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राँड़ कहीं की

 

‘राँड़ कहीं की!’ बचपन से वह अपने नाम की बजाय यही तो तीन शब्द सुनती आई थी। वह, जो अभी एक बरस की भी न हुई थी, जब उसकी माँ उसे एक दिन अपनी सास को सौंपकर गाँव के बाहर तेज़ बहती नदी में जा डूबी थी। हवेली के नौकर-चाकरों को उसने अक़्सर दबी ज़ुबान में कहते सुना था कि उसके पिताजी की अय्याशी उन्हें तो नहीं लेकिन उसकी माँ को ज़रूर ले डूबी। उस समय छोटी बच्ची होने के कारण यह बात उसकी समझ से परे थी कि अय्याशी और आत्महत्या के मायने क्या होते हैं!

घर में पैसों की कोई कमी न थी। ऐशो-आराम की ज़िंदगी बसर करने वाले उसके पिता को अपनी पत्नी के बाद और भी खुली छूट मिल गयी। रात देर गये वो पहले जो चोरों की भाँति घर में दाख़िल होते थे, अब कई-कई दिनों तक ग़ायब रहने लग गये थे। केवल फ़ोन कर अपने गाँव लौटने का दिन बता दिया करते ताकि माँ उन्हें शहर से जल्द गाँव लिवाने किसी को भेज न दे।

उसकी दादी ने बहुत चाहा कि वह किसी ग़रीब लड़की को ही बहू बनाकर ले आये तो शायद यह बेटा घर में फिर से टिककर रहने लग जाये। लेकिन तीनों ताऊ सहित उनकी पत्नियाँ भी उसके पिता के दूसरे विवाह के विरुद्ध थे। जो ‘काम का न काज का, दुश्मन अनाज का’ हो तो उसकी बेटी के साथ-साथ एक और जीव का सिरदर्द कौन मोल ले! रही घर के काम-काज सम्भालने की बात तो उसके लिए हवेली के नौकर तो मौजूद थे ही।

हाँ तो, बात हो रही थी ‘राँड़ कहीं की’ सुन-सुनकर उसके अभ्यस्त हो जाने की। दादी से लेकर छोटे-बड़े सभी, जैसे उसका नाम ही भूल चुके थे। और आने-जाने वाले भी उसे उसके नाम से कहाँ बुलाते थे . . . उनके लिए उसे बिटिया कहकर ही सम्बोधित करना काफ़ी था।

उसे स्कूल तक न भेजा गया। केवल एक मास्टर जी सप्ताह में दो-एक बार हवेली में उसे पढ़ाने आ जाते। उन मास्टर जी से ही उसे मालूम हुआ कि राँड़ का मतलब विधवा ही नहीं, वेश्या भी होता है। वह कहा करते, “वेश्या बहुत अच्छी होती हैं। तुम्हारे पिता इसीलिए तुमसे ज़्यादा उन्हें प्यार करते हैं . . . नहीं तो तुम्हारे साथ अपना वक़्त बिताने की बजाय उनके साथ क्यों रह रहे होते?” और फिर पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने एकअक़्सरखेल’ का बहाना खोज निकाला। उसे उसके पिता के साथ हमेशा के लिए रहने का लालच देकर मास्टर जी उसे ‘वेश्या के गुण’ सिखाने लग गये। उनका कहना था कि जब तक वह अपनी परीक्षा में पास नहीं हो जाती, इस ‘खेल’ का रहस्य उन दोनों के बीच ही रहना चाहिए।

लगभग तीन वर्ष तक शिक्षा के साथ-साथ इस ‘दूसरी’ ट्रेनिंग का सिलसिला भी चलता रहा। तदुपरान्त एक दिन मास्टर जी द्वारा उसे ‘परीक्षा’ में सफल घोषित कर दिए जाने पर उन्होंने उसे उसके पिता तक पहुँचाने वाला अपना वायदा याद दिलाया। उसे निभाने के लिए उन्होंने उसे उस रात सभी से छिपकर हवेली के पिछवाड़े आने की तरकीब बताई।

घरवाले तो उसे घर के बाहर क़दम तक नहीं रखने देते थे तो शहर, जहाँ उसके पिता का दूसरा ठिकाना है, जाने की इजाज़त क्यों देते! वह तो बरसों से अपनी खुली आँखों से इसी दिन का सपना देखती आ रही थी कि कब उसे इस क़ैद से छुटकारा मिलेगा, और कब अपने पिता के साथ शहर में रहने का उसे अवसर मिलेगा। इसलिए उसने यह सोचकर झट से हामी भर दी कि “यह मास्टर जी कितने भले हैं जो उसे शहर ले जाकर उसके पिताजी के सामने पढ़ाई में पाई गई उसकी ‘सफलता’ दिखा उन्हें उसके वहाँ रहने पर राज़ी कर लेंगे।”

दस बरस की वो बच्ची उतावली हो उस रात सभी की आँख बचा हवेली से निकल मास्टर जी के पीछे-पीछे हो ली। ‘अँधेरे में ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर चलने से कहीं ठोकर खाने से चोट-वोट न लग जाये’, यह कहकर मास्टर जी ने उसकी चप्पलें उतरवा कर अपने साथ लाई नये जूतों की जोड़ी उसे पहना दी। नदी के किनारे चलते-चलते वे दोनों डेढ़-दो घंटे में समीप के एक शहर पहुँच गये। वहाँ से सुबह की पहली ही बस पकड़ वह दुपट्टे में अपना मुँह ढके मास्टर जी के साथ दोपहर होते-होते दूर एक बड़े शहर जा पहुँची।

दो दिन बीत जाने पर मास्टर जी पहले की ही तरह जब हवेली पहुँचे तो नौकरों ने उनसे कहा कि “अब उन्हें वहाँ आने की ज़रूरत नहीं . . . दो दिन पहले बिटिया की चप्पलें नदी किनारे पाई गईं हैं, और उसका कुछ अता-पता नहीं।”

कुछ सप्ताह बीत जाने पर और कोई सुराग़ न मिलने पर पुलिस की कार्यवाही भी यह कह कर निपटा दी गई कि उसने भी अपनी माँ की तरह दुखी हो उसी नदी में डूब कर जान दे दी है।

यह घटना घटे बरसों बीत चुके हैं। आज भी वह अपना नाम नहीं जानती . . . शायद जानना भी नहीं चाहती। मास्टर का मुखौटा पहने उस शैतान द्वारा एक कोठेवाली को बेचे जाने के बाद वह ख़ुद को केवल एक ही नाम से कहलवाना पसन्द करती है—‘राँड़ कहीं की’।

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