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पीड़ा बनी कर्तव्य

 

शहर में बाढ़ आई थी। सब अपना सामान बचा रहे थे, पर एक स्त्री नाव में बैठी दूसरों के बच्चों को पार पहुँचा रही थी। 

किसी ने पूछा, “तुम्हारा घर डूब रहा है, और तुम रो भी नहीं रही?” 

स्त्री मुस्कुराई, “जिस दिन पति गया था, उस दिन बहुत रोई थी। फिर समझ आया आँसू बहाने से नाव नहीं चलती।” 

उसने भीगे आँचल से बच्चे का चेहरा पोंछा और बोली, “रोना बुरा नहीं, पर इतना रोना बुरा है कि हाथ काँपने लगें।” 

उस दिन कई लोगों ने पहली बार जाना कुछ आँखें सूखी इसलिए नहीं होतीं कि उनमें दर्द नहीं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने दर्द को कर्म बना लिया होता है। 

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