लोक-मानस की अक्षय निधि हैं हमारी लोकोक्तियाँ
आलेख | साहित्यिक आलेख अमरेश सिंह भदौरिया1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जब भी मैं भाषा के स्वरूप और उसकी जीवंतता पर विचार करता हूँ, तो बार-बार यह अनुभव करता हूँ कि किसी समाज की वास्तविक पहचान उसकी शब्दावली से अधिक उसकी लोकोक्तियों में सुरक्षित रहती है। भाषा यदि देह है, तो लोकोक्तियाँ उसकी चेतना हैं। ये शब्दों की सजावट भर नहीं, बल्कि पीढ़ियों के जीवनानुभव से उपजा वह सत्य हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने अपने श्रम, संघर्ष, विवेक और संवेदना के साथ अर्जित किया। समय के साथ जब संवाद की गति तेज़ हुई है और अभिव्यक्ति संक्षिप्त होती चली गई है, तब मुझे लगता है कि लोकोक्तियाँ हमें ठहरकर सोचने की संस्कृति से जोड़ती हैं।
लोकोक्तियों का जन्म मैंने कभी किसी पुस्तक के पन्नों में नहीं, बल्कि जीवन की खुली पाठशाला में होते देखा है। खेतों में काम करते किसान, चौपालों में बैठे बुज़ुर्ग, घर-गृहस्थी सँभालती स्त्रियाँ—इन सबके अनुभवों से ही लोकोक्तियाँ आकार लेती हैं। जब कोई कहता है—“उत्तम खेती मध्यम बान, निषिद्ध चाकरी भीख निदान”—तो यह केवल आजीविका का वर्गीकरण नहीं होता, बल्कि आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का एक मौन घोष होता है। ऐसी लोकोक्तियाँ हमें बताती हैं कि जीवन के गूढ़ सिद्धांत किसी ग्रंथ से पहले लोक में जन्म लेते हैं।
मुझे अक्सर लगता है कि लोकोक्तियाँ अनुभव की उस टकसाल से निकली हुई हैं, जहाँ जीवन स्वयं सिक्के ढालता है। इनमें वह सामर्थ्य है कि ये विस्तृत विचारों को एक पंक्ति में समेट देती हैं। “दूर के ढोल सुहावने” सुनते ही मनुष्य की वह प्रवृत्ति सामने आ जाती है, जिसमें वह दूर की चमक में अपना वर्तमान भूल जाता है। इसी तरह “नाच न जाने आँगन टेढ़ा” आत्ममंथन के अभाव पर सीधा प्रहार करती है। ऐसी सूक्तियाँ न केवल जीवन को समझाती हैं, बल्कि हमें अपने व्यवहार पर भी पुनर्विचार के लिए बाध्य करती हैं।
लोक-मानस ने समाज की विसंगतियों को उजागर करने के लिए भी लोकोक्तियों को अपना माध्यम बनाया है। सत्ता का दोगलापन हो या व्यवस्था की अराजकता—इन सब पर लोक ने खुलकर टिप्पणी की है। “हाथी के दाँत दिखाने के और, खाने के और” सुनते ही आज की राजनीति और सामाजिक दिखावे की तस्वीर उभर आती है।” अंधेर नगरी चौपट राजा” आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है, जितनी अपने समय में रही होगी। इन कहावतों में जो व्यंग्य और कटाक्ष है, वह किसी लंबे भाषण से अधिक असरदार प्रतीत होता है।
लोकोक्तियाँ मुझे हमारी सांस्कृतिक स्मृति की तरह लगती हैं। इनमें लोक-कलाओं, त्योहारों, खान-पान और ग्रामीण जीवन की सहज गंध बसी हुई है। जब हम कहते हैं—“अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है”—तो यह केवल आत्मश्लाघा नहीं, बल्कि अपने परिवेश के प्रति स्वाभाविक आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति है। यही लोकोक्तियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मूल्यों और संस्कारों को मौखिक परंपरा के माध्यम से पहुँचाती हैं। यह इतिहास काग़ज़ों पर नहीं, बल्कि लोगों की स्मृति में सुरक्षित रहता है।
आज के डिजिटल युग में, जब संवाद इमोजी और संक्षिप्त संदेशों तक सिमटता जा रहा है, मुझे यह चिंता बार-बार सताती है कि कहीं हम अपनी इस भाषाई धरोहर से कट न जाएँ। लोकोक्तियों का कम होता प्रयोग केवल भाषा की हानि नहीं है, बल्कि सामूहिक अनुभव के क्षरण का संकेत भी है। जब एक लोकोक्ति विस्मृत होती है, तो उसके साथ जीवन को देखने का एक दृष्टिकोण भी खो जाता है।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम लोकोक्तियों को केवल बुज़ुर्गों की बातचीत या लोक-कथाओं तक सीमित न रखें। इन्हें शिक्षा, साहित्य और आधुनिक संवाद का जीवंत हिस्सा बनाएँ। मेरे लिए लोकोक्तियाँ लोक-जीवन का वह दर्पण हैं, जिसमें हमारा अतीत बोलता है और वर्तमान को दिशा देता है। यदि हमें अपनी भाषा की आत्मा और समाज की संवेदनशीलता को सुरक्षित रखना है, तो इन लोक-रत्नों को सहेजना और आगे बढ़ाना हमारी सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी है।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
