अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

पति का बटुआ

शुभ्रा की आदत आम पत्नियों की तरह अपने पति के बटुए तलाशने की नहीं थी, उसे जब भी पैसे चाहिए होते तो वो आनंद से माँग लेती थी किन्तु कभी उसने आनंद का बटुआ नहीं छुआ था।

आज जब शुभ्रा आनंद की पेंट धोने ले जा रही थी तो देखा उसके पेंट में बटुआ रखा हुआ है।

"बहुत भुलक्कड़ हो तुम आनंद," शुभ्रा बुदबुदाई।

उसने बटुआ निकाल कर मेज़ पर रखा, निकालते समय उसने देखा बटुआ बहुत भारी है, उसमें पैसों के साथ-साथ कुछ काग़ज़ात भी रखे हैं। पहले उत्कंठा हुई कि बटुआ देखा जाए लेकिन उसकी अंतरात्मा ने मना कर दिया और उसने मुस्कुराकर बटुआ मेज़ पर रख दिया।

कपड़े धोकर जब वह मेज़ के पास से निकली तो मेज़ को हल्का धक्का लगा और बटुआ नीचे गिरा। बटुए से आनंद की एक फोटो नीचे गिरी। उस फोटो में आनंद एक बच्चे को गोद में उठाये हुए था।

उसे आश्चर्य हुआ उनका अभी तक कोई बच्चा नहीं है फिर ये बच्चा कौन है? शुभ्रा सारा दिन उसी बच्चे के बारे में सोचती रही किसका बच्चा है? आनंद ने कभी कुछ इस बच्चे के बारे में बताया नहीं।

शाम को आनंद घर आया शुभ्रा ने नाश्ता और चाय की प्लेट मेज़ पर रख दी, "आज थके हुए से लग रहे हो," शुभ्रा ने पूछा।

"नहीं कोई विशेष बात,"आनंद ने उदासी भरे स्वर में कहा।

शुभ्रा ने वह फोटो आनंद के सामने रख दी, "यह कौन है?"

फोटो देख कर आनंद के आँखों में आँसू आ गए, "शुभ्रा इसे ब्लड कैंसर है।"

"कौन है ये बच्चा?"शुभ्रा ने फिर प्रश्न किया।

"अनाथाश्रम का बच्चा है उसे ब्लड कैंसर है, मैंने उसके इलाज की ज़िम्मेवारी ली है लेकिन डॉक्टर कह रहे हैं कुछ दिन का ही मेहमान है," आनंद ने सुबकते हुए कहा।

"मुझे क्यों नहीं बताया?"शुभ्रा ने शिकायत भरे अंदाज़ में कहा।

"इलाज का ख़र्च बहुत ज़्यादा था; मैंने सोचा तुम्हें क्यों तनाव दूँ, इसलिए बस और कोई बात नहीं थी," आनंद ने शुभ्रा की देखते हुए कहा।

"चलो!"शुभ्रा ने आनंद का हाथ खींचते हुए कहा।

"लेकिन कहाँ?" आनंद ने आश्चर्य से शुभ्रा की ओर देखा।

"इसे लेने," शुभ्रा ने बच्चे की तस्वीर की ओर इशारा किया।

"लेकिन. . .," आनंद ने कुछ कहना चाहा।

"लेकिन-वेकिन कुछ नहीं। हम आज ही उस बच्चे को अनाथाश्रम से लेकर आएँगे। हम ईश्वर तो नहीं हैं कि उसको ज़िंदगी दे दें लेकिन जब तक वह ज़िन्दा है, हम उसे माँ बाप का स्नेह ज़रूर दे सकते हैं," शुभ्रा ने कार की चाबी आनंद की ओर उछाली।

लौटते हुए शुभ्रा की गोद में वह नन्हा बच्चा मुस्कुरा रहा था। उसने उसी पल में अपनी सारी ज़िंदगी जी ली थी।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सामाजिक आलेख

लघुकथा

व्यक्ति चित्र

गीत-नवगीत

दोहे

कविता

साहित्यिक आलेख

सिनेमा और साहित्य

कहानी

बाल साहित्य कविता

कविता-मुक्तक

किशोर साहित्य नाटक

किशोर साहित्य कविता

ग़ज़ल

ललित निबन्ध

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं