आख़िरी सिक्का
कथा साहित्य | कहानी अमरेश सिंह भदौरिया1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
भोर पूरी तरह उजली नहीं हुई थी।
आसमान में धूप का रंग अभी तय ही हो रहा था।
लेकिन गाँव जाग चुका था।
आज हाट का दिन था।
हाट—जहाँ चीज़ें बिकती कम हैं, लोगों की हैसियत ज़्यादा तौली जाती है।
जहाँ कुछ लोग सामान लेकर लौटते हैं, और कुछ लोग सिर्फ़ अपने भीतर थोड़ी और कमी लेकर।
रामू दादी के पास बैठा था। आँखों में चमक थी। “दादी, आज हाट चलेंगे?” फूली ने उसकी ओर देखा। फिर नज़र हटा ली। गठरी खोली। उँगलियाँ जैसे कुछ ढूँढ़ नहीं रहीं थीं, टटोल रही थीं। एक सिक्का निकला।
पुराना। घिसा हुआ। जैसे बहुत बार ख़र्च होने से बच गया हो। “चलेंगे,” उसने कहा। और थोड़ा रुककर जोड़ा—“देखेंगे . . . आज क्या-क्या नहीं ख़रीद सकते।”
रामू हल्का-सा मुस्कुरा दिया।
चीज़ न ख़रीद पाना अब उसे खलता नहीं था।
जेब ख़ाली हो तो भी वह हाट चला जाता, भीड़ में घुलने, आवाज़ें सुनने, और रंग-बिरंगे सामान को निहारने के लिए। उसके लिए हाट सिर्फ़ बाज़ार नहीं, दिन भर की थकान से थोड़ा-सा छुटकारा था, एक सस्ती-सी ख़ुशी, जिसे पाने के लिए पैसे नहीं लगते थे।
रास्ते भर लोग मिलते गए।
कुछ के हाथ ख़ाली थे, कुछ के थैले।
पर सबकी चाल में एक जैसा हिसाब था—कितना ख़र्च कर सकते हैं, कितना नहीं।
हाट दूर से ही दिखने लगी।
रंग। शोर। धूल।
और बीच-बीच में कुछ उम्मीदें—जो ज़्यादा देर टिकती नहीं थीं।
दुकानें सजी थीं।
पर सामान से ज़्यादा आवाज़ें टँगी थीं।
“आओ-आओ . . . देख लो . . . सस्ता है . . .”
रामू हर दुकान पर रुक जाता।
खिलौने, चूड़ियाँ, कपड़े।
वह सबको ऐसे देखता जैसे पहचानता हो।
खिलौने भी उसे देखते थे।
कुछ देर के लिए दोनों बराबर हो जाते।
फिर दाम बीच में आ खड़ा होता।
“दादी, ये घोड़ा कितना दौड़ेगा?”
दुकानदार ने रामू को देखा। फिर फूली को।
और हँस पड़ा—“इतना दौड़ेगा कि तेरे बाप की कमाई भी पीछे छूट जाए।”
रामू ने बात पूरी तरह नहीं समझी।
पर आवाज़ का मतलब समझ गया।
फूली ने उसका हाथ पकड़ लिया—“चल, ये घोड़ा ज़्यादा दौड़ेगा तो गिर जाएगा।”
वे आगे बढ़ गए।
अनाज की दुकान पर भीड़ थी।
यहाँ आवाज़ें कम थीं।
यहाँ हिसाब ज़्यादा था।
तौलने वाले हाथ तेज़ चलते थे।
ख़रीदने वाले हाथ धीरे आगे बढ़ते थे—जैसे हर बार थोड़ा हिचकते हों।
“आधा किलो चावल।”
फूली की आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे वह ख़ुद भी सुनना नहीं चाहती हो।
दुकानदार ने सिक्का लिया।
उसे नाखून से खुरचा।
जैसे असली होने से ज़्यादा क़ीमत का होना ज़रूरी हो।
“बस इतना?”
“महँगाई देखी है?”
फूली ने कुछ नहीं कहा।
सिर झुका लिया।
यह झुकना जवाब नहीं था।
आदत थी।
चावल मिल गए।
इतने कि भूख थोड़ी देर के लिए समझौता कर ले।
वापसी शुरू हुई।
अब हाट पीछे थी।
पर उसका शोर जैसे भीतर अटक गया था।
“कुछ लेना था?”
फूली ने पूछा।
जैसे यह पूछना ज़रूरी हो, चाहे जवाब पहले से मालूम हो।
रामू ने सिर हिलाया।
फिर धीरे से बोला—
“सब अच्छा था . . . पर हमारे लिए नहीं था।”
फूली ने उसे देखा।
इस बार जैसे पहली बार देख रही हो।
आगे भीड़ लगी थी।
माइक। झंडा। कुछ चेहरे।
एक आदमी बोल रहा था—“हम गाँव बदल देंगे!
हर घर में ख़ुशहाली लाएँगे!”
लोग सुन रहे थे।
कुछ सच में। कुछ आदत से।
रामू रुक गया।
“दादी, ये कौन है?”
फूली बिना रुके बोली—“ये वही हैं, जिनकी वजह से हम हर हफ़्ते हाट देखने आते हैं।”
रामू ने फिर पूछा—
“ये ख़ुशहाली कब देंगे?”
फूली हल्का सा हँसी।
हँसी में थकान थी।
“जब तक तू बड़ा होगा . . .
तब तक इनका वादा भी बड़ा हो जाएगा।”
घर पहुँचे।
वही आँगन।
वही टूटी चौखट।
वही चूल्हा, जो हर दिन जलता है और फिर भी घर को गर्म नहीं कर पाता।
फूली ने चावल चढ़ाए।
रामू बाहर बैठा रहा।
“दादी . . .”
उसने धीरे से कहा—
“हाट इतनी अच्छी क्यों लगती है?”
फूली ने लकड़ी सरकाई।
कुछ देर सोचा।
“क्योंकि वहाँ सब कुछ हमारा नहीं होता।”
“और जो हमारा होता है?”
रामू ने पूछा।
फूली ने चूल्हे में फूँक मारी।
आग थोड़ी तेज़ हुई।
“वो इतना कम होता है . . .
कि अच्छा लगने का मौक़ा ही नहीं मिलता।”
रामू चुप हो गया।
फिर बोला—“दादी, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा . . .
तो क्या मैं सब ख़रीद सकूँगा?”
फूली ने उसकी ओर देखा।
लंबे समय तक। “अगर तू सच में बड़ा हो गया . . .
तो शायद ख़रीदने की इच्छा ही नहीं बचेगी। और अगर बची रही?”
रामू ने पूछा। फूली ने नज़र फेर ली—“तो तू भी हर हफ़्ते हाट आएगा . . . और देखेगा।”
चूल्हे से धुआँ उठता रहा।
धीरे-धीरे आकाश में घुलता हुआ।
गाँव में हाट लगती रही।
हर हफ़्ते।
और हर हफ़्ते—
ग़रीबी थोड़ा और सभ्य हो जाती है।
थोड़ा और चुप।
थोड़ा और सहनशील।
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