शको, आज हमारे साथ पैनल में जुड़े हैं . . .”
(तभी स्क्रीन पर एक लाइव कॉलर की आवाज़ गूँजती है)। कॉलर की आवाज़
विवेक:
“अनामिका जी, मैं आपसे सीधा सवाल करना चाहता हूँ। आपने जिन शिक्षकों को दो कौड़ी का कहा, क्या आप जानती हैं कि पिछले वर्ष इसी राज्य से सिविल सेवा में चयनित होने वाले 50 प्रतिशत से अधिक छात्र उन्हीं ‘दो कौड़ी’ के चैनलों से पढ़कर निकले हैं? आपकी क़ीमत क्या है, जो हर शाम समाज में नफ़रत का ज़हर बोने के बदले करोड़ों का पैकेज लेती हैं?”
अनामिका:
(बौखलाते हुए) “देखिए, आप मुद्दे से भटक रहे हैं। हम विनियमन की बात कर रहे हैं . . . पीसीआर, इस कॉलर का फोन काटो!”
त्रिलोकीनाथ:
(केबिन से दौड़ते हुए स्टुडियो में आते हैं, बदहवास) “अनामिका! शो रोको! तुरंत विज्ञापन पर जाओ! हमारे चैनल का बहिष्कार ट्रेंड कर रहा है। बड़े स्पॉन्सर्स ने अपने विज्ञापन वापस लेने की धमकी दी है। वे कह रहे हैं कि वे युवाओं के ग़ुस्से का शिकार नहीं होना चाहते।”
अनामिका:
(सकते में आते हुए) “क्या? लेकिन त्रिलोकी जी, हमने तो वही किया जो हमेशा करते आए हैं। सनसनीखेज़ पंच!”
सत्यप्रकाश:
(स्टुडियो के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर, हाथ बाँधे हुए) “पंच जब सही जगह पड़ता है अनामिका, तो सत्ता के सिंहासन हिल जाते हैं। तुमने क़लम की ताक़त को भूलकर उसे सत्ता की चौखट पर गिरवी रख दिया था। आज देश के युवाओं ने तुम्हें तुम्हारी असली क़ीमत बता दी है।”
ज्ञानदेव:
(एक वीडियो संदेश के माध्यम से स्टुडियो की बड़ी स्क्रीन पर अवतरित होते हैं, शांत और गंभीर स्वर) “अनामिका जी, और त्रिलोकीनाथ जी। कौड़ी की चिंता वे करते हैं जिनका अस्तित्व और मूल्य बाज़ार तय करता है। शिक्षक कबीर की उस साखी की तरह होता है जो ‘बाज़ार में खड़ा होकर सबकी ख़ैर’ माँगता है। हमारी साधना को आपके टीआरपी के तराज़ू में तौलने की भूल मत कीजिए। हम कल भी राष्ट्र का निर्माण कर रहे थे, हम आज भी कर रहे हैं। आपके तीखे बाणों का उत्तर हम नफ़रत से नहीं, बल्कि एक और ग़रीब बच्चे को अधिकारी बनाकर देंगे।”
(स्क्रीन पर ज्ञानदेव का मुस्कुराता हुआ चेहरा स्थिर हो जाता है। अनामिका का माइक उसके हाथ से छूटकर गिर जाता है। त्रिलोकीनाथ अपना सिर पकड़कर बैठ जाता है। चारों ओर छात्रों के नारों और ज्ञानदेव के व्याख्यान की गूँज सुनाई देती है)
॥पटाक्षेप॥
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- अब का सावन
- अब नया संवाद लिखना
- अब वसंत भी जाने क्यों
- अबके बरस मैं कैसे आऊँ
- आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
- आज से विस्मृत किया सब
- इस बार की होली में
- उठो उठो तुम हे रणचंडी
- उर में जो है
- काँच हुए सब रिश्ते-नाते
- कि बस तुम मेरी हो
- किसे जगाएँ
- कृष्ण मुझे अपना लो
- कृष्ण सुमंगल गान हैं
- कैसे हम ख़ुद को समझाएँ
- कौन करे मन की अगवाई
- गमलों में है हरियाली
- गर इंसान नहीं माना तो
- गुरु पूर्णिमा पर गीत
- गुलशन उजड़ गया
- गोपी गीत
- घर घर फहरे आज तिरंगा
- घाव का उपहार
- चला गया दिसंबर
- चलो होली मनाएँ
- चढ़ा प्रेम का रंग सभी पर
- ज्योति शिखा सी
- झरता सावन
- टेसू की फाग
- तुम तुम रहे
- तुम मुक्ति का श्वास हो
- दिन भर बोई धूप को
- धरती बोल रही है
- नया कलेंडर
- नया वर्ष
- नव अनुबंध
- नववर्ष
- नारी
- फागुन ने कहा
- फूला हरसिंगार
- बहिन काश मेरी भी होती
- बारूदी बयार
- बाज़ार के शोर में
- बेटी घर की बगिया
- बोन्साई वट हुए अब
- भरे हैं श्मशान
- मतदाता जागरूकता पर गीत
- मन का नाप
- मन को छलते
- मन गीत
- मन फागुन
- मन बातें
- मन वसंत
- मन संकल्पों से भर लें
- महावीर पथ
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 001
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 002
- मौन का शंखनाद
- मौन गीत फागुन के
- मज़दूर दिवस पर गीत
- यूक्रेन युद्ध
- वयं राष्ट्र
- वसंत पर गीत
- वासंती दिन आए
- विधि क्यों तुम इतनी हो क्रूर
- शस्य श्यामला भारत भूमि
- शस्य श्यामली भारत माता
- शिव
- श्रावण
- सत्य का संदर्भ
- सुख-दुख सब आने जाने हैं
- सुख–दुख
- सूना पल
- सूरज की दुश्वारियाँ
- सूरज को आना होगा
- स्वप्न फिर छिटक गया
- स्वागत है नववर्ष तुम्हारा
- हर हर गंगे
- हिल गया है मन
- ख़ुद से मुलाक़ात
- ख़ुशियों की दीवाली हो
कहानी
- अधूरी देहरी का मौन
- अर्जुन से आर्यन तक: आभासी दुनिया का सच
- अर्द्धांगिनी
- जड़ों से जुड़ना
- जल कुकड़ी
- जाको राखे सांइयाँ
- जीवन संग्राम
- त्रिकाल: जन्मों के पार एक अनुराग
- त्रिवेणी संगम
- दरकता मन
- धूप के उस पार की सुबह
- पद्मावती
- पुरानी नींव, नए मकान
- पूर्ण अनुनाद
- प्रेम सम्मान
- बुआ की राखी
- ब्रह्मराक्षस का अभिशाप
- मंदबुद्धि
- मन के एकांत में
- मैं हूँ ना
- मैडम एम
- मौन की परछाइयाँ
- यादों की लालटेन
- ये तेरा घर ये मेरा घर
- राखी का फ़र्ज़
- रिश्तों की गर्माहट
- रिश्तों के रेशमी धागे
- रेशमी धागे: सेवा का नया पथ
- हरसिंगार
- ज़िन्दगी सरल है पर आसान नहीं
कविता-मुक्तक
- अक्षय तृतीया
- कबीर पर कुंडलियाँ
- कुण्डलिया - अटल बिहारी बाजपेयी को सादर शब्दांजलि
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - अपना जीवन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - आशा, संकल्प
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - इतराना, देशप्रेम
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - काशी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गंगा
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गणपति वंदना - 001
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गणपति वंदना - 002
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गीता
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गुरु
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गुरु
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - जय गणेश
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - जय गोवर्धन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - जलेबी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - झंडा वंदन, नमन शहीदी आन, जय भारत
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - नया संसद भवन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - नर्स दिवस पर
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - नवसंवत्सर
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पर्यावरण
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पहली फुहार
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पूरे कर कर्त्तव्य
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पेंशन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पेट्रोल एवं गैस की कमी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - बचपन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - बम बम भोले
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - बुझ गया रंग
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - भटकाव
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मकर संक्रांति
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मकर संक्रांति - 002
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मतदान
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - माँ
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मानस
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - यू जी सी नियम
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - योग दिवस
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - विद्या, शिक्षक
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - शुभ धनतेरस
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - श्रम एवं कर्मठ जीवन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - संवेदन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - सच्चा ज्ञानी है वही
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - सावन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - स्तनपान
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - हिन्दी दिवस विशेष
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - होली
- कुण्डलिया - सीखना
- कुण्डलिया – कोशिश
- कुण्डलिया – डॉ. सुशील कुमार शर्मा – यूक्रेन युद्ध
- कुण्डलिया – परशुराम
- कुण्डलिया – संयम
- कुण्डलियाँ स्वतंत्रता दिवस पर
- गणतंत्र दिवस
- दुर्मिल सवैया – डॉ. सुशील कुमार शर्मा – 001
- प्रदूषण और पर्यावरण चेतना
- शिव वंदना
- सायली छंद - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - चाँद
- सोशल मीडिया और युवावर्ग
- स्वर कोकिला आशा भोंसले को श्रद्धांजलि
- हनुमत स्तवन
- हिंदू नव वर्ष पर कुंडलियाँ छंद
- होली पर कुण्डलिया
लघुकथा
- अंतर
- अंतिम ऑनलाइन
- अंतिम बीज
- अनैतिक प्रेम
- अपनी जरें
- आँखों का तारा
- आँसू ताक़त हैं कमज़ोरी नहीं
- आओ तुम्हें चाँद से मिलाएँ
- आख़िरी रोटी
- उजाले की तलाश
- उसका प्यार
- एक बूँद प्यास
- ऑनलाइन उपस्थिति
- काहे को भेजी परदेश बाबुल
- काग़ज़ का जंगल
- कोई हमारी भी सुनेगा
- गाय की रोटी
- गाय ‘पालन की परिभाषा’!
- जल देवता का क्रोध
- डर और आत्म विश्वास
- तस्वीर
- तहस-नहस
- तुलना का बोझ
- दूसरी माँ
- नारी ‘तुम मत रुको’!
- पति का बटुआ
- पत्नी
- परफ़ेक्ट पोज़
- पाँच लघु कथाएँ
- पीड़ा बनी कर्तव्य
- पुरानी मेज़
- पौधरोपण
- प्लास्टिक का जंगल
- फेंकी हुई रोटियाँ
- बेटी की गुल्लक
- मर्यादा का प्रेम
- माँ का ब्लैकबोर्ड
- माँ ‘छाया की तरह’!
- मातृभाषा
- माया
- मुझे छोड़ कर मत जाओ
- मुझे ‘बहने दो’!
- मौन पहाड़ का बदला
- म्यूज़िक कंसर्ट
- रिश्ते (डॉ. सुशील कुमार शर्मा)
- रेत का आदमी
- रौब
- वो पाँच मिनट
- शर्बत
- शिक्षक सम्मान
- शिक्षा की पाँच दीपशिखाएँ
- शुद्धि की प्रतीक्षा
- शेष शुभ
- सपनों की उड़ान
- सम्मान
- स्मृति के रंग
- स्मृतियों के अवशेष
- स्वार्थ की लक्ष्मण रेखा
- हर चीज़ फ़्री
- हिंदी–माँ की आवाज़
- हिन्दी इज़ द मोस्ट वैलुएबल लैंग्वेज
- ग़ुलाम
- ज़िन्दगी और बंदगी
- फ़र्ज़
सांस्कृतिक आलेख
- ओशो: रजनीश से बुद्धत्व तक, एक विद्रोही सद्गुरु की शाश्वत प्रासंगिकता
- कृष्ण: अनंत अपरिभाषा
- गणेश चतुर्थी: आस्था, संस्कृति और सामाजिक चेतना का महासंगम
- गीताजयंती कर्म, धर्म और जीवन दर्शन का महामहोत्सव
- चातुर्मास: आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति से सामंजस्य का पर्व
- जगन्नाथ रथयात्रा: जन-जन का पर्व, आस्था और समानता का प्रतीक
- नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान
- नव संवत्सर: कालचक्र का नवोदय और चेतना का पुनर्जागरण
- नृसिंह का प्राकट्य अन्याय के विरुद्ध उद्घोष
- प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान
- ब्राह्मण: उत्पत्ति, व्याख्या, गुण, शाखाएँ और समकालीन प्रासंगिकता
- भगवान परशुराम: एक बहुआयामी व्यक्तित्व एवं समकालीन प्रासंगिकता
- भगवान परशुराम: धर्म संतुलन की ज्वाला और युग चेतना का शाश्वत स्वर
- मकर संक्रांति: एक विराट सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विमर्श
- मनुस्मृति: आलोचना से समझ तक
- राम-राष्ट्र की जीवनधारा और शाश्वत चेतना का प्रवाह
- वट सावित्री व्रत: आस्था, आधुनिकता और लैंगिक समानता की कसौटी
- वर्तमान समय में हनुमान जी की प्रासंगिकता
- शिव और शक्ति का महामिलन: महाशिवरात्रि का विराट दर्शन
- हरितालिका तीज: आस्था, शृंगार और भारतीय संस्कृति का पर्व
ललित निबन्ध
सामाजिक आलेख
- अध्यात्म और विज्ञान के अंतरंग सम्बन्ध
- अबला निर्मला सबला
- आप अभिमानी हैं या स्वाभिमानी ख़ुद को परखिये
- आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और गूगल के वर्तमान संदर्भ में गुरु की प्रासंगिकता
- करवा चौथ बनाम सुखी गृहस्थी
- करवा चौथ व्रत: श्रद्धा की पराकाष्ठा या बाज़ार का विस्तार?
- कृत्रिम मेधा (AI): वरदान या अभिशाप?
- गाँधी के सपनों से कितना दूर कितना पास भारत
- गाय की दुर्दशा: एक सामूहिक अपराध की चुप्पी
- गौरैया तुम लौट आओ
- जीवन संघर्षों में खिलता अंतर्मन
- नकारात्मक विचारों को अस्वीकृत करें
- नब्बे प्रतिशत बनाम पचास प्रतिशत
- नया वर्ष कैलेंडर का पन्ना नहीं, आत्ममंथन का अवसर
- नव वर्ष की चुनौतियाँ एवम् साहित्य के दायित्व
- पर्यावरणीय चिंतन
- बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर: समता, न्याय और नवजागरण के प्रतीक
- भारतीय जीवन मूल्य
- भारतीय संस्कृति में मूल्यों का ह्रास क्यों
- माँ नर्मदा की करुण पुकार
- मानव मन का सर्वश्रेष्ठ उल्लास है होली
- मानवीय संवेदनाएँ वर्तमान सन्दर्भ में
- वाह रे पर्यावरण दिवस!
- विद्यालयीन परिवेश में शिक्षक-प्रकृतियाँ
- विश्व पर्यावरण दिवस – वर्तमान स्थितियाँ और हम
- वृद्धजन—अतीत के प्रकाश स्तंभ और भविष्य के सेतु
- वेदों में नारी की भूमिका
- वेलेंटाइन-डे और भारतीय संदर्भ
- व्यक्तित्व व आत्मविश्वास
- शिक्षक पेशा नहीं मिशन है
- शिक्षण का वर्तमान परिदृश्य: चुनौतियाँ, अपेक्षाएँ और भावी दिशा
- संकट की घड़ी में हमारे कर्तव्य
- सम्बन्ध और स्वार्थ का द्वंद्व
- सम्बन्धों का क्षरण: एक सामाजिक विमर्श
- सामाजिक जीवन के मूल्यांकन का विरोधाभास
- स्वतंत्रता दिवस: गौरव, बलिदान, हमारी ज़िम्मेदारी और स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत
- स्वामी विवेकानंद: आधुनिक भारत के आध्यात्मिक महाप्राण
- हिंदी और रोज़गार: भाषा से अवसरों की नई दुनिया
- हैलो मैं कोरोना बोल रहा हूँ
चिन्तन
साहित्यिक आलेख
- आज की हिन्दी कहानियों में सामाजिक चित्रण
- गीत सृष्टि शाश्वत है
- डिजिटल युग में कविता की प्रासंगिकता और पाठक की भूमिका
- पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री विमर्श
- प्रवासी हिंदी साहित्य लेखन
- प्रेमचंद का साहित्य – जीवन का अध्यात्म
- बुन्देल खंड में विवाह के गारी गीत
- भारत में लोक साहित्य का उद्भव और विकास
- भाषा का उद्भव और विकास: मानवीय चेतना की अभिव्यक्ति
- मध्यकालीन एवं आधुनिक काव्य
- मुक्त छंद रचनाओं में आज की हिंदी
- रामायण में स्त्री पात्र
- वर्तमान में साहित्यकारों के समक्ष चुनौतियाँ
- वर्तमान में हिंदी साहित्य में गीत और नवगीत की स्थित
- समाज और मीडिया में साहित्य का स्थान
- समावेशी भाषा के रूप में हिन्दी
- साहित्य में प्रेम के विविध स्वरूप
- साहित्य में विज्ञान लेखन
- सोशल मीडिया के साहित्यिक पटल: एक समालोचना
- हिंदी और आधुनिक तकनीक: डिजिटल युग में भाषा की चुनौतियाँ और संभावनाएँ
- हिंदी भाषा की उत्पत्ति एवं विकास एवं अन्य भाषाओं का प्रभाव
- हिंदी भाषा की उत्पत्ति एवं विकास एवं अन्य भाषाओं का प्रभाव
- हिंदी साहित्य में प्रेम की अभिव्यंजना
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