अरब आक्रमण
काव्य साहित्य | कविता विनय कुमार ’विनायक’15 Nov 2025 (अंक: 288, द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)
अरब है इस्लाम की जन्मभूमि,
अरब है इस्लाम की कर्मभूमि
कुरैशी क़बीलाई हजरत मुहम्मद के
जन्म पाँच सौ सत्तर ईसवी के पूर्व
अरब था मूर्ति पूजकों की धर्मभूमि
तबके अरब वर्तमान पेट्रोलियम उत्पादक
अरबी शेखों सा नहीं थे उन्नत और धनी
वे थे भारतीयों जैसा ही बहुदेववादी सनातनी!
अरब के काबा मक्का में थीं तीन सौ साठ देव मूर्तियाँ
जिसमें अल-लात, मनात, अल-उज्जा थी तीन प्रमुख देवियाँ
जैसे भारत में सरस्वती, रमा, उमा, त्रिदेवों की होती शक्तियाँ
अरब की तीन देवियाँ आज भी कहलाती अल्लाह की बेटियाँ
इन मूर्तियों के पुजारी थे पैग़म्बर मुहम्मद के क़ुरैशी पूर्वज
भारतवर्ष से अरबों का प्राचीन काल में सम्बन्ध था बहुत घना,
भारतीय और अरबी लोग थे एक सा अश्वेत नस्ल का बना!
किन्तु हजरत मुहम्मद ने ईसवी सन् छह सौ बाईस में
अरब के मक्का से ऐसा मंत्र फूँका जिससे रक्त झूठा वंश छूटा
पूर्व नस्ल व वल्दियत से भी इस्लामी अनुयाइयों का सम्बन्ध टूटा
इस्लामी का एकमात्र सच, सहचर, साथी जिन्हें प्रिय एकमात्र मक्का!
इस्लामी मज़हब स्थापना के पूर्व अरबी भारतवर्ष व्यापार करने आते थे
बंधुवत आते खाते पीते व्यापारिक आदान प्रदान कर अरब लौट जाते थे
किन्तु उन्होंने जबसे की इस्लाम परस्ती, बदल गई उनकी हमारी नियति
उनकी नज़र में हिन्दू, बौद्ध, पारसी, यहूदी हुए काफ़िर, वे तोड़ने लगे मंदिर
इस्लाम प्रचार बना उनका लक्ष्य, ग़ैरइस्लामी प्रजा उनकी तलवार का भक्ष्य
हो खड्गहस्त विधर्मी को करते त्रस्त, जब तक हो ना जाते इस्लाम परस्त
तब तक क्या मजाल अल्लाह भी किसी काफ़िर मुशरिक की जान दे बख़्श!
धर्म मज़हब भी क्या हो सकता है ऐसा?
जिसमें क्षमा दया तप त्याग नहीं, करुणा नहीं सिर्फ़ हिंसा ही हिंसा
जो कहे—काफ़िर मुशरिक की हत्या कर, कुफ़्र तोड़, सबाब होगा
वह मानवीय धर्म नहीं बल्कि बंधुता के नाम पर बरगलाने वाला
एकमात्र सियासी साज़िश नहीं तो और क्या हो सकता?
इस सियासी साज़िश के तहत हजरत मुहम्मद के कुछ राजनीतिक भक्त
जो शान्त मूर्ति पूजक अरबी क़बीले की नज़र में थे एकमात्र मवाली तत्त्व
जो परित्यक्त मक्का से कर हिजरत, मदीना में एकत्र बहाए मानव रक्त!
रक्त देख मानव सिहर जाता स्वभाववश स्वरक्त रक्षणार्थ
मानव स्वतः रक्तद्वेषी से डर जाता रक्तद्वेषी की हिंसा
महत्वाकांक्षा और स्वअस्तित्व रक्षा के तालमेल को समझ
मानव प्रथमतः रक्तद्वेषी हिंसक का हो जाता है अंधभक्त!
ऐसे ही अंधभक्तों की टोली बोलकर जिहादी बोली
पूरे अरब ईराक़ देश को बनाया दारुल इस्लाम
फिर पहुँची भारतीय आर्य सहोदर पारसियों की मातृभूमि ईरान,
अवेस्ता-ए-जिन्द (वेद के छंद) के पाठक पारसी हो गए परेशान
शान्ति के अभिलाषियों ने समझा रक्त द्वेषियों की भाषा
अब अहुरमज्दा ‘अवेस्ता-ए-जिन्द’ नहीं क़ुरान व हदीस देगी दिलासा!
फिर सीरिया, फिलीस्तीन और मिश्र वालों ने छोड़ ईसा की क्षमा
और बुद्ध की अहिंसा नीति/पढ़ाई शुरू कर दी संगीन की भाषा
फिर चले अरब के जिहादी वीर आर्यावर्त हिन्दुस्तान के सिन्धु तीर
ख़लीफ़ा उमर के काल (634 ई-643 ई) भारत के कोंकण तट पर!
