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आकाशगंगा

तुम कौन सी मशीन हो ?
विगत पच्चीस सालों से
अनवरत अथक
दे रही हो खाद पानी
बनी हो अक्ष और
घूम रहें हैं सारे रिश्ते नाते
तुम्हारे ही इर्दगिर्द
किसी आकाश गंगा सी
जिसमें जड़े हैं सारे रिश्ते
चमकते सितारों से।
हम सब बस समझते हैं तुम्हें मशीन
जो चलती रहती है रातदिन
बग़ैर रुके बगैर थके
तुम्हारी भावनाएँ, तुम्हारे जज़्बात
तुम टाँग देती हो
किचिन में लटके कपड़ों से
जिनसे गर्म पतीलीयाँ उतारी जाती हैं
हमारे हर दुःख हर कष्ट को
सोख लेती हो मरुथल के रेत सी
और जलती रहती हो बियाबान में
तुम्हारे अधूरेपन में
पूरे होने की ख़्वाहिश
दफ़्न हो जाती है
उम्र, घर, बच्चे
समाज रिश्तेदारों के नीचे
इन सबके बीच
तुम्हारा अस्तित्व
दर्पण के टुकड़ों की मानिंद
बिखरा है तुम्हारे चारों ओर
और तुम्हारा अस्तित्व
उन टुकड़ों में खो जाता है
चाहता हूँ उन टुकड़ों को
जोड़ कर तुम्हें दूँ
एक नई शक्ल
जो बिल्कुल तुम्हारी हो।
और जिस पर सिर्फ़
तुम्हारे हस्ताक्षर हों।

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