आख़िरी नामांकन
कथा साहित्य | कहानी अमरेश सिंह भदौरिया1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
गाँव नक़्शे में छोटा था, पर वहाँ रहने वालों की ज़िंदगियाँ किसी भी बड़े शहर से कम उलझी हुई नहीं थीं। धूल भरी पगडंडियाँ थीं, जिन पर चलते-चलते चप्पल घिस जाती थी और सपने भी। टेढ़े खंभों पर टिके बिजली के तार थे, जो हवा चलने पर ऐसे हिलते जैसे कभी भी टूटकर गिर पड़ेंगे। शाम को रोशनी आती तो थी, पर इतनी कमज़ोर कि अँधेरा ही सच्चा लगता।
बरसात में यही पगडंडियाँ कीचड़ बन जातीं और धूप में फटकर दरारों में बदल जातीं। खेत दूर तक फैले थे, पर उनमें हरियाली कम और इंतज़ार ज़्यादा दिखता था।
गाँव के बीचों-बीच एक पुराना कुआँ था—अब आधा सूख चुका। उसके किनारों पर जंग लगी बाल्टियाँ और रस्सियाँ पड़ी रहतीं, जैसे किसी पुराने समय की निशानियाँ हों। अब ज़्यादातर औरतें थोड़ी दूर लगे हैंडपंप के पास लाइन में खड़ी मिलतीं।
“पानी आ रहा है क्या?” एक औरत ने हैंडपंप चलाते हुए पूछा।
दूसरी ने थकी आवाज़ में कहा, “आ तो रहा है, मगर जैसे अनमने मन से आ रहा हो।”
तीसरी ने हँसते हुए जोड़ा, “यहाँ सब कुछ ऐसे ही मिलता है—पानी भी, और जीना भी।”
पास खड़े एक बूढ़े ने बीड़ी सुलगाई और कहा, “काग़ज़ में तो हर घर में नल लगा है।”
दूसरा बोला, “हमारे घर में तो बस काग़ज़ ही पहुँचा है।”
दोनों धीमे-धीमे हँस पड़े। वह हँसी ज़्यादा देर टिक नहीं पाई।
गाँव के बाहर एक सरकारी स्कूल था। दीवारों से पेंट उखड़ा हुआ, खिड़कियों के शीशे आधे टूटे हुए। गेट पर बड़े अक्षरों में लिखा था—“सब पढ़ें। सब बढ़ें।”
नीचे छोटे अक्षरों में किसी ने कोयले से लिख दिया था—“कैसे?”
स्कूल के पास कुछ बच्चे खेल रहे थे। एक ने मिट्टी में लकड़ी से गोला बनाते हुए पूछा, “तू कल स्कूल आया था?”
दूसरा बोला, “नहीं, बापू के साथ खेत गया था।”
“मास्टर डाँटेगा।”
“डाँट ले . . . पेट भरेगा क्या?”
थोड़ी देर चुप्पी रही, फिर दोनों फिर से खेल में लग गए—जैसे बात कोई ख़ास थी ही नहीं।
रघु अक्सर उसी रास्ते खड़ा होकर यह सब देखता था। उसे लगता, यह गाँव छोटा ज़रूर है, पर इसके अंदर फैली हुई कमी बहुत बड़ी है। यहाँ हर चीज़ आधी-अधूरी है—रोशनी, पानी, काम . . . और शायद ‘अवसर’ भी।
एक दिन उसने माँ से पूछा, “माँ। यहाँ से बाहर जाने पर सब ठीक हो जाता है क्या?”
माँ आटा गूँधते-गूँधते रुकी नहीं। बस बोली, “बाहर क्या है, मुझे नहीं पता . . . लेकिन यहाँ क्या नहीं है, यह अच्छे से पता है।”
रघु चुप हो गया। सामने वही रास्ता था, जो गाँव से बाहर जाता था—पर कहाँ तक जाता है, यह कोई ठीक से नहीं जानता था।
रघु ने उस दिन पहली बार अपने नाम के आगे “कक्षा 11” लिखकर देखा। काग़ज़ पर यह बहुत छोटा-सा जोड़ था, लेकिन उसे लगा जैसे उसने अपने हिस्से की दुनिया में एक दरवाज़ा खोल लिया हो। उसने उँगली से उन अक्षरों को छुआ, जैसे देख रहा हो कि यह सच में उसी का है या किसी और का नाम ग़लती से उसके हाथ लग गया है।
काग़ज़ नया नहीं था, किनारे हल्के मुड़े हुए थे। फिर भी उस पर लिखा हुआ उसका नाम उसे नया लगा। उसने एक बार फिर धीरे-धीरे पढ़ा—“रघु। कक्षा 11”
उसे लगा जैसे यह सिर्फ़ लिखना नहीं है, कहीं पहुँच जाना है।
माँ ने काग़ज़ हाथ में लिया। आँखों से पढ़ा, चेहरे से नहीं। फिर चूल्हे की तरफ़ देखते हुए बोली, “नाम के आगे लिख लेने से पढ़ाई हो जाती है क्या?”
रघु कुछ नहीं बोला। उसे मालूम था, माँ उससे नहीं, उन हालातों से बात कर रही है जो हर बार उसके रास्ते में खड़े हो जाते हैं।
चूल्हे में आग धीमी थी। माँ ने लकड़ी को थोड़ा आगे खिसकाया। चिंगारी उठी और फिर बुझने लगी। “कहाँ तक पढ़ेगा?” उसने जैसे यूँ ही पूछा।
रघु ने धीरे से कहा, “जितना हो जाए।”
माँ ने हल्की-सी साँस भरी, “हो जाए . . . ” फिर ख़ुद ही दोहराया, जैसे यह शब्द कहीं अटक गया हो।
कुछ पल तक दोनों चुप रहे। बाहर से बच्चों के खेलने की आवाज़ आ रही थी। बीच-बीच में हैंडपंप की चर्र-चर्र भी सुनाई दे जाती।
माँ ने फिर पूछा, “स्कूल में बताया क्या-क्या लगेगा?”
रघु ने काग़ज़ वापस लेते हुए कहा, “बताया . . . फ़ीस . . . किताब . . . कॉपी . . . ”
वह रुक गया।
माँ ने उसकी तरफ़ देखा, “कितना?”
रघु ने सीधा जवाब नहीं दिया। बस ज़मीन पर उँगली से एक लकीर खींचने लगा। “ज़्यादा है . . . ” उसने धीरे से कहा।
माँ समझ गई। “ज़्यादा तो सब कुछ ही है यहाँ,” वह बुदबुदाई।
फिर थोड़ी देर बाद बोली, “नाम लिख गया है तो जाना पड़ेगा।”
रघु ने माँ की तरफ़ देखा, “अगर . . . न जाएँ तो?”
माँ ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने चूल्हे से नज़र हटाकर पहली बार सीधे रघु को देखा।
“न जाने से क्या होगा?”
रघु के पास कोई जवाब नहीं था।
माँ ने ख़ुद ही कहा, “जो अब तक होता आया है, वही होगा।”
यह बात इतनी सीधी थी कि उसके बाद कुछ कहने को बचा ही नहीं।
गुड़िया पास आकर बैठ गई। उसने काग़ज़ छीनकर देखा, “भैया। यह क्या लिखा है?”
रघु ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा, “मेरा नाम।”
“और यह?” उसने “कक्षा 11” पर उँगली रखी।
रघु कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “बस . . . आगे की पढ़ाई।”
गुड़िया ने जैसे समझ लिया हो, सिर हिलाया, “मैं भी लिखूँगी अपना नाम।”
माँ ने बीच में ही कहा, “पहले लिखना तो सीख ले।”
गुड़िया चुप हो गई, लेकिन उसकी आँखें अब भी काग़ज़ पर ही थीं।
रघु ने काग़ज़ वापस ले लिया और ध्यान से मोड़कर रखा। जैसे डर हो कि कहीं यह भी बाक़ी चीज़ों की तरह हाथ से फिसल न जाए।
बाहर हवा थोड़ी तेज़ हो गई थी। टेढ़े खंभों पर लटकते तार हिलने लगे थे। दूर कहीं से कोई आवाज़ आई—शायद किसी को बुलाने की।
रघु दरवाज़े की तरफ़ देखने लगा। उसे लगा जैसे यह छोटा-सा काग़ज़ अब उसके और घर के बीच आ खड़ा हुआ है।
माँ ने धीमे से कहा, “सोच ले . . . पढ़ाई आसान नहीं होती।”
रघु ने बिना उसकी तरफ़ देखे जवाब दिया, “पता है।”
लेकिन उसके ‘पता है’ में जितनी समझ थी, उससे कहीं ज़्यादा अनजान रास्ते थे।
पिता का नाम अब घर में कम ही लिया जाता था। पहले कभी-कभी बातों-बातों में निकल आता था, अब जैसे जान-बूझकर बचा लिया जाता है। ईंट-भट्ठे पर गए थे और फिर लौटे नहीं।
शुरू-शुरू में लोग ख़बरें लाते थे, “शहर में देखे गए थे . . . ”
“किसी और काम में लग गए होंगे . . . ”
फिर धीरे-धीरे बात बदलने लगी, “सुना है, हादसा हो गया . . . ”
“भट्ठे पर ही कुछ गड़बड़ हुई थी . . . ”
कोई पक्की बात किसी के पास नहीं थी, पर हर किसी के पास एक कहानी थी।
रघु शुरू में हर बात ध्यान से सुनता था। उसे लगता, शायद इनमें से कोई सच हो। वह माँ से पूछता—“माँ, कोई ख़बर आई?”
माँ हर बार एक ही जवाब देती, “आ जाएगी तो बता दूँगी।”
धीरे-धीरे रघु ने पूछना छोड़ दिया। और लोगों ने बताना।
एक दिन उसने यूँ ही माँ से कहा, “अगर वो लौट आएँ तो?”
माँ उस समय आटा बेल रही थी। हाथ नहीं रुके। बस बोली, “जो चला गया, वो लौटे तो भी वही नहीं रहता।”
रघु ने फिर कुछ नहीं पूछा।
अब घर में पिता की जगह कोई नाम नहीं था, बस एक ख़ाली जगह थी—जो हर बात में चुपचाप दिख जाती थी। कभी जब कुछ भारी उठाना होता, कभी जब पैसों की बात आती, या जब गुड़िया ज़िद करती, “हमारे पापा कहाँ हैं?”
माँ टाल देती, “काम पर गए हैं।”
“इतने दिन?”
माँ चुप हो जाती। और यही चुप्पी जवाब बन जाती।
रघु ने अब यह मान लिया था कि इंतज़ार भी एक तरह का धोखा होता है—ख़ुद से किया हुआ। उसने अपने भीतर से यह उम्मीद धीरे-धीरे निकाल दी।
उसने बस यह तय कर लिया कि अब जो है, वही सच है—माँ, जो बिना रुके काम करती रहती है। गुड़िया, जो हर बात में सवाल ढूँढ़ लेती है। और यह कच्चा घर, जो हर बारिश में थोड़ा और कमज़ोर हो जाता है।
कभी-कभी वह सोचता, अगर पिता होते तो क्या बदल जाता। फिर ख़ुद ही जवाब दे देता, “शायद कुछ नहीं . . . या शायद सब कुछ।”
लेकिन अब यह सोचने का कोई मतलब नहीं था।
उसने अपनी दुनिया छोटी कर ली थी—इतनी छोटी कि उसमें किसी के आने या जाने की जगह ही नहीं बची थी।
स्कूल के दफ़्तर में घुसते ही रघु को हमेशा एक अजीब-सी घबराहट होने लगती थी। कमरा बड़ा नहीं था, पर दीवारों पर टँगे काग़ज़, रजिस्टरों के ढेर और लकड़ी की पुरानी मेज़ें उसे और छोटा बना देती थीं। पंखा ऊपर घूम रहा था, लेकिन हवा कम और आवाज़ ज़्यादा कर रहा था।
प्रिंसिपल कुर्सी पर बैठे फ़ॉर्म देख रहे थे। रघु ने धीरे से काग़ज़ आगे बढ़ाया।
प्रिंसिपल ने चश्मा थोड़ा नीचे खिसकाया, काग़ज़ को ऊपर से नीचे तक देखा, फिर बिना ऊपर देखे पूछा, “फ़ीस भर दी?”
रघु की आवाज़ गले में ही अटक गई। “सर। दो-तीन दिन में . . . ”
पास ही बैठे क्लर्क ने हँसते हुए कुर्सी पीछे खिसकाई, “दो-तीन दिन में तो बहुत कुछ हो जाता है। पढ़ाई भी, फ़ीस भी . . . और सपने भी।”
उसकी हँसी कमरे में थोड़ी देर तक गूँजती रही। रघु ने नज़र झुका ली।
प्रिंसिपल ने एक बार क्लर्क की तरफ़ देखा, फिर रघु की ओर। “कौन-सी कक्षा?”
“ग्यारहवीं . . . ”
“पहले कहाँ पढ़ता था?”
“यहीं . . . दसवीं पास की है।”
प्रिंसिपल ने फ़ॉर्म पर उँगली घुमाई, जैसे कुछ ढूँढ़ रहे हों। फिर बोले, “नियम तो पता ही होगा। बिना फ़ीस नामांकन नहीं होता।”
रघु ने हिम्मत करके कहा, “सर, बस दो दिन . . . ”
क्लर्क ने बीच में ही बात काट दी, “दो दिन में पैसे पेड़ पर उगेंगे क्या?”
रघु चुप हो गया। उसे लगा जैसे हर शब्द बोलने से पहले तौलना पड़ रहा है।
प्रिंसिपल ने कुर्सी पर थोड़ा सीधा बैठते हुए कहा, “देखो लड़के, बात समझो। आज आख़िरी तारीख़ है। आज नहीं हुआ तो फिर अगले साल आना।”
“अगले साल . . . ” रघु ने मन ही मन दोहराया।
उसने पहली बार सिर उठाकर प्रिंसिपल की तरफ़ देखा, “सर। कोई और तरीक़ा . . .?”
प्रिंसिपल ने सीधा जवाब नहीं दिया। कुछ पल चुप रहे, फिर धीरे से बोले, “नियम सबके लिए एक जैसा होता है।”
क्लर्क ने फिर हँसते हुए कहा, “हाँ, लेकिन सबके हालात एक जैसे नहीं होते . . . है न?”
वह ख़ुद ही अपनी बात पर मुस्कुरा दिया।
रघु को लगा जैसे वह इस कमरे में खड़ा नहीं, कहीं और खड़ा है—जहाँ उसकी बात का कोई वज़न नहीं है।
प्रिंसिपल ने फ़ॉर्म उसकी तरफ़ सरका दिया, “फ़ीस जमा कर दो, फिर आना।”
रघु ने काग़ज़ उठा लिया। “जी . . . ” बस इतना ही कह पाया।
वह धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। पीछे से क्लर्क की आवाज़ आई, “अरे सुन . . . जल्दी करना, वरना सीट किसी और को दे देंगे।”
रघु रुका नहीं। बाहर निकल आया।
दफ़्तर से बाहर की हवा भी उसे हल्की नहीं लगी। स्कूल का वही आँगन, वही दीवारें—सब कुछ पहले जैसा था, लेकिन उसे लगा जैसे कुछ बदल गया है।
उसने जेब में रखा काग़ज़ टटोला। अब वह काग़ज़ पहले जैसा हल्का नहीं था।
“अगला साल”—यह शब्द उसके भीतर अटक गया था। यह सिर्फ़ समय नहीं था, एक दूरी थी—इतनी लंबी कि उसे पार करने का कोई रास्ता उसे दिखाई नहीं दे रहा था।
वह स्कूल से बाहर निकला तो बरामदे की दीवारों पर चिपके पोस्टर हवा से हिल रहे थे। कोनों से उखड़ते हुए, बीच-बीच में मुड़े हुए। उन पर लिखे शब्द अब भी साफ़ थे—“हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार।”, “बेटी बचाओ। बेटी पढ़ाओ।”
रघु कुछ देर वहीं खड़ा रहा। उसने उन पंक्तियों को ध्यान से पढ़ा, जैसे पहली बार देख रहा हो। कुछ पल के लिए लगा, शायद यह सब सच है। फिर धीरे-धीरे शब्द अपनी जगह पर रह गए और उनका मतलब कहीं पीछे छूट गया। जैसे धूप में रखा रंग धीरे-धीरे फीका पड़ जाता है।
वह मुड़ गया।
घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के सामने बैठी थी। धुआँ ऊपर उठने के बजाय कमरे में ही फैल रहा था। आँखें लाल थीं, पर वह उन्हें पोंछ नहीं रही थी। जैसे यह भी रोज़ की बात हो।
रघु दरवाज़े पर ही रुक गया। “माँ। फ़ीस चाहिए।”
माँ ने हाथ नहीं रोके, “कितनी?”
रघु ने धीरे-धीरे बताया। हर शब्द के साथ उसकी आवाज़ और धीमी होती गई।
कुछ देर तक कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ़ लकड़ी के जलने की आवाज़ और बरतन खिसकने की हल्की खनक। फिर माँ ने जैसे सीधा हिसाब लगाकर कहा, “इतने में तो घर चल जाए कुछ दिन।”
रघु चुप।
माँ ने इस बार उसकी तरफ़ देखा, “और कोई रास्ता बताया?”
“नहीं।”
माँ ने नज़र फेर ली। फिर थोड़ी देर बाद बोली, “लोग जाते हैं . . . पटवारी के यहाँ।”
वह बात जैसे अधूरी छोड़ना चाहती थी, पर छोड़ नहीं पाई।
रघु ने धीरे से कहा, “काम करवाएगा।”
माँ ने साफ़ जवाब दिया, “यहाँ कोई बिना काम के नहीं देता।”
कमरे में फिर वही ख़ामोशी फैल गई। इस बार थोड़ी भारी।
कुछ देर बाद रघु उठ गया, “मैं देखता हूँ।”
माँ ने कुछ नहीं कहा। बस चूल्हे में लकड़ी सरका दी।
पटवारी का घर दूर से ही अलग दिखाई देता था। पक्की दीवारें, लोहे का गेट, सामने साफ़ आँगन। गाँव की धूल जैसे वहाँ आकर रुक जाती हो।
रघु ने गेट के पास खड़े होकर आवाज़ दी, “कोई है?”
अंदर से जवाब आया, “कौन?”
“रघु . . . ”
दरवाज़ा खुला। पटवारी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे पहचानने की कोशिश नहीं, परखने की आदत हो। “क्या काम है?”
रघु ने आँखें नीचे रखते हुए कहा, “स्कूल की फ़ीस . . . ”
पटवारी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई। “अच्छा . . . पढ़ने लगा है अब?”
रघु ने कुछ नहीं कहा।
“पैसे चाहिएँ?” उसने ख़ुद ही पूछा।
“हाँ . . . ”
“काम करेगा?”
“कर लूँगा।”
पटवारी ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “घर का काम, खेत का काम . . . जो कहा जाए।”
रघु ने सिर हिला दिया।
कुछ पल चुप्पी रही। फिर पटवारी अंदर गया और लौटकर कुछ पैसे उसकी तरफ़ बढ़ा दिए, “ले जा। काम कल से शुरू कर देना।”
रघु ने पैसे हाथ में लिए। उँगलियाँ कस गईं। उसे लगा जैसे उसने कुछ पकड़ा नहीं, बल्कि कुछ छोड़ दिया है—जो अभी समझ में नहीं आ रहा।
“और सुन,” पटवारी ने जाते-जाते कहा, “पढ़ाई बाद में भी होती रहती है . . . काम पहले सीख।”
रघु ने जवाब नहीं दिया। वह बाहर निकल आया।
अगले दिन उसका नामांकन हो गया। काग़ज़ पर सब ठीक था—नाम, कक्षा, हस्ताक्षर। उसने फिर लिखा—रघु। कक्षा 11।
लेकिन इस बार उसने उसे ज़्यादा देर तक नहीं देखा। जैसे जल्दी समझ आ गया हो कि सिर्फ़ लिख देने से बात पूरी नहीं होती।
क्लास में बैठा तो टीचर पढ़ा रहे थे—“शिक्षा सबको बराबर अवसर देती है।”
रघु ने पहली बार यह वाक्य ध्यान से सुना। उसके पीछे बैठे लड़के ने धीमे से कहा—“सबको कहाँ . . . ”
कुछ बच्चों के होंठ हिले, पर आवाज़ बाहर नहीं आई। टीचर ने बोर्ड की तरफ़ देखते हुए पढ़ाना जारी रखा। जैसे यह बात सुनी ही न हो।
दिन धीरे-धीरे एक जैसे होने लगे। सुबह स्कूल, फिर सीधे पटवारी के यहाँ। खेत, मवेशी, छोटे-छोटे काम। शाम तक शरीर जवाब देने लगता। घर लौटते-लौटते अँधेरा हो जाता।
गुड़िया हर दिन एक ही सवाल लेकर बैठती, “भैया। आज क्या पढ़ाया?”
रघु कभी कहता—“इतिहास . . . ” कभी—“गणित . . . ”
“मुझे भी सिखाओ न,” गुड़िया कहती।
रघु उसे देखता रहता। “कल सिखाऊँगा,” कह देता।
कल बार-बार टलता रहा।
एक दिन स्कूल में स्कॉलरशिप के फ़ॉर्म बाँटे गए। रघु ने भी एक उठा लिया। उसने ऊपर अपना नाम भरा। फिर नीचे नज़र गई—जाति प्रमाणपत्र। आय प्रमाणपत्र अनिवार्य है।
उसने पेन रोक लिया। कुछ देर तक काग़ज़ देखता रहा। फिर बिना कुछ लिखे उसे मेज़ पर रख दिया।
उसके पास कोई काग़ज़ नहीं था, जो यह साबित कर सके कि वह किस हाल में जी रहा है।
शाम को पटवारी ने आवाज़ दी, “रघु। कल से सुबह भी आना पड़ेगा।”
रघु ठिठका, “सुबह . . .? लेकिन स्कूल . . . ”
पटवारी ने उसकी बात पूरी नहीं होने दी, “काम पहले। पढ़ाई तो चलती रहती है।”
यह बात ऐसे कही गई जैसे इसमें कोई शक की जगह ही नहीं हो।
रघु चुप रहा। उसे लगा, अब बोलने से कुछ बदलेगा नहीं।
अगली सुबह वह स्कूल नहीं गया।
उसकी जगह ख़ाली रही। टीचर ने नाम पुकारा, फिर बिना रुके अगला नाम पढ़ लिया। क्लास वैसे ही चलती रही, जैसे एक कुर्सी का ख़ाली होना कोई बड़ी बात न हो।
शाम को गुड़िया ने पूछा, “आज स्कूल नहीं गए?”
“नहीं।”
“क्यों?”
रघु ने नज़रें बचाकर कहा, “काम था।”
गुड़िया कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “फिर कब जाओगे?”
रघु ने जवाब नहीं दिया। थोड़ी देर बाद ख़ुद ही कहा, “तू पढ़ना।”
गुड़िया हँसी, “मैं कैसे?”
इस बार रघु ने उसकी तरफ़ देखकर कहा, “बस पढ़ना . . . किसी से मत पूछना।”
गुड़िया उसकी बात समझी या नहीं, यह साफ़ नहीं था। पर वह चुप हो गई।
रात को रघु ने अपना काग़ज़ निकाला। वही—रघु। कक्षा 11।
उसने नीचे थोड़ा ख़ाली जगह देखी। फिर धीरे से एक और शब्द जोड़ दिया—कामगार।
कुछ देर तक वह उसे देखता रहा। दोनों शब्द एक साथ थे, लेकिन एक-दूसरे से अलग भी।
उसने काग़ज़ मोड़ा और रख दिया।
जैसे कोई चीज़ सँभालकर नहीं, छिपाकर रखी जाती है—ताकि वह रहे भी और सामने भी न आए।
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