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वापसी की शून्यता

 

तुम लौटी हो—
पर सच कहूँ, 
मेरे भीतर अब कोई दरवाज़ा नहीं बचा
जो तुम्हारे लिए खुल सके। 
 
कभी यही हृदय
तुम्हारे नाम से धड़कता था, 
हर साँस
तुम्हारी प्रतीक्षा में थमी रहती थी, 
और मैं . . . 
अपने ही अस्तित्व को
तुम्हारे चरणों में रखकर
ख़ुद को पूर्ण समझता था। 
 
पर तुमने देखा ही कब? 
तुमने तो
मेरी निष्ठा को मेरी कमज़ोरी समझा, 
और मेरे प्रेम को
एक आसान-सी उपलब्धि। 
 
मैंने रातों को रो-रोकर
तुम्हारे नाम से सुबहें की थीं, 
अपने हर टूटे हिस्से को
तुम्हारी एक मुस्कान से जोड़ने की कोशिश की थी—
पर तुमने
कभी मुड़कर भी नहीं देखा। 
 
अब जब तुम आई हो, 
तो पाओगी—
मैं वही नहीं हूँ। 
 
अब इन आँखों में
कोई सपना नहीं पलता, 
न ही कोई उम्मीद
धीरे-धीरे साँस लेती है। 
 
मैंने अपने ही दर्द के साथ
जीना सीख लिया है, 
और सच कहूँ—
अब यह दर्द ही
मेरा सबसे सच्चा साथी लगता है। 
 
तुम्हारी यादें अब
दिल को नहीं तोड़तीं, 
बस कहीं दूर
एक थकी हुई गूँज की तरह
उभरती हैं . . . और खो जाती हैं। 
 
मैंने डूबकर सीखा है तैरना, 
और अब
कोई तूफ़ान मुझे डराता नहीं। 
 
तुम्हारा लौटना—
शायद तुम्हारे लिए मायने रखता हो, 
पर मेरे लिए
यह बस एक बीता हुआ अध्याय है
जिसे मैं दोबारा नहीं पढ़ना चाहता। 
 
इसलिए . . . 
अगर सच में सुन सकती हो, 
तो मेरी इस ख़ामोशी को सुनो—
 
मैंने तुम्हें चाहना नहीं छोड़ा, 
बस
तुम्हें फिर से अपनाने की वजह
खो दी है। 

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