अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

शाखा जब वृक्ष से अलग हो जाये

 

एक हरे-भरे, फलते-फूलते किसी पुरातन वृक्ष की शाखाएँ भी निश्चित रूप से वैसी ही होती हैं। परन्तु यदि कोई शाखा अपने जन्मदाता अर्थात् उस वृक्ष से अलग हो जाये, तो? इस प्रश्न का उत्तर एक बालक भी सहज भाव से यही देगा कि वह शाखा कुछ ही दिनों में सूख जाएगी। 

ऐसी ही गति कुछ पंथों की होती रही, और यदि हम अपने आसपास देखें तो इस समय कुछ-एक की उस स्थिति तक पहुँचने में देरी नहीं। 

सनातन-धर्म ही वही पुरातन वृक्ष है जिससे कटकर कुछ संस्थाओं ने अपने-अपने पंथ बना लिये। अपने नवीन विचारों की पुष्टि हेतु व उन्हें सिद्ध करने में उनके संस्थापकों की नीयत यद्यपि भली रही होगी, परन्तु उनके अनुसरण करने वालो की संख्या में वृद्धि हो, इस होड़ में या तो उनके धर्म-प्रचारकों ने या उनके शिष्यों ने अपने पंथ की महिमा के गुणगान करने के साथ-साथ अपने ही जन्मदाता सनातन-धर्म की निंदा करनी आरम्भ कर दी। कभी देवी-देवताओं की संख्या को लेकर, तो कभी उनकी आकृतियों/रूप को लेकर और कभी उनके वाहनों की खिल्ली उड़ाकर अन्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जाने लगा। 

उदाहरणतः उनका यह कहना कि ‘यह कैसे सम्भव है कि किसी देवता के चार मुख हों, तो किसी देवी का वाहन शेर, चीता या गाय! किसी देवता के गले में सर्प-माला या किसी का वाहन गरुड़ तो किसी देवता का सिर हाथी का और उसके भारी-भरकम शरीर का वाहन छोटा सा चूहा? नदियों को माँ कहकर पूजना, ये जल-देवता, अग्नि-देवता, सूर्यदेव, वन-देवता और कभी पवन-देवता या उनके पुत्र एक वानर आदि को सप्ताह के किसी विशेष दिन पूजना . . . यहाँ तक कि पीपल, आम, तुलसी आदि वृक्ष-वनस्पतियों इत्यादि को भी देवी-देवता मानकर पूजना . . . यह सब अंधविश्वास व मूढ़ता नहीं तो और क्या है!’ आदि-आदि। 

परन्तु अब उनकी यही धारणाएँ ग़लत साबित हो रही हैं। विश्वभर के विभिन्न वैज्ञानिकों व शोधकर्ताओं ने अपने बरसों के अध्ययन से जो निष्कर्ष निकाला है, उसका वर्णन हज़ारों वर्ष पूर्व लिखे गये हमारे शास्त्रों में मिलता है। परिणाम स्वरूप कुछ दशकों से केवल युवा-वर्ग ही नहीं अपितु अन्य धर्मों के अनुयायी भी सनातन-धर्म से जुड़ने लग गये हैं। कारण यही कि उन्होंने शास्त्रों में उल्लेखनीय अनेक ‘कर्म-कांडों’ की वास्तविकता जान ली है कि देवी-देवताओं की पूजा के पीछे असली उद्देश्य/आशय केवल यही था कि मानव उन्हें पूजने के बहाने उनके नाम से जुड़े पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, वनस्पतियों की देख-रेख, जितना भी सम्भव हो, भलीभाँति कर सके। नहीं तो इन्हें विलुप्त होने में अधिक समय नहीं लगेगा। 

वे यह भी जान गये हैं कि जिन्हें पूजा जाना चाहिए था अर्थात् जिनकी हमें देखभाल करनी चाहिए थी (नदियाँ, वायु, प्रकाश, भूमि आदि), उनका दुरुपयोग कर हम पृथ्वी पर अब प्रदूषण ही बढ़ा रहे हैं। परिणामस्वरूप आये दिन के नये-नये भयानक रोग, भूस्खलन, सूखा, बाढ़, अकाल आदि से पृथ्वी-वासी पीड़ित हो रहे हैं। इन सबसे अधिक चिंताजनक विषय है ओज़ोन परत पर प्रदूषण का दुष्प्रभाव पड़ना। इसी कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ने लग गया है। यह निश्चित रूप से भविष्य में सभी जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है। 

शास्त्रों में कभी पूजा की महत्ता बताकर स्वर्ग का लालच देना या कभी नरक का भय दिखाकर जिन परिणामों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा की गई थी, वह सनातन-धर्म की निंदा-चुगली करने वालों को अब धीरे-धीरे समझ आने लगा है। अब देखना यह है कि इन पंथियों को अपना-अपना पंथ सुरक्षित रखने हेतु कब अपने जन्मदाता सनातन-धर्म के साथ भी कंधे से कंधा मिलाकर चलना आ जाये। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

25 वर्ष के अंतराल में एक और परिवर्तन
|

दोस्तो, जो बात मैं यहाँ कहने का प्रयास करने…

अच्छाई
|

  आम तौर पर हम किसी व्यक्ति में, वस्तु…

अज्ञान 
|

  चर्चा अज्ञान की करते हैं। दुनिया…

अनकहे शब्द
|

  अच्छे से अच्छे की कल्पना हर कोई करता…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता - क्षणिका

कविता

चिन्तन

सांस्कृतिक कथा

कहानी

सजल

लघुकथा

हास्य-व्यंग्य कविता

किशोर साहित्य कविता

काम की बात

नज़्म

ग़ज़ल

चम्पू-काव्य

किशोर हास्य व्यंग्य कविता

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

किशोर साहित्य कहानी

बच्चों के मुख से

आप-बीती

सामाजिक आलेख

स्मृति लेख

कविता-मुक्तक

कविता - हाइकु

पत्र

सम्पादकीय प्रतिक्रिया

एकांकी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं