अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अपनी जरें

(बुंदेली लघुकथा )
 

"तुमसे कित्ती बेर कही के शहर चलो मन तुम ने मान हो, इते का हडगा गड़े हैं," मुकेश कछु ज्यादै गुस्सा में थो।

भोत दिनों से वो बाई बब्बा है शहर ले जावे की जुगत में थो मन वे मान ने रै थे।

"भैया हडगा तो ने गड़े हैं मन हमरो उते जी ने लग है," बाई ने मुकेश हे समझात भय कही।

"मुक्कु बेटा तुम और बहु आफिस चले जेहो मोड़ा मोड़ी स्कूल, हम उते का कर हैं," बब्बा ने समझात भय कही।

"और इते का कर रय हो, इते भी तो अकेले डरे हो," मुकेश गुस्सा में फनफना रयो थो, "हमरो पूरो मन इते लगो रेत है।"

"बेटा हम औरों की चिंता मत करबू करे हम तो उम्दा रहत हैं," बाई ने प्रेम से मुकेश है समझाओ।

"तुम तो उम्दा रहत हो बाई मनो लोग तो हमें नांव धरत हैं के महतारी बाप की सेवा नेकर के शहर में गुलछर्रे उड़ा रओ है मुक्कु," मुक्कु जोर से बोलो।

"बेटा लोगों के मो पे लुगाहरिया धरी रेन दे हम दोनों तो इतै सुखी हैं तुम तो अच्छे से कमाओ खाओ लोगों हे कहाँ दो," बब्बा ने हँसत भय मुक्कु है समझाओ।

"पर बब्बा शहर में रहवे पे तुम्हें का तकलीफ हो रै है का तुम्हें बहु से का मोडी मोडों से तकलीफ है," मुकेश चाह रओ थो दोई बाके साथ चलें।

"नई बेटा हमें कोई से कोई तकलीफ नै हैं बस हमें हमरे गांव अपने जा घर में अच्छो लगत है। हमें ईतै ख़ुशी मिलत है, का तुम नै चाहो के तुम्हारे बाई बब्बा ख़ुशी रहें?"बाई ने मुकेश हे समझाओ।

"बेटा हमें हमरी जरों से अलग मत करो तुम जाओ ख़ुशी रहो," बब्बा ने बड़ी गंभीर होके अपनों फैसला सुना दओ।

मुकेश बिचारो चुप्पचाप शहर जावे की तैयारी में लग गओ। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

गीत-नवगीत

कहानी

कविता

दोहे

कविता-मुक्तक

सामाजिक आलेख

बाल साहित्य लघुकथा

लघुकथा

साहित्यिक आलेख

बाल साहित्य कविता

कविता - हाइकु

व्यक्ति चित्र

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

किशोर साहित्य कविता

ग़ज़ल

ललित निबन्ध

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं