अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

कविता तुम कहाँ हो

मानवीय अनुभूतियों की तृप्ति
खोजती मेरी कविता
आज भी भटकती है
करती रहती है संघर्ष
पशुता के ख़िलाफ़
मानसिक जीवन के सस्तेपन को
उकेरते शब्द भी अब सस्ते हो गए हैं।
अख़बारों की धूल में
प्राण स्रोत सूख गया है।
सोशल मीडिया के बाज़ार में
कविता थिरकती है अर्धनग्न होकर।
मुनाफ़े के सिद्धांत पर आश्रित
आज साहित्य ख़ुद को बेचता फिर रहा है।
हर जगह बाज़ार लगा है
साहित्य का
सम्मान का
प्रशस्ति पत्रों का
मंचों का
सौ रुपये में आप
कुछ भी छपवा लो।
संस्कृति की मूल आधार भाषा
आज त्याग रही है पुराने वस्त्र
अब कविता में न भूख है न ग़रीबी है
न सामाजिक सरोकार है
आज की कविता 
संवेदनाशून्य रोबोट है
जिसमें मशीनी स्वर
भिनभिनाते हैं।
अस्पष्ट से भाव मिमियाते हैं।
सत्य के संदर्भ लिए
झूठ मंच से चिल्लाता है।
कुछ कवितायेँ नग्नता और बलात्कार
पर ज़िन्दा बनी हुईं हैं।
सब साहित्य रचनाधर्म नहीं होता
और सब लेखन साहित्य नहीं होता।
कहते हैं कि कविता अस्मिता की
पहचान कराती है।
आज कवितायें हैं
आज किताबें हैं
आज नाम है सम्मान हैं
किन्तु कविता कहीं खो गई है
जैसे पानी की बूँद
खो जाये रेगिस्तान में।
सिर्फ़ उसके अवशेष पर
कुछ शब्दों के कपड़े हैं।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

2015
|

अभी कुछ दिनों तक तारीख़ के आख़िर में भूलवश…

2016
|

नये साल की ख़ुशियों में मगन हम सब अंजान हैं…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता-मुक्तक

गीत-नवगीत

कविता

सामाजिक आलेख

दोहे

बाल साहित्य लघुकथा

लघुकथा

साहित्यिक आलेख

बाल साहित्य कविता

कविता - हाइकु

व्यक्ति चित्र

सिनेमा और साहित्य

कहानी

किशोर साहित्य नाटक

किशोर साहित्य कविता

ग़ज़ल

ललित निबन्ध

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं