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वह मन जिसमें कविता रहती है

 

कविता वहाँ नहीं रहती
जहाँ शब्द बहुत होते हैं, 
वह तो उस मौन में जन्म लेती है
जहाँ एक आँसू
पूरी कथा कह देता है। 
कविता वह नहीं
जो काग़ज़ पर उतर आए, 
कविता तो वह है
जो किसी दूसरे के दुःख को
अपना दुःख बना जाए। 
 
किसी माँ की आँखों में
बेटे की प्रतीक्षा बनकर, 
किसी पिता की हथेली पर
बची हुई गर्माहट बनकर, 
किसी वृद्ध की चुप्पी में
बीते हुए दिनों की आहट बनकर
जब कुछ काँपता है, 
वहीं कविता जन्म लेती है। 
कविता प्रेम भी है, 
और प्रेम के चले जाने के बाद
कमरे में रह गई
उसकी गंध भी। 
 
कविता विरह की वह रात है
जिसमें चाँद तो होता है, 
पर उसे देखने वाला
कोई अपना नहीं होता। 
कविता उस स्त्री की मुस्कान है
जो भीतर से टूटी हुई है, 
फिर भी घर की देहरी पर
अपने दुःख को उतारकर
सबके लिए दीप जला देती है। 
 
कविता बच्चे की हँसी में
भविष्य की निर्मल ध्वनि है, 
और उस मज़दूर की हथेली में
जिसकी रेखाओं से अधिक
उसके श्रम की कहानी गहरी है। 
  
कविता खेत की मेड़ पर
बैठा हुआ किसान है, 
जो आकाश को देखता है
और बादलों से
अपनी रोटी का संवाद करता है। 
 
कविता नदी भी है
जो पत्थरों से टकराकर
अपना मार्ग नहीं छोड़ती, 
और वह नाव भी
जो डूबते हुए मनुष्य के लिए
अँधेरे जल में लौट आती है। 
कविता कभी शंखनाद है, 
कभी करुण क्रंदन, 
कभी अन्याय के सम्मुख
सीधी खड़ी हुई रीढ़, 
कभी उस सत्य की धीमी आवाज़
जिसे संसार सुनना नहीं चाहता। 
 
कविता तलवार नहीं, 
पर तलवार से अधिक
मनुष्य के भीतर
काट सकती है अंधकार। 
कविता दीप नहीं, 
पर बुझी हुई आत्मा में
प्रकाश की सम्भावना
जगा सकती है। 
कविता मंदिर की घंटी में
ईश्वर को खोजने से पहले
मनुष्य में मनुष्य को खोजती है। 
वह वेदों की ऋचा से चली, 
लोकगीतों की मिट्टी में उतरी, 
संतों की वाणी में खिली, 
किसी विरही के कंठ में रोई, 
किसी क्रांतिकारी के स्वर में
अग्नि बनकर दहकी
और किसी माँ की लोरी में
फिर से शिशु हो गई। 
 
समय बदलता रहा, 
कविता भी बदलती रही। 
कभी वह ताड़पत्र पर थी, 
कभी भोजपत्र पर, 
कभी काग़ज़ की स्याही में, 
अब किसी छोटे से
प्रकाशमान पर्दे पर
उँगलियों के स्पर्श से
जन्म लेती है। 
 
आज कविता
कभी दो पंक्तियों में आती है, 
कभी एक तस्वीर के नीचे, 
कभी किसी संदेश की तरह
अचानक किसी मन तक पहुँच जाती है। 
उसका आकार छोटा हुआ है, 
पर उसकी आवश्यकता नहीं। 
 
हाँ, आज कविता के सामने
एक नया संकट अवश्य है। 
शब्द बहुत हैं, 
पर संवेदना कम होती जा रही है। 
लिखने वाले बहुत हैं, 
पर अपने भीतर उतरने वाले
कितने हैं? 
 
कविता पोस्ट हो सकती है, 
वायरल हो सकती है, 
तालियाँ पा सकती है, 
पर कविता तभी बचती है
जब वह पाठक के भीतर
कुछ देर तक
मौन रह सके। 
 
कविता का स्पर्श
उँगली के पर्दे पर नहीं, 
हृदय की त्वचा पर होता है। 
वह पढ़ी नहीं जाती केवल, 
वह भीतर उतरती है। 
 
कभी किसी पंक्ति पर
आँख ठहर जाती है, 
कभी कोई शब्द
बरसों पुरानी स्मृति खोल देता है, 
कभी कोई कविता
बिछुड़े हुए व्यक्ति को
फिर से सामने बैठा देती है। 
 
तभी समझ में आता है
कि कविता अक्षरों का क्रम नहीं, 
मनुष्य की स्मृतियों का
अदृश्य संगीत है। 
 
जिस मन में कविता रहती है
वह मन पत्थर नहीं हो सकता। 
वह किसी चिड़िया के घायल पंख को
देखकर ठहर जाएगा, 
किसी अजनबी की आँखों में
नमी पहचान लेगा, 
किसी वृक्ष को काटे जाते देखकर
अपने भीतर कुछ टूटता हुआ महसूस करेगा। 
वह विजय में भी
पराजित का चेहरा देखेगा, 
उत्सव में भी
अकेले बैठे मनुष्य को याद करेगा, 
और अपने सुख के बीच
किसी दूसरे के दुःख के लिए
थोड़ी जगह बचाकर रखेगा। 
 
शायद इसीलिए
कविता लिखना
शब्दों को सजाना नहीं, 
अपने भीतर मनुष्य को
बचाए रखना है। 
और कविता पढ़ना
किसी कवि को पढ़ना नहीं, 
अपने ही भीतर
छूट गए उस मनुष्य से मिलना है
जिसे संसार की आपाधापी में
हम कहीं पीछे छोड़ आए हैं। 
 
कल कविता का रूप
कुछ भी हो सकता है। 
वह काग़ज़ पर न हो, 
किसी पुस्तक में न हो, 
किसी मंच पर न पढ़ी जाए, 
किसी स्क्रीन पर भी न दिखाई दे। 
 
पर जब तक
एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के दुःख पर
चुप नहीं रह पाएगा, 
जब तक किसी विदा होती माँ की आँख
किसी बेटे को भीतर से पुकारेगी, 
जब तक प्रेम
बिना स्वार्थ किसी हृदय में बचेगा, 
जब तक अन्याय के सामने
किसी आत्मा में प्रतिरोध जागेगा, 
तब तक कविता जीवित रहेगी। 
क्योंकि कविता
किसी भाषा की संपत्ति नहीं, 
वह मनुष्य होने की
सबसे कोमल स्मृति है। 
 
और शायद
कविता का सबसे बड़ा घर
काग़ज़ नहीं, 
वह मन है
जो रो सकता है, 
प्रेम कर सकता है, 
दुःख समझ सकता है, 
अन्याय पर काँप सकता है, 
और किसी अनजान मनुष्य के लिए भी
अपने भीतर
एक दीप बचाकर रख सकता है। 
वही मन कविता का घर है। 
वही मनुष्य का घर है। 

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