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गुइफ़ा की लाल टोपी


मूल कहानी: गुइफ़ा ए ला ब्रेट्टा रोस्सा; चयन एवं पुनर्कथन: इतालो कैल्विनो
अंग्रेज़ी में अनूदित: जॉर्ज मार्टिन (गुइफ़ा एंड रेड कैप); पुस्तक का नाम: इटालियन फ़ोकटेल्स
हिन्दी में अनुवाद: सरोजिनी पाण्डेय

 

प्रिय पाठक, 

लोक कथाएँ किसी संस्कृति, किसी देश में प्रचलित वे कथाएँ है़ं जिनका कोई रचनाकार ज्ञात नहीं होता। ये कथाएँ मौखिक यात्राएँ करते-करते देशों की सीमाएँ पार कर व्यापारियों, पर्यटकों, सैलानियों के माध्यम से दूर-दूर तक फैलती जाती हैं। इनके उद्भव का समय, स्थान सुनिश्चित करना कठिन होता‌ है। अपनी इन यात्राओं के कारण स्थानीय भाषा, भौगोलिक स्थिति के कारण उनके रूप भी परिवर्तित-परिवर्धित होते रहते हैं। जीवन से संबंधित नीतियाँ, समाजिक और नैतिक मूल्य इन कहानियों के मुख्य विषय होते हैं। मूर्खता एक ऐसा ही विषय है, जो कई लोक कथाओं के मूल में रहा है। शेखचिल्ली की कहानियाँ इसी श्रेणी की हैं। मुल्ला नसरुद्दीन भी ऐसे ही चरित्र हैं। 

इटली की लोककथाओं में ‘गुइफ़ा’ एक ऐसा ही पात्र है, जो मूर्खता करता रहता है। इसकी मूर्खताएँ कभी लाभकारी और कभी घातक सिद्ध होती हैं। इसी पात्र पर आधारित, कहानी आपको सुनाऊँगी। आज के अंक में पढ़िए:


 

गुइफ़ा कभी काम नहीं करना चाहता था, बस खाना और गलियों में मटरगश्ती करना ही उसको भाता था। बेचारी माँ जब बहुत परेशान हो जाती तब तब गुइफ़ा को, डाँटते हुए कहती, “गुइफ़ा यह ज़िन्दगी जीने का कोई ढंग नहीं है, तुम बस खाना-पीना जानते हो और आवारा भिखारी की तरह गलियों की धूल फाँकते हुए घूमते हो। क्या तुम कोई सही काम करने की कोशिश भी नहीं करना चाहते? कभी इतना तो कमाओ कि अपना ख़र्चा ख़ुद उठा सको और अपने लिए कुछ सामान ख़रीद सको, मैं भी बूढ़ी हो रही हूँ, आख़िर कब तक तुम्हें बैठा कर खिला सकूँगी?” 

यह फटकार सुनकर गुइफ़ा गुफा घर से निकाला और बजाजे की गली में जहाँ कपड़े बिकते थे, जा पहुँचा। उसने अपने लिए कपड़े लेने शुरू किए। कुछ दिनों बाद आकर पैसा चुका देने का वादा करता हुआ वह अपने लिए एक दुकान से एक कपड़ा ‘ख़रीदने’ लगा! एक-एक करके इसी वादे के साथ उसने अपने लिए एक पजामा, क़मीज़ कोट ख़रीद लिए। सिर से पैर तक जब वह नए कपड़ों में सज गया, तब वह पहुँचा एक टोपी वाले की दुकान के सामने। वहाँ उसे एक लाल टोपी पसंद आ गई। टोपी वाले से भी कुछ दिन बाद पैसे चुका देने का वादा करके उसने वह लाल टोपी ले ली। 

एक दुकान के शीशे में जब उसने अपने को सिर से पैर तक नए कपड़ों में सजा हुआ देखा तब उसे सबसे बड़ी ख़ुशी इस बात की हुई कि अब उसकी माँ उसे ‘भिखारी’ नहीं कह पाएगी। 

घर जाते हुए रास्ते में उसे उन पैसों की चिंता सताने लगी, जो उसे अपने वादे के अनुसार दुकानदारों को चुकाने थे। काम-धाम तो वह कुछ करता न था, कैसे चुकाएगा यह पैसे? उसे घबराहट होने लगी इस घबराहट में उसने तय किया, अगर वह मर जाए तो पैसे नहीं चुकाने पड़ेंगे! बस फिर क्या था, उसने मरने का इरादा पक्का कर लिया। 

घर पहुँचते ही वह बिस्तर पर धम्म से चारों खाने चित्त होकर गिर पड़ा और और चिल्लाया, “मैं मर रहा हूँ! मैं मर रहा हूँ! हाय मैं मर गया!!” उसे तड़पता देखकर उसकी माँ चिल्ला पड़ी, “हाय, हाय मेरा बच्चा! हाय मेरा लाल! मेरी आँखों का तारा मुझे छोड़कर चला गया!” उसका रोना-धोना सुनकर पड़ोसी दौड़े आए। धीरे-धीरे जवान गुइ़फ़ा के मर जाने की बात फैलते-फैलते बाज़ार तक भी पहुँच गई। जिन दुकानदारों से गुइफ़ा ने कपड़े उधार पर ख़रीदे थे वे सब भी उसे देखने आए, “बेचारा गुइफ़ा! भला चंगा था, मुझसे एक क़मीज़ छह ग्रोट में (चार पेंस के बराबर का एक सिक्का) ख़रीदी। बेचारा जवानी में ही चल बसा। भगवान उसकी आत्मा को शान्ति दें। मैं उसका क़र्ज़ माफ़ करता हूँ।” ऐसा कह कर उसने अपनी बही में से गुफा के नाम का क़र्ज़ माफ़ कर दिया। 

उसकी देखा-देखी दूसरे दुकानदारों ने भी गुइफ़ा के नाम का क़र्ज़ माफ़ कर दिया। लेकिन जिस दुकानदार ने गुइफ़ा को लाल टोपी बेची थी उसने अपना क़र्ज़ नहीं छोड़ा। उसने देखा था कि गुइफ़ा के सिर पर अभी वही लाल टोपी लगी हुई है। 

जब दफ़नाने वाले लोग गुइफ़ा का ताबूत लेकर चले तब वह दुकानदार छिपता-छिपाता उनके पीछे चल पड़ा और चर्च पहुँच कर, छिपकर रात होने का इंतज़ार करने लगा। जब रात हो गई तब कुछ लुटेरे अपनी लूट का धन आपस में बाँटने के लिए चर्च में आए। गुइफ़ा अपने ताबूत में चुपचाप पड़ा रहा और टोपी वाला दरवाज़े के पीछे छुप कर खड़ा रहा। लुटेरों ने लूट का धन बाहर निकाला और फिर सोने, चाँदी के सिक्के गिन-गिन कर उतनी ही ढेरियाँ बनाईं जितने वे थे। ढेरियाँ बना लेने के बाद ग्रुप का एक सिक्का बच गया लुटेरों को यह समझ में नहीं आया कि यह सिक्का किसे दिया जाए? 

तब उनमें से एक लुटेरा बोला, “ऐसा करते हैं कि एक-एक बार सभी लोग सिक्का उछालें, जो सिक्के को उस ताबूत में रखे मुर्दे के मुँह में डाल देगा, उसी को वह सिक्का मिल जाएगा।”

“ठीक है, ठीक है!” सारा दल एक साथ बोल उठा। 

वे सब सिक्का फेंकने के लिए एक क़तार में खड़े हो गए। गुइफ़ा ताबूत में लेटा चुपचाप सब कुछ सुन रहा था। इससे पहले कि कोई लुटेरा सिक्का उछाले, गुइफ़ा ताबूत में खड़ा हो गया। वह ज़ोर से बोला, “उठो मृत आत्माओ उठो!” सारे लुटेरे अपनी जान बचाने के लिए बगटुट भागे। लूट के धन की ढेरियाँ वहीं पड़ी रहीं। 

जब लुटेरे भाग गए तब गुइफ़ा ढेरियों की ओर बढ़ा। इस समय टोपीवाला दुकानदार भी लपक कर गुइफ़ा के पास पहुँच गया। अब उन दोनों ने सारा लूट का माल बराबर-बराबर बाँट लिया लेकिन इस बार भी पाँच फ़ार्दिंग (1फार्दिंग =1/4पेंस) का सिक्का बच रहा, गुइफ़ा ने कहा, “यह सिक्का मेरा है।”

टोपीवाला बोला, “नहीं यह सिक्का मैं ले जाऊँगा।”

जब उस पाँच फ़ार्दिंग के सिक्के के लिए दोनों में हाथापाई की नौबत आ पहुँची तब गुइफ़ा ने एक मोमबत्ती स्टैंड उठाकर टोपीवाले की ओर हिलाया और गरजा, “ख़बरदार इस सिक्के को छूना भी मत, यह मेरा है!”

उधर चर्च के बाहर लुटेरे दबे पाँव घूमते हुए यह देखने को आतुर थे कि अब मृत-आत्माएँ क्या करेंगी? वे अपनी लूट का धन गँवा कर दुखी और परेशान थे। उनके कान तब खड़े हुए जब उनके कानों में पाँच फार्दिंग के सिक्के के लिए लड़ने की आवाज़ें पड़ीं। वह सब के सब घबरा गए, “हे भगवान! क़ब्रों से न जाने कितनी मृत-आत्माएँ निकल आई हैं, वे सारी तो पाँच-पाँच फार्दिंग के सिक्के के लिए लड़ रही हैं; सबको शायद 5-5 फ़ार्दिंग भी नहीं मिले हैं!”

सारे लुटेरे जान बचाने के लिए सिर पर पाँव रख कर भागे। 

गुइफ़ा और लाल टोपी वाला व्यापारी सिक्कों से भरी थैलियाँ लेकर घर आए। 

गुइफ़ा के पास तो अब भी पाँच फार्दिंग का सिक्का ज़्यादा ही था!!! 

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