संस्कारी बहू
कथा साहित्य | कहानी मधु शर्मा1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
उद्धव के यहाँ दो-तीन दिनों से बिल्कुल वैसी ही चहल-पहल थी जो उसके विवाह के अवसर पर छह माह पूर्व उनके पुराने वाले घर में हुई थी। आज इस नये घर के गृह-प्रवेश के उपलक्ष्य में उसके माता-पिता मिस्टर और मिसेज़ वर्मा ने पूजा व भोज का आलीशान कार्यक्रम आयोजित किया हुआ था।
उनके इकलौते बेटे व नवविवाहिता बहू भूमिका ने इस घर के लिए अपनी पसन्द का रंग-पुताई करवाने से लेकर सारा नया फ़र्नीचर खरीदने-सजाने में दिन-रात एक कर दिये थे। इतने खुले व नये घर में आकर उद्धव के माता-पिता अपनी उन थोड़ी-बहुत शिकायतों को भूल से गये जो वे अपने पुराने घर को छोड़ने की आनाकानी में करते रहे थे।
घर की हॉलनुमा बैठक में मेहमानों की उपस्थिति में मिस्टर और मिसेज वर्मा से पंडित जी पूजा करवा रहे थे। उद्धव और भूमिका पीछे वाले बग़ीचे में लगे बड़े से टैंट व पंडाल की सजावट और वहाँ भोजन इत्यादि की देख-रेख में लगे हुए थे। पूजा समाप्त हुई तो आरती करने के लिए दोनों को अंदर बुलवाया गया।
“बेटी, क्या तुम हिंदू नहीं हो?” पंडित जी ने भूमिका को आरती की थाली घूमाते देख थोड़ी नाराज़गी से पूछा, “आरती सही ढंग यानी कि क्लॉक-वाइज़ की बजाय उलट कर रही हो!”
पूजा-पाठ समाप्त होते ही भगवान को भोग लगाने पर सबसे पहले पंडित जी को डाइनिंग-रूम में भोजन परोसा गया। उद्धव और भूमिका बग़ीचे में मेहमानों की आवभगत में व्यस्त हो गये। पंडित जी ने अपने मुँह में एक बड़े से बंगाली रसगुल्ले का आनंद लेते हुए कहा, “वर्मा जी! आप दोनों तो इतने धार्मिक हैं . . . कोई ढंग की ही बहू ले आते! इसके माता-पिता की भी तो ग़लती है कि यहाँ विदेश में रह रहे दूसरे भारतीय लोगों की भाँति पैसा कमाने के चक्कर में जो अपने बच्चों को अपने धर्म से दूर कर रहे हैं . . . ”
“जी नहीं पंडित जी, हमारी भूमिका तो बहुत ही संस्कारी है!” मिसेज़ वर्मा ने उनकी बात बीच में ही काटते हुए कहा।
“ख़ैर, यहाँ अपने गोरे दोस्त-सहेलियों की देखादेखी जब भारतीय बच्चे ही धड़ल्ले से लवमैरिज (प्रेम-विवाह) करने लगे हैं तो आप जैसे बेबस माँ-बाप कर भी क्या सकते हैं . . . उन्हीं की हाँ में हाँ मिलाने में ही अपनी बेहतरी समझते हैं।”
पंडित जी को किसी दूसरे यजमान के यहाँ भी जाने की जल्दी थी। मिसेज़ वर्मा के कहने पर पंडित जी का सामान उठाकर उद्धव और भूमिका उन्हें उनकी कार तक छोड़ने बाहर आ गये। हड़बड़ाहट में सड़क पार करते हुए पंडित जी दूसरी ओर से एक तेज़ रफ़्तार से आती कार देख न पाये। और उससे टकराकर लुढ़कते हुए माथे पर गहरी चोट लगने की वजह से लहूलुहान हो फ़ुटपाथ पर बेहोश होकर गिर गये।
जैसा कि आजकल आम हो ही रहा है कि आसपास खड़े व सड़क पर आने-जाने वाले लोग उनकी मदद करने की बजाए अपने-अपने मोबाइल फ़ोन पर झट से उस घटना का वीडियो बनाने की होड़ में लग गये। परन्तु भूमिका ने उसी वक़्त जल्दी से अपने नये लहँगे का दुपट्टा पंडित जी के सिर पर बाँधा और उद्धव का गरम कोट उतरवाकर पंडित जी के ठंडे होते हुए शरीर पर ओढ़ा दिया।
उनकी रुकती धड़कन महसूस कर भूमिका उन्हें ‘सीपीआर’ (जीवन-रक्षक आपातकालीन प्रक्रिया) देने में लग गई। कुछ ही पलों में पंडित जी होश में आ गये और इतने में ऐंबुलैंस भी आ पहुँची।
उद्धव से पंडित जी का नाम, अता-पता वग़ैरह व घटना की पूछताछ कर ऐंबुलैंस वाले शीघ्र ही पंडित जी को लेकर हस्पताल की ओर रवाना हो गये। रास्ते में दोनों पैरामैडिक (पराचिकित्सक) भूमिका की बहुत सराहना कर रहे थे कि उसी की सूझबूझ की वजह से बुरी तरह इस ज़ख़्मी इंसान को दूसरा जीवन मिला है। नहीं तो बाक़ी के लोग तो इसे एक तमाशा समझ वीडियो बनाने में जुट गये थे।
इतनी बड़ी दुर्घटना का अचानक यह झटका और फिर ख़ून बह जाने से आई कमज़ोरी के कारण पंडित जी यद्यपि कुछ कह न पाये, लेकिन आज उन्हें ज्ञान मिल गया कि किसी के धार्मिक होने से ज़्यादा संस्कारी होना कितना महत्त्वपूर्ण है।
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