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सुसंस्कार

 

सुंदरपुर नाम का एक गाँव था। उस गाँव के सभी लोग आपस में प्रेम और सौहार्द के साथ रहते थे। उसी गाँव में विनय नाम का एक बुद्धिमान लड़का रहता था। जैसा उसका नाम था, वैसे ही उसके गुण भी थे। वह बड़ों का सम्मान करता, बुज़ुर्गों की हर काम में सहायता करता, अपने मित्रों से कभी झगड़ा नहीं करता और हमेशा शान्ति से रहता था।

विनय के पिता की एक दुर्घटना में मौत हो गई थीं। उसकी विधवा माँ ने उसे अच्छे संस्कार देकर बड़ा किया। गाँव में केवल चौथी कक्षा तक ही स्कूल था, इसलिए आगे की पढ़ाई के लिए उसे शहर जाना पड़ा।

गाँव के सरपंच बहुत भले और उदार व्यक्ति थे। उन्होंने विनय की बुद्धिमत्ता और प्रतिभा देखकर शहर के एक अच्छे विद्यालय में उसका प्रवेश करा दिया।

विद्यालय में अमीर घरों के बच्चे गाँव से आए विनय को देखकर उसका मज़ाक उड़ाते थे। लेकिन विनय कभी क्रोधित नहीं होता था। वह सबसे प्रेमपूर्वक बातें करता। पढ़ाई में तेज़ होने के कारण जब भी शिक्षक कोई प्रश्न पूछते, विनय सही उत्तर देता।

उसी कक्षा में महेश नाम का एक शरारती छात्र था। विनय की प्रतिभा देखकर उसे ईर्ष्या होने लगी। वह हर समय विनय को परेशान करता और मौक़ा मिलते ही शिक्षकों के सामने उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता।

एक दिन महेश और उसके शरारती मित्रों ने विनय को चोर और झूठा साबित करने की योजना बनाई। महेश ने अपने एक मित्र की कॉपी चुपके से विनय के बैग में रख दी।

कक्षा में पढ़ाई शुरू हुई ही थी कि महेश का मित्र खड़ा होकर बोला, “सर, मेरी कॉपी चोरी हो गई है।”

पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया। शिक्षक ने सभी विद्यार्थियों से पूछा, लेकिन कोई कुछ नहीं बोला। तभी महेश खड़ा होकर बोला, “सर, मैंने अवकाश के समय विनय को कॉपी चुराते देखा था। आप उसके बैग की तलाशी लीजिए।”

शिक्षक ने बैग की तलाशी ली। सचमुच उसमें वह कॉपी मिल गई। शिक्षक बहुत क्रोधित हो गए। उन्होंने विनय को पाँच बेंत लगाएँ और उसे चोर घोषित कर दिया।

महेश और उसके मित्र एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कराने लगे। उन्हें अपनी चाल सफल होने की ख़ुशी थी।

शिक्षक ने विनय को प्रधानाचार्य के पास भेज दिया। प्रधानाचार्य ने बिना पूरी सच्चाई जाने उसका विद्यालय से नाम काट दिया और उसे स्कूल से निकाल दिया।

विद्यालय से बाहर निकलने से पहले विनय की मुलाक़ात महेश से हुई। उसने अपने टिफ़िन में से मिठाई निकालकर महेश को खिलाई और कहा, “आज मेरा जन्मदिन है। मेरी माँ ने यह मिठाई बनाई है और कहा है कि इसे अपने दोस्तों को खिलाना। आज इस विद्यालय में मेरा आख़िरी दिन हैं। पता नहीं हम फिर कभी मिलें या नहीं। यदि मुझसे कोई ग़लती हुई हो तो मुझे माफ़ कर देना।”

इतना कहकर वह अपना बैग लेकर विद्यालय से बाहर चला गया।

विनय की बातें सुनकर महेश के मन में अनेक विचार आने लगे। उसे महसूस हुआ कि उसने विनय को कितना सताया, फिर भी विनय ने कभी ग़ुस्सा नहीं किया। उलटे उसने जन्मदिन की मिठाई खिलाई और स्वयं उससे क्षमा भी माँगी।

महेश का हृदय परिवर्तन हो गया। उसे अपने किए पर गहरा पछतावा हुआ। वह तुरंत प्रधानाचार्य के पास गया और सारी सच्चाई बता दी।

उसने कहा, “सर, विनय ने कोई चोरी नहीं की थी। यह सब मैंने उसे परेशान करने के लिए किया था। कृपया उसे फिर से विद्यालय में प्रवेश दे दीजिए। नहीं तो एक होनहार विद्यार्थीं का भविष्य बरबाद हो जाएगा। विनय बहुत बुद्धिमान और संस्कारी छात्र हैं। वह हमारे विद्यालय का नाम रोशन करेगा।”

प्रधानाचार्य को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने तुरंत विनय को वापस विद्यालय में प्रवेश दे दिया।

महेश और उसके सभी मित्रों ने विनय से क्षमा माँगी। विनय ने मुस्कराकर सबको माफ़ कर दिया। इसके बाद विनय और महेश अच्छे मित्र बन गए।

विनय के उत्तम संस्कारों का प्रभाव इतना गहरा पड़ा कि महेश और उसके शरारती मित्र भी सुधर गए। इस प्रकार विनय ने अपने परिवार, अपने गाँव और अपने विद्यालय, तीनों का नाम रोशन किया। 

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