अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

राष्ट्र निर्माता

पाँच सितंबर को विद्यालय के सभागार में सजे भव्य मंच से प्रबंधन समिति के अध्यक्ष महोदय ने जब वरिष्ठ शिक्षक माधव जी के गले में गेंदे की भारी माला पहनाई तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। माइक पर बोलते हुए उन्होंने माधव जी को ‘संस्थान की रीढ़’ और ‘सच्चा राष्ट्र निर्माता’ घोषित किया। मंच पर उन्हें स्मृति चिह्न के रूप में काँच का एक चमचमाता ग्लोब और प्रशस्ति पत्र भेंट किया गया।

समारोह के ठीक बाद विद्यालय के प्रशासनिक कक्ष से एक आवश्यक बैठक का बुलावा आ गया। माधव जी गले से माला उतारे बिना ही सीधे निदेशक के कक्ष में पहुँचे जहाँ मेज़ पर फ़ाइलों का अंबार लगा था। निदेशक ने बिना ऊपर देखे एक लंबी सूची उनकी तरफ़ बढ़ा दी।

"माधव जी, इस सत्र में नए प्रवेश का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ है। कल से आपको शिक्षण कार्य छोड़कर आसपास की बस्तियों में घर-घर जाकर दाख़िले के पर्चे बाँटने होंगे।"

माधव जी के हाथों में काँच का वह सुंदर ग्लोब टिका था और निदेशक की मेज़ पर उनकी सेवा-शर्तों का वह पत्र जिस पर लिखा था कि पचास नए दाख़िले न लाने की दशा में उनका वेतन रोक दिया जाएगा।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अकथित दर्द
|

दोपहर प्रिया जब कॉलेज से घर आयी तो ननद सास…

अकेलेपन का बोझ
|

“हैलो मेनका! बिज़ी तो नहीं? कहीं मैं…

अगर तुम मिल जाओ 
|

अख़बार में छपा यह समाचार हृदय विदाकर था।…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता-मुक्तक

लघुकथा

कविता

कहानी

सम्पादकीय प्रतिक्रिया

गीत-नवगीत

आप-बीती

साहित्यिक आलेख

ग़ज़ल

दोहे

बाल साहित्य कविता

नाटक

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

स्मृति लेख

व्यक्ति चित्र

सांस्कृतिक आलेख

ललित निबन्ध

सामाजिक आलेख

चिन्तन

काम की बात

कविता - हाइकु

ऐतिहासिक

कविता - क्षणिका

किशोर साहित्य कहानी

सांस्कृतिक कथा

स्वास्थ्य

खण्डकाव्य

रेखाचित्र

काव्य नाटक

यात्रा वृत्तांत

हाइबुन

पुस्तक समीक्षा

हास्य-व्यंग्य कविता

गीतिका

अनूदित कविता

किशोर साहित्य कविता

एकांकी

बाल साहित्य लघुकथा

सिनेमा और साहित्य

किशोर साहित्य नाटक

विडियो

ऑडियो

उपलब्ध नहीं