अरबों ने जब किया प्रथम समुद्री हमला
वीर चालुक्य राजाओं की वजह से भारत देश हमारा सँभला
पुनः द्वितीय समुद्री आक्रमण में भी अरबों को मिली असफलता!
तब अरब होकर पूरे मन से अधीर
स्थल आक्रमण को चले पश्चिमी सिन्धु तीर
विशाल भारत के पश्चिमी राज्य कपिसा (काबुल),
साओली/साओकूट या जाबुल और सिन्ध को वे करने चले अधीन
काबुल और जाबुल पर था शाहिया वंश का हिन्दू शासन
ख़लीफ़ा अली और मुअविया ने चाहा इन दोनों का इस्लामीकरण!
वह था हाकिम अब्दुर्रहमान जिसका सफल रहा
पहला काबुल-जाबुल का विजय अभियान
उसके बाद अरबों की लगातार होने लगी हार पर हार
छह सौ नब्बे (690) ईसवी के बाद
मात्र अब्बासी ख़लीफ़ा ने कर वसूला कभी-कभार
काबुल-जाबुल के बाद सिन्ध था महान हर्षवर्धन के अधीन
उनकी प्रांतीय राजधानी थी एलोर
जहाँ शूद्र वंशी शाशक का चलता था ज़ोर!
सातवीं शती के आसपास सिन्ध की गद्दी पर था शूद्रवंशी
सहसीराय का पुत्र सहिरास जिसे फ़ारसी सूबेदार नीमरोज ने मारा
फिर उनके आत्मज राय सहसी द्वितीय ने सिन्ध के तख़्त को सँवारा!
सहसी का मंत्री बना चाच नाम्नी एक ब्राह्मण
जिसने कूटनीति से छीने सहसी की पत्नी, सत्ता और धन
उसने भोगकर राजा की पत्नी को दो पुत्र एक पुत्री दिया जन्म!
पहला पुत्र दाहरसिय दूसरा था दाहिर
दूसरा ही हुआ सिन्ध का शासक माहिर
जिसने झेला फिर से एकबार अरबी आक्रमण!
यूँ तो ख़लीफ़ा उस्मान से बलीद के बीच
अरब के कई इस्लामी जन ने बनाया था भारत को लूटने का मन
किन्तु दाहिर के शासन में हुआ प्रथम शक्ति व परिस्थिति में संतुलन
जब सिन्ध में लगी थी भीषण जातिवादी आग
जिसमें हाथ सेक रहे थे बौद्ध श्रमण और सिन्ध के ब्राह्मण!
कठोर ब्राह्मणी शासन से कमज़ोर बौद्ध प्रजाजन को चाहिए था त्राण
इस हेतु बौद्ध श्रमणों ने ईराक़ी गवर्नर अल हज्जाज से माँगा अभयदान
भारत की यह जातिप्रथा कैसी थी? कैसी है? कैसा होता इसका अपमान?
जिससे मजबूर लोगों ने देश को धोखा दे विदेशी से ख़रीदा आत्मसम्मान!
भारत की इसी कुत्सित प्रथा से सदा आक्रान्ता को मिला सहारा
भारत अरि की शक्ति से नहीं बल्कि अपनी कमज़ोरी से सर्वदा हारा
भारत की इस दुखती रग को ईराक़ी गवर्नर अल हज्जाज ने पहचाना
सिन्ध पर स्थल आक्रमण का संकल्प उसने मन ही मन में ठाना!
इस निर्णय के बाद उसे आई एक बहाने की याद
एक अरबी जहाज़ को सिन्धी बंदरगाह देवल में
समुद्री डाकुओं ने लूटकर उसे कर दिया था बरबाद!
अल हज्जाज ने दाहिर से माँगा उक्त क्षति का हर्जाना
किन्तु वीर दाहिर ने उनकी माँग को कदापि नहीं मानी
क्रुद्ध ईराक़ी अल हज्जाज ने किया दो स्थल आक्रमण
किन्तु दोनों में जीता दाहिर; भारत का वर्णसंकर ब्राह्मण
फिर भी ईराक़ी गवर्नर अल हज्जाज ने हिम्मत नहीं हारी!
जब आया अविस्मरणीय ईसवी सन सात सौ ग्यारह/बारह
(711 ईसवी और 712 ईसवी)
अल हज्जाज ने भेजा अपना भतीजा सह जमाता
मुहम्मद-बिन-क़ासिम के संग एक सैन्य बल दुर्बह
ज्यों पहुँची दुश्मन की सेना सिन्धराज दाहिर के द्वार
देश के गद्दार बौद्ध बने क़ासिम के युद्ध सलाहकार
विश्वासघातियों के कारण हुई अजातशत्रु दाहिर की हार!
भारत में इस्लाम मज़हब को
ब्राह्मणवाद की प्रतिक्रिया ने दिया प्रथम प्रवेश द्वार
अब ना रहा ब्राह्मणाबाद में बौद्ध शक्ति और मुलतान में ब्राह्मणवाद
दोनों के गर्भ से निकल विकल मुसलमानों की एक नवीन जाति
होने लगी काबुल-जाबुल-सिन्ध में आबाद!
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