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अर्पण

 


बाहर दर्पण है, 
भीतर दर्शन है। 
 
साफ़ या मैला, 
उजला तन है। 
 
गिर के सँभलते, 
यह क्या कम है। 
 
डूब कर उभरना, 
तुम में वो फ़न है। 
 
मन्दिर मन है, 
तुम्हें अर्पण है। 

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