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अहिंसा व धर्म

बहुत समय पहले की बात है, मेरे पिता 'धर्म' मुझे हर प्रकार के सुख-चैन से भरपूर जीवन प्रदान करते हुए बहुत ही सुरक्षित वातावरण में पाल-पोस रहे थे। मैं इतनी निडर बन गई थी कि रात्री के किसी भी पहर कहीं भी अकेले आ-जा सकती थी। पिताजी की छत्रछाया में हर पल यही देखा-सुना सो अमल भी वही किया कि अपने मन, वचन या कर्म से कदापि किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए। इसीलिए उन्होंने मेरा नाम 'अहिंसा' रखा था। 

समय बीतते-बीतते पिताजी ने बिन सोचे-समझे 'पाप' नामक एक दुष्ट आदमी के झाँसे में आकर उसके पाँच बेटों; वैर, लालच, कपट, क्रोध व आतन्क को एक-एक करके अपने काम में सम्मिलित कर लिया। इन पाँचों को शुरू से ही मेरी उपस्थिति खलती थी। मुझे जड़ से हटाने हेतु इन भाइयों ने कई बार मुझे मारने का प्रयत्न भी किया, लेकिन उनकी हर कोशिश असफल रही। अब थक-हार कर उन्होंने मुझे कहीं दूर किसी अनजान से घुप अन्धेरे कमरे में बंद कर दिया है। पिताजी इतने कमज़ोर हो चुके हैं कि सब देखते हुए भी अनदेखा सा कर रहे हैं। 

मैं भी बहुत कमज़ोर पड़ चुकी हूँ परन्तु हताश नहीं हुई हूँ। क्योंकि जब-जब मेरे पिता 'धर्म' के नाम पर ये दुष्ट भाई अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर हाहाकार मचाते हैं, तो मेरी सखी 'इन्सानियत' दुनियावालों के दिलों के द्वार पर दस्तक देने पहुँच जाती है। 

अब वह दिन दूर नहीं जब इन्सानियत का सन्देश घर-घर पहुँचेगा और दुनिया के हर कोने से समझदार लोग एकत्रित हो इन पापियों का भांडा फोड़ेंगे। और तब . . . और तब मैं 'अहिंसा' अपने पिता 'धर्म' और सहेली 'इन्सानियत' के साथ मिलकर फिर से अमन-चैन से भरपूर जीवन निडरता से बिताऊँगी। 

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