"लघुकथा वृत्त" का जनवरी 2019 अंक
साहित्यिक आलेख | डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानीलघुकथा के इकलौता मासिक समाचार पत्र "लघुकथा…
'सौत' से 'कफ़न' तक की कथा यात्रा - प्रेमचंद
साहित्यिक आलेख | डॉ. उमेश चन्द्र शुक्लमुंशी प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई 1980 को…
21वीं शती में हिंदी उपन्यास और नारी विमर्श : श्रीमती कृष्णा अग्निहोत्री के विशेष संदर्भ में
साहित्यिक आलेख | डॉ. पद्मावतीउपन्यास आधुनिक हिंदी साहित्य का जीवंत रूप…
प्रेमचंद साहित्य में मध्यवर्गीयता की पहचान
साहित्यिक आलेख | शैलेन्द्र चौहानप्रेमचंद ने सन 1936 में अपने लेख "महाजनी…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कविता
- अधनंगे चरवाहे
- अधूरा सच
- अनंत पथ
- अनाविर्भूत
- अफ़वाह
- अभिशप्त अहिल्या
- अमरबेल
- अमलतास
- अवसरवादी
- अहिल्या का प्रतिवाद
- अख़बार वाला
- आँखें मेरी आज सजल हैं
- आँगन
- आँगन की तुलसी
- आज की यशोधरा
- आज वाल्मीकि की याद आई
- आरक्षण की बैसाखी
- आस्तीन के साँप
- आख़िर क्यों
- इक्कीसवीं सदी
- उपग्रह
- उपग्रह
- ऋतुराज की अनुगामिनी: फरवरी
- एकाकी परिवार
- ओस की बूँदें
- कचनार
- कछुआ धर्म
- कमरबंद
- कुरुक्षेत्र
- कैक्टस
- कोहरा
- क्यों
- क्षरित होते जीवन मूल्य
- खलिहान
- गाँव - पहले वाली बात
- गिरगिट
- चाँदनी रात
- चित्र बोलते हैं
- चुप रहो
- चुभते हुए प्रश्न
- चूड़ियाँ
- चेतना का उत्तरायण
- चैत दुपहरी
- चौथापन
- चौराहा
- जब नियति परीक्षा लेती है
- ज्वालामुखी
- ढलती शाम
- तितलियाँ
- तुम्हारा प्रेम
- दंड दो मुझे
- दहलीज़
- दिया (अमरेश सिंह भदौरिया)
- दीपक
- दृष्टिकोण जीवन का अंतिम पाठ
- देह का भूगोल
- देहरी
- दो जून की रोटी
- धरती की पीठ पर
- धुँधलका
- धोबी घाट
- नदी सदा बहती रही
- नयी पीढ़ी
- नागफनी
- नेपथ्य में
- पगडंडी पर कबीर
- पतंग
- परिधि और त्रिभुज
- परिभाषाओं से परे
- पहली क्रांति
- पहाड़ बुलाते हैं
- पाखंड
- पारदर्शी सच
- पीड़ा को नित सन्दर्भ नए मिलते हैं
- पुत्र प्रेम
- पुष्प वाटिका
- पुस्तकें
- पूर्वजों की थाती
- प्रभाती
- प्रारब्ध को चुनौती
- प्रेम की चुप्पी
- फुहार
- बंजर ज़मीन
- बंजारा
- बबूल
- बवंडर
- बिखरे मोती
- बुनियाद
- भगीरथ संकल्प
- भाग्य रेखा
- भावनाओं का बंजरपन
- भुइयाँ भवानी
- मन मरुस्थल
- मनीप्लांट
- महावर
- माँ
- मुक्तिपथ
- मुखौटे
- मैं भला नहीं
- योग्यता का वनवास
- रहट
- रातरानी
- लेबर चौराहा
- शक्ति का जागरण
- शस्य-श्यामला भारत-भूमि
- शान्तिदूत
- शीतल छाँव
- सँकरी गली
- संयम और साहस का पर्व
- सकठू की दीवाली
- सती अनसूया
- सरस्वती वंदना
- सरिता
- सस्ती लोकप्रियता
- सावन में सूनी साँझ
- सैटेलाइट का मोतियाबिंद
- हरसिंगार
- हल चलाता बुद्ध
- ज़ख़्म जब राग बनते हैं
सामाजिक आलेख
सांस्कृतिक आलेख
- कृतज्ञता का पर्व पितृपक्ष
- कृष्ण का लोकरंजक रूप
- चैत्र नवरात्रि: आत्मशक्ति की साधना और अस्तित्व का नवजागरण
- जगन्नाथ रथ यात्रा: आस्था, एकता और अध्यात्म का महापर्व
- न्याय और अन्याय के बीच
- परंपरा के पार—जहाँ गुण जाति से ऊपर उठे
- बलराम जयंती परंपरा के हल और आस्था के बीज
- बुद्ध पूर्णिमा: शून्य और करुणा का संगम
- योगेश्वर श्रीकृष्ण अवतरणाष्टमी
- रामनवमी: मर्यादा, धर्म और आत्मबोध का पर्व
- लोक आस्था का पर्व: वट सावित्री पूजन
- विजयदशमी—राम और रावण का द्वंद्व, भारतीय संस्कृति का संवाद
- विश्व योग दिवस: शरीर, मन और आत्मा का उत्सव
- शब्दों से परे एक दिन
- श्राद्ध . . . कृतज्ञता और आशीर्वाद का सेतु
- समय के आईने में सनातन
चिन्तन
साहित्यिक आलेख
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
ऐतिहासिक
लघुकथा
किशोर साहित्य कविता
कहानी
सांस्कृतिक कथा
ललित निबन्ध
शोध निबन्ध
ललित कला
पुस्तक समीक्षा
कविता-मुक्तक
हास्य-व्यंग्य कविता
गीत-नवगीत
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं