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अनुभूति की प्रथम ध्वनि

 

वह केवल ध्वनियों का अनुशासन नहीं, 
न व्याकरण की कोरी संरचना, 
न लिपि का मात्र शिल्प। 
 
वह तो अस्तित्व की आदिम कंपन-रेखा है—
जिसने चेतना के शैशव में
मुझे स्वयं से परिचित कराया। 
 
जब मन अवधारणाओं से रिक्त था, 
और जगत संकेतों की धुँधली आकृतियों में उपस्थित था, 
तब उसी ने
मेरी अस्पष्ट ध्वनियों को
अर्थ का आलोक दिया। 
 
वह केवल भाषा नहीं थी—
वह मेरी पहली आत्म-स्वीकृति थी। 
 
माँ की लोरी में वह करुणा बनकर उतरी, 
पिता की सीख में संयम बनकर, 
दादी की कथाओं में इतिहास की गंध बनकर। 
उसके शब्दों में
मिट्टी का ताप था, 
और पीढ़ियों की स्मृति का संगीत। 
 
समय के साथ
मैंने अनेक भाषाओं का आवरण ओढ़ा—
शिक्षा के लिए, 
प्रतिष्ठा के लिए, 
बाज़ार और बौद्धिक विनिमय के लिए। 
वे सब उपयोगी थीं—
संवाद की सुविधा के लिए आवश्यक भी। 
 
किन्तु अनुभूति का जो प्रथम उद्गार है, 
जो वेदना में स्वतः फूट पड़ता है, 
जो उल्लास में अनायास झरता है—
वह आज भी
मेरी मातृभाषा का ही शब्द होता है। 
 
क्योंकि विचार सार्वभौमिक हो सकते हैं, 
पर अनुभूति की जड़ें स्थानीय होती हैं। 
 
मातृभाषा
मनुष्य की सांस्कृतिक स्मृति का कोष है—
वह परंपरा की निरंतरता है, 
वह सामूहिक चेतना का संवाहक तंतु है। 
उसे त्यागना केवल शब्दों का परित्याग नहीं, 
अपनी आत्म-संरचना से दूरी बनाना है। 
 
भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, 
वह एक सभ्यता का जीवित रूप है। 
जब कोई भाषा क्षीण होती है, 
तो उसके साथ
अनगिनत लोककथाएँ, 
लोकगीत, 
अनुभव की सूक्ष्म छवियाँ
और जीवन-दृष्टि की विशिष्ट भंगिमाएँ
अदृश्य हो जाती हैं। 
 
अतः यह दिवस
स्मरण का ही नहीं, 
संकल्प का भी है—
 
कि हम आधुनिकता को स्वीकार करेंगे, 
पर अपनी जड़ों को विस्मृत नहीं करेंगे। 
कि हम विश्व से संवाद करेंगे, 
पर अपने अन्तःकरण की आवाज़
अपनी ही भाषा में सुनेंगे। 
 
क्योंकि मनुष्य की ऊँचाई
उसकी उड़ान से नहीं, 
उसकी जड़ों की गहराई से मापी जाती है—
और मेरी जड़
मेरी मातृभाषा है। 

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