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चेतना का उत्तरायण

 

सूर्य
आज केवल दिशा नहीं बदलता, 
वह समय की धमनियों में
एक नया संकल्प प्रवाहित करता है। 
 
दक्षिण की लंबी छायाओं से
उत्तर की ओर बढ़ता हुआ सूर्य
मानो कह रहा हो—
अंधकार स्थायी नहीं, 
वह तो प्रकाश की भूमिका मात्र है। 
 
उत्तरायण
केवल खगोलीय घटना नहीं, 
यह चेतना का उत्कर्ष है, 
जहाँ जड़ता पिघलती है
और विचार तपकर
आस्था का आकार लेते हैं। 
 
आज पृथ्वी
अपने ही अक्ष पर घूमते हुए
आत्मा की धुरी खोजती है, 
जहाँ इच्छाएँ ऋतुओं की तरह बदलती हैं
और विवेक—
सदैव उत्तर की ओर उन्मुख रहता है। 
 
सूर्य की यह यात्रा
मुझे भी भीतर से खींचती है—
कर्म के दक्षिण से
ज्ञान के उत्तर की ओर, 
जहाँ प्रश्नों का ताप
उत्तर नहीं, 
अनुभूति रचता है। 

उत्तरायण में
प्रकाश बाहर कम, 
भीतर अधिक उतरता है, 
और मन समझने लगता है—
जीवन की सार्थकता
लंबे दिनों में नहीं, 
जाग्रत क्षणों में बसती है। 
 
आज सूर्य सिखा गया
कि दिशा बदलना
पलायन नहीं होता, 
यह तो आत्मा का
उर्ध्वगमन है—
जहाँ प्रकाश
स्वयं को जानने लगता है। 

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