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गुरु का शाश्वत अवदान

 

आज जब हाथ में थमी स्क्रीन की नीली बत्ती पर पूरी दुनिया नाच रही है, तो कभी-कभी मन में यह सवाल कौंधता है कि क्या इंसान भी किसी कारख़ाने का पुर्जा बनकर रह गया है? उँगलियाँ सरकाते ही सेकंड भर में हज़ारों उत्तर सामने बिछ जाते हैं। लोग कहते हैं कि यह ज्ञान की असीम क्रांति है, पर मुझे यह सिर्फ़ सूचनाओं की अंधी बाढ़ लगती है। कोई भी मशीन यह तो तुरंत रटा देगी कि फ़ॉर्मूला क्या है, अणु कैसे टूटता है या कोड कैसे चलता है। मगर वह यह समझ कहाँ से लाएगी कि इस हुनर का इस्तेमाल किसी कमज़ोर के आँसू पोंछने में करना है या दुनिया को रौंदने में? मशीनें तथ्य दे सकती हैं, तर्क दे सकती हैं, पर उस ज्ञान को किस साँचे में ढालना है—यह विवेक केवल एक जीता-जागता इंसान ही दूसरे इंसान की रूह में उतार सकता है। 

यह तमीज़ किसी चिप या इंटरनेट के सर्वर में नहीं उगती। यह तो गाँव के उस पुराने स्कूल के नीम तले या सीलन भरी दीवार के नीचे पनपती है। मुझे आज भी याद है, जाड़े के दिनों में जब हम घर से लाई फटी बोरी या टाट-पट्टी बिछाकर काँपते हाथों से पहाड़े रटते थे, तो मास्टर जी अपनी घिसी हुई हवाई चप्पल घसीटते हुए पास आते थे। उनके खादी के कुर्ते पर खड़िया की सफ़ेद धूल लगी होती थी और जेब में लाल स्याही वाला होल्डर। गणित के सवाल पर जब बार-बार काटा-पीटी होती, कॉपी पर स्याही फैल जाती और आँखों में रुआँसापन घिर आता, तब वे झल्लाते नहीं थे। बस अपने खुरदुरे हाथ से सिर पर एक हल्की चपत लगाते, कॉपी पर वहीं लाल पेंसिल फेरते और कहते—“अरे पगले, हिसाब ही तो है, ज़िंदगी से बड़ा थोड़ी है! फिर से जोड़, आ जाएँगा।”

उस खुरदुरी हथेली के स्पर्श और उस एक वाक्य में जो भरोसा था, उसके आगे दुनिया का सारा डेटाबेस बेकार लगता है। मशीनें कठिन से कठिन समीकरण सुलझा देंगी, सदियों पुरानी तारीख़ें सेकंड में फेंक देंगी; लेकिन जब कोई बच्चा आख़िरी बेंच पर मुँह लटकाए घर की तंगहाली, फटे बस्ते या अपनी किसी नाकामी के बोझ तले भीतर ही भीतर घूँट रहा होता है, तब उसकी आँखों के उस सूनेपन को कोई स्क्रीन नहीं पढ़ पाती। उस वक़्त मास्टर जी का चुपचाप पास आकर खड़े होना, बिना कुछ पूछे पीठ थपथपाना और कहना कि “हम हैं न,” भीतर की बुझती हुई लौ को दोबारा सुलगा देता है। वह सिर्फ़ अक्षर नहीं सिखाते थे, वे तो भीतर के उस सहमे हुए इंसान को खड़ा करते थे जो दुनिया की मार से डरने लगा था। 

दुनिया तो बड़ी बेरहम है; वह सिर्फ़ जेब की मोटाई, डिग्रियों के ठप्पे और रुत्बे की चमक देखकर झुकती है। जो सिक्का थोड़ा खोटा दिखा, बाज़ार उसे बाहर फेंक देता है। पर शिक्षक उस अनगढ़, मिट्टी सने पत्थर के भीतर की मूरत को पहली नज़र में पहचानता है। वह यह नहीं देखता कि आज हमारे पास क्या है या हम कितने पिछड़े हैं, बल्कि वह यह देखता है कि इस कच्ची मिट्टी से क्या गढ़ा जा सकता है। याद आता है जब कभी खेल के मैदान में घुटने छिल जाते या किसी सहपाठी से झगड़ा हो जाता, तो वही शिक्षक पहले घाव पर दवा लगाते और फिर आँखों में आँखें डालकर सच बोलने की हिम्मत सिखाते थे। ऊपर से दिखने वाली वह सख़्ती और भीतर से छलकती वह पिता-तुल्य ममता ही हमें बिखरने से बचाती रही। वे कभी हमें अपनी नक़ल नहीं बनाते थे, बल्कि हमारे भीतर इतना हौसला भर देते थे कि हम अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी राह ख़ुद तराश सकें। 

आज सब कुछ बाज़ार की अंधी भेंट चढ़ चुका है। स्कूल बड़े-बड़े कॉर्पोरेट दफ़्तर बन गए हैं, वातानुकूलित कमरों में भावनाएँ जम चुकी हैं, माँ-बाप ग्राहक हैं और बच्चे महज़ ऊँचे अंक और पैकेज बटोरने के साधन। शिक्षक को भी एक बंधा-बंधाया नौकर बना दिया गया है जिसे सिर्फ़ 'टारगेट', रजिस्टर भरने और पाठ्यक्रम पूरा करने से मतलब रह गया है। जब विद्या की ऐसी अंधी सौदेबाज़ी होने लगे, तो वह पुराना आँत्मीय रिश्ता, वह गुरु-शिष्य की पावन परंपरा ख़ुद-ब-ख़ुद दम तोड़ देती है। आज बच्चे के पास साधन तो सब हैं, पर उस तन्हाई में कंधा देने वाला कोई नहीं जो कह सके कि अगर परीक्षा में नंबर कम भी आँ गए, तो भी तुम हमारे लिए अनमोल हो। 

फिर भी, ज़िंदगी जब कभी किसी ऐसे चौराहे पर ला पटकती है जहाँ एक तरफ़ बेईमानी से मिलने वाली तरक़्क़ी, समझौते और भारी मुनाफ़ा हो, और दूसरी तरफ़ सच का अकेला, बीहड़ रास्ता—तब अंतरात्मा के सन्नाटे में जो आँवाज़ पाँव थाम लेती है, वह किसी गूगल सर्च की नहीं होती। वह स्कूल के उसी मास्टर जी की डाँट, उनकी उठी हुई उँगली और उनकी आँखों का वह अटूट भरोसा होता है। वहीं आँवाज़ कान में गूँजती है कि चाहे सब कुछ छिन जाएँँ, पर अपने ईमान की तख़्ती को मैला मत होने देना। 

तकनीक चाहे मंगल पर शहर बसा ले या कृत्रिम मेधा इंसानी दिमाग़ से आँगे निकल जाएँँ, पर जब तक सीने में धड़कता हुआँ दिल बाँकी है, तब तक इंसान को एक ऐसे ही अपने की ज़रूरत रहेगी जो हाथ पकड़कर अँधेरे से उजाले की ओर ले जा सके और कंधे पर हाथ रखकर कह सके: “घबरा मत, रास्ता यहीं है, चल बढ़ आँगे।” शिक्षक का अवदान किसी कालखंड का मोहताज नहीं है; यह वह शाश्वत लौ है जो मनुष्य के भीतर मनुष्यता को मरने नहीं देती। 

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