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अपने जब बने असहनीय 

 

हमारे परिवार के एक निजी मित्र पिछले लगभग दस वर्षों में एक-एक करके मेरे तीन दुश्मनों को पल में ही जड़ से उखाड़ फेंकने में सफल रहे हैं। ये दुश्मन जो कभी मेरे अपने थे और बचपन से ही तीनों मेरे साथ जुड़े हुए थे। इन्हें मेरे कारण जब मुँह की खानी पड़ी तो मुझे हर दफ़ा पीड़ा भी बहुत हुई। लेकिन इस अधेड़ उम्र में उनके द्वारा एक के बाद एक दी हुई तकलीफ़ मैं कब तक सहन करती।

ये तीनों तो छोटी-मोटी पीड़ा के सैम्पल थे, इस बात का आभास मुझे अभी हाल ही में हुआ, जब मुझे एक नये दुश्मन का सामना करना पड़ गया। यह वाला उन तीनों की तरह छोटा-मोटा न होकर आकार में काफ़ी बड़ा व मज़बूत था।

शायद इसीलिए इसके द्वारा दी जा रही दिन-रात की परेशानी मेरे सब्र का बाँध तोड़ चुकी थी। अब और न इंतज़ार करने की हालत में मैं उन मित्र-महोदय के यहाँ पहुँच गई। उनसे इस दुश्मन की वही गति करने के लिए विनती की जो उन्होंने उन तीनों की कभी की थी। उन्होंने मुझे बहुत समझाया कि यह वाला अभी इतना कमज़ोर नहीं कि आसानी से पकड़ में आ जाए . . . इसे दो-तीन महीने का और समय दो। लेकिन मेरे भीतर तो डर बैठ गया था कि अगर इसने पब्लिक के बीच कभी अचानक अपना पैंतरा बदल डाला तो मैं तो सभी के सामने अपना सा मुँह लेकर रह जाऊँगी!

जैसे-तैसे मैंने उन महोदय से अपनी बात मनवा ही ली। वह जिस तैयारी के साथ मेरे इस दुश्मन का सामना करने के लिए सामान जुटा रहे थे, मैं तो सिर्फ़ मुँह फाड़कर ही रह गई। और फिर तुरंत ही उन दोनों के बीच खींचा-तानी शुरू हुई। वाक़ई यह वाला उन पहले वालों की तरह झट से हार मानने वाला बिल्कुल भी न था। वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा था और हमारे माहिर मित्र चारों ओर घूम-घूमकर उसे जकड़ने की कोशिश में जुते हुए थे। आधे घंटे के बाद कहीं जाकर वह उनके हाथ में आया . . . साबूत नहीं बल्कि एक-एक करके चार टुकड़ों में।

मुझसे ज़्यादा तो उन डैंटिस्ट महोदय के चेहरे पर पसीना टपक रहा था . . . क्योंकि इतनी मज़बूत डाढ़ को यूँ जड़ से उखाड़ देना कोई ख़ाला जी का खेल नहीं।

आज पाँच दिन हो चुके हैं। उस अहसान फ़रामोश दाँत ने जाते-जाते भी अपना बदला ले ही डाला। एंटीबायोटिक तो ले ही रही हूँ, ऊपर से हल्दी वाला दूध, दिन में तीन-चार दफ़ा नमक वाले गुनगुने पानी से कुल्ला व पेनकिलर बदलने के बाद भी . . . दर्द है कि जाने का नाम ही नहीं ले रहा। किसी से शिकायत भी नहीं कर सकती क्योंकि भूल मेरी ही थी तो अब भुगतना भी मुझे ही होगा। 